क्रिसमस का यही तोहफा ले लो…

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इस बार के भी झारखण्ड प्रवास में ढेर सारे लोगों से मिलना जुलना हुआ.. फेसबुक के ही माध्यम से सभी जुड़े थे.. राँची में दो दिन रहा.. यहाँ भी बहुत जनों से मिलना हुआ.. लेकिन एक जन का जिक्र करना आज जरुरी समझ रहा हूँ… नाम गुप्त रख रहा हूँ.. फेसबुक में मुझसे करीब छः महीने पहले जुड़ी थी.. और एक अच्छी मित्र भी बनी और आज भी है.. वो क्रिश्चनों के सम्बन्ध में बहुत कुछ बताती थी.. इस बार जब राँची गया तो उनसे मिलना हुआ.. उन्होंने ढेर सारी बातें बताई.. अपनी आप बीती भी सुनाई.. वो जो कुछ भी बताई, मैं यहाँ उन्हीं के शब्दों में रख रहा हूँ…

साल 2008 की बात है.. मैं ग्रेजुएशन के फाइनल इयर में थी.. मेरे घर की आर्थिक स्तिथि बहुत ही खराब थी.. मैं किसी तरह स्कॉलरशिप के पैसे से पढ़ रही थी.. घर में हम दानें-दानें को मोहताज़ थे.. मैं बच्चों को ट्यूशन पढ़ा के कुछ सहायता करती थी परिवार को.. लेकिन बड़े परिवार में मेरी कमाई बस ऊँट के मुँह में जीरा जैसा था..

घर में दो वक़्त का खाना भी ढंग से नहीँ बनता था.. अपनी हालत ऐसी कि रोज कुंआ खोदो और रोज पानी पीयो.. मुझे याद नहीं कि हमने एक साथ एक हफ्ते के लिए राशन कब खरीदा हो.. रोज शाम आटा-चावल खरीद के लाओ तो शाम का चूल्हा जलता था.. सुबह का नाश्ता क्या होता है हमें मालूम भी नहीं था..

दिन में एक बार हड़िया चढ़ा तो फिर अगले ही दिन दुबारा चढ़ती थी चूल्हे में, रात में कभी-कभार .. ज्यादातर माड़-भात और आलू का चोखा ही बनता था, और कभी-कभार घर के बारी में थोड़ी-बहुत उपजी सब्जी …

किसी तरह मेरे घर की गाड़ी रेंग-रेंग के चल रही थी.. मैं राँची विमेंस कॉलेज में पढ़ती थी.. मेरी एक सहपाठी थी जो रांची की ही है और हमने साथ-साथ इंटर भी किये थे.. विमेंस कॉलेज में वो इकोनॉमिक्स ऑनर्स कर रही थी और मैं हिस्ट्री.. लेकिन हम दोनों का रोज ही मिलना हो जाया करता था.. . उसकी भी माली हालत बिल्कुल मेरी जैसी ही थी… लेकिन फाइनल इयर में जब वो आई तो एकदिन उसके कपड़ें देख के मैं चौंक गई.. वो सफेद साड़ी और स्कार्फ से सिर को लपेटे हुई थी.. मेरे से रहा नहीं गया.. मैं उत्सुकतावश पूछ बैठी, “ये सब क्या है??”

वो बोली कि “हम सब मतलब मेरा पूरा परिवार क्रिश्चियन बन गए हैं.. और मैं नन!”

मुझे उस वक़्त नन वन क्या होता है मालूम नहीं था.. बस कॉलेज आते-जाते वक़्त बहुत कोई ऐसे कपड़ों में देखने को मिल जाया करते थे.. लेकिन मैंने कभी जानने की कोशिश नहीं की थी.. फिर धीरे-धीरे रोज ही उनसे इस बारे में बात होने लगी.. वो अपने अनुभव सुनाती.. कि कल वहाँ गए थे.. आज यहाँ गए थे.. कल वहाँ जाएंगे.. गरीबों की मदद करते हैं.. हर तरीके से करते हैं.. मन को बड़ी शांति मिलती हैं.. सुकून मिलता हैं.. जब अपने जैसों को, जरूरतमन्दों को मदद करती हूँ तो बड़ा सुख मिलता है..

हमें अपने बीते दिन याद आते है.. कि कैसे हम भी कभी इनके तरह होते थे.. आज अपने हाथ से मदद कर रही हूँ तो कितना अच्छा लग रहा हैं.. मुझे पढ़ने-लिखने के सारे खर्चे मिलते हैं.. मेरे परिवार को पैसा मिलता हैं.. मैं खुद कमाती हूँ.. आज हम बस सुकून से अपनी जिंदगी बीता रही हूँ और लोगों की मदद भी कर रही हूँ. ..

मैं भी अपनी गरीबी से त्रस्त थी.. और गरीबों की मदद करने की जब बात होती थी तो मैं एक अलग ही भावनात्मक जुड़ाव से जुड़ जाती थी.. एक दिन बात करते-करते ही मेरे साथ तीन सहेलियों ने भी चर्च के माध्यम से गरीबों की सेवा की बात कही.. वो बहुत खुश हो गई.. वो बोली कि चलो कब चलना है तुम लोगों को वो बताओ, मैं ले के चलूंगी तुम्हें..

लेकिन उन लड़कियों ने जब कहा कि हम मदद करने ज़रूर जायेंगे,अंदर से इच्छा है, लेकिन न क्रिश्चियन बनूँगी और न ही नन! .. तो वह उखड़ गई.. बोली कि जब नन ही नहीं बनना तो फिर जा के कोई फायदा नहीं.. मत चलो .. .. फिर वो मुझसे बोली कि तुम्हारा क्या सोचना है वो बताओ.. कोई ज़ोर ज़बरदस्ती नहीं है.

मैं उस वक़्त कुछ न बोली.. लेकिन जैसी मेरी पारिवारिक स्थिति थी मुझे उसने बरबस ही ध्यान खींचा.. मुझे सोचने पर मज़बूर कर दिया.. . बहुत सारे सवाल उठने लगे मन में.. अगर वो ऐसा कुछ कर सकती है जिससे घर-बार की स्तिथि में इतना सुधार हो सकता है तो फिर मैं क्यों नहीँ?? ..

मेरे परिवार को तो इसकी सख्त जरूरत है, और विशेषकर तो मुझे… मुझे पढ़ने का बड़ा शौक है.. लेकिन परिवार की आर्थिक तंगी के चलते लगता है कि आगे कुछ भी न कर पाऊँ.. लेकिन अगर कुछ ऐसा होता है जिनसे परिवार की आर्थिक स्तिथि सुदृढ़ हो और मैं अपनी पढ़ाई आसानी से आगे जारी रख सकती हूँ तो ऐसा करने में क्या हर्ज़ हैं.. गरीबों की सेवा करके मानसिक शांति मिलेगी सो अलग…

इसी उधेड़बुन और बहुत सारी सवालों के बीच हम मन्थन करते रहे.. उस रात भूखे पेट ही सोना पड़ा घर में अन्न न होने के कारण.. लगभग रोज की यही कहानी थी मेरे परिवार की.. और अब मैंने पूरा विचार बना लिया कि मैं नन बनूँगी.. अगले दिन कॉलेज आते ही मैंने अपने मन की बात सामने रख दी…

“यार मैंने डिसाइड कर लिया है.. मैं नन बनूँगी“

“पक्का न ??”

“हाँ पक्का.. अच्छा और एक बार बताओ .. नन में क्या काम करना पड़ता है ??”

“यार मैं तो तुम्हें पहले भी कितनी बार बता चुकी हूँ.. फिर भी.. ज्यादा कुछ नहीं.. बस प्रभु यीशु के सन्देश को लोगों तक पहुँचाओ और गरीबों की सेवा करो.“

“ह्म्म्म.. चलो ठीक है.. मैं तैयार हूँ ??”

“और हाँ.. पैसे-वैसे चिंता मत करना… पैसे इतने कि पूछो मत“

फिर वो बोली कि ठीक है कॉलेज छुट्टी हो जाने के बाद मैं तुम्हें फादर के पास ले चलूँगी.. अप्रैल-मई का महीना था.. कॉलेज मॉर्निंग में थी.. साढ़े दस बजे तक कॉलेज छुट्टी हो गई.. वो मुझे ले के उर्सलीन कॉन्वेंट ले के गई.. जहाँ ननों के ठहरने के लिए हॉस्टल बनाई गई हैं…. वहीँ फादर,पैस्टर्स सब भी रहते हैं..

बड़ा ही आलिशान टाइप का होस्टल था.. मुझे एक हॉल में बिठा के बोली कि मैं फादर से मिल के आती हूँ, तुम यहीं वेट करो.. मैं बैठ के इंतज़ार करने लगी.. गर्मी का दिन था तो पंखें भी चल रहे थे.. मेरी सहपाठी हॉल से अटैच कमरे में गई जिसमें कि फादर थे., वो कमरा हॉल से खिड़की के माध्यम से जुड़ा हुआ था.. मैं वहाँ नई-नई थी तो हॉल की सजावट को बड़े गौर से निहार रही थी.. निहारते-निहारते ही मेरी नज़र खिड़की के परदे के तरफ गई..

पंखें के हवे से पर्दा थोड़ा साइड हुआ तो बगल के कमरे का सारा नजारा सामने आया.. मुझे तो एक पल कुछ भी पल्ले नहीं पड़ा… फिर पर्दा अपने जगह पे आ गया.. मुझे बड़ा अजीब लगा.. मैं उठी और पर्दा थोड़ा साइड करके अंदर झाँकी.. अंदर जो कुछ भी देखा उससे मेरी तो कुछ देर के लिए साँस ही अटक गई… मेरी सहपाठी लगभग अपने बाप के उम्र के फादर के साथ इस तरह से लिपटी हुई थी मैं बता नहीं सकती.. और फादर उसके साथ ऐसी हरक़त कर रहा था कि क्या बताऊँ!

.. मेरे से बिल्कुल भी देखा नहीं गया.. मैंने झट से पर्दा बन्द किया और वापिस चैयर में आ के बैठ गई .. करीब आधे घण्टे बाद वो ट्रे में एक गिलास पानी ले के आई.. और बोली कि पानी पी लो!, फादर अभी आ रहे हैं.

मैं बोली कि मुझे प्यास नहीं है.. वो बोली कि अरे इतनी धूप है और तुम्हें प्यास नहीं लगी है? .. मैं बोली नहीं.. नहीं लगी है! … वो ट्रे को साइड में रख के मेरे साथ बैठ गई.. मैं बोलने लगी कि यार मुझे घर जाना है.. बहुत जरुरी काम है.. मैं बाद में समझ लूंगी.. तभी फादर आ जाते है.. वो बड़े प्यार से मेरा नाम पूछते है.. मैं सकुचाते हुए अपना नाम बताती हूँ.. फिर बोले कि बेटा पानी पी लो, बाद में बात करते रहेंगे.. मैं फिर बोल दी कि नहीं फादर मुझे प्यास नहीं है…

वो फिर बात आगे बढ़ाने लगे.. और बड़े ही प्यार और आत्मीयता से मेरी पढ़ाई-लिखाई से सम्बंधित सवाल पूछने लगे.. और मेरी पढाई की बैकग्राउंड जान के खूब तारीफ़ भी किये.. फिर कुछ मिनट बाद बोले कि बेटा पानी पी लो.. सब अच्छे से समझाऊंगा.. नन बनने के प्रोसेस को समझाने में करीब ढाई से तीन घण्टे लग सकते है.

मेरी सहपाठी और फादर का बार-बार पानी पीने को बोलना मेरे को ज़रा अजीब लगने लगा… मैं इस बार बोली कि “देखिये मेरा आज व्रत है.. और मैं निर्जला व्रत रखती हूँ.. सो आज मैं पानी भी ग्रहण नहीं कर सकती.. सॉरी फादर.. मैं कभी अलग दिन समय निकाल के आऊँगी और अच्छे से समझूँगी.“

फिर वहाँ से मैंने  अपना बैग झट से उठाया और सरपट घर की ओर भागी.

उसके बाद न हमने कभी क्रिश्चियनिटी के बारे में कुछ जानने की कोशिश और न कुछ समझने की.. मैं बस अपने पढ़ाई में लग गई.. उसने ग्रेजुएशन के बाद विमेंस कॉलेज छोड़ दिया.

एक दिन बाहर मिली तो बताया कि हम सब लन्दन जा रहे हैं घूमने के लिए अगले मंथ… अगर तुम आज नन बनी होती तो मुफ़्त में ही लन्दन घूम आती! .. मैंने उसे बस शुभकामनायें दी और वहां से चल दी.. और फिर उसके बाद उनसे मुलाक़ात नहीं हो पाई.. मैं किसी तरह पीजी करके जॉब में लग गई..

फिर लगभग पाँच साल बाद मतलब 2013 में उनसे मेरे ही कार्यस्थल में मुलाक़ात हुई.. वो मुझे पहचान गई लेकिन मैं उसे बिल्कुल भी पहचान नहीं पा रही थी.. फिर अपना इंट्रोडक्शन दिया.. मैं झट से पहचान गई और वो दृश्य आँखों के सामने आ गया.. लेकिन मुझे उसे पहचानने में तकलीफ इसलिए हुई कि उसका चेहरा बिल्कुल ही बदल गया था.. पहचान में बिल्कुल भी नहीं आ रही थी.. मेरी ही हमउम्र थी वो, लेकिन केवल पाँच साल के अंतराल में ही मुझसे 10-12 साल बड़ी लगने लगी थी.. और चेहरे की जो रौनक पाँच पहले हुआ करती थी अब वो बिल्कुल ही गायब थी..

बातों में भी वो खनखनाहट नहीं थी,चुलबुलापन नहीं था.. बिल्कुल ही बेरंग सी.. बस एक चलती-फिरती सी माँस का लोथड़ा जान पड़ती थी.. एकदम से नीरस आवाज आती मुख से… उसी नीरस आवाज में मुझसे बोल रही थी..

“अच्छा हुआ तुम नन नहीं बनी.. और आज तुम यहाँ इतनी खुश हो.. तुम्हारे में तो कुछ परिवर्तन ही नहीं हुआ है.. बल्कि अब तो और भी सुंदर लगने लगी हो.. मैंने सोचा नहीं था कि तुम इतना आगे भी आ सकती हो.. इतनी अभाव और गरीबी के कारण.. लेकिन बावजूद इसके तुमने अपने सपने साकार किये..

लेकिन मैं?? .. मैं अपने परिवार से पूरी तरह कट चुकी हूँ..कोई हाल-चाल न पूछने वाला.. शुरुआत में तो अच्छा लगा काम करके लेकिन उसके बाद तो बस मैं कठपुतली….!!”

इतना कहते-कहते उसका गला भर आया.. आँखों में आँसू झर-झर गिरने लगे… मैं अब सबकुछ समझ चुकी थी कि इनके साथ क्या हुआ होगा.. एक नारी की पीड़ा को मैं बखूबी समझ रही थी… मैं बस उसको ढाढ़स और सांत्वना दी, इसके अलावा मैं और कर भी क्या सकती थी..

और तब से मैं इन जैसी और भी ननों से मिली.. और कुछ जानने की कोशिश करने लगी.. बात थोड़ी कुरेदने पे सब आप बीती अपने आप सामने रख देती. और तब से अबतक का निष्कर्ष यही है कि ननें दिन में गरीबों की सेवा करती है और रात में पैस्टर्स की… ननें परपुरुष से संपर्क न होने का संकल्प लेती हैं और यीशु को ही अपना पति मानती हैं.. लेकिन पैस्टर्स के आगे बस बिस्तर बन के लेटी रहती हैं..

जो अपने को इन माहौल में फिट कर पाती हैं वो ननें आदर्श बनती है दूसरों के लिए… नई-नवेली ननें लन्दन और यूरोपीय देश जाती हैं भ्रमण के लिए! .. भ्रमण के लिए ?? .. नहीं.. गोरे फादरों के आगे लेटने के लिए .. फिर वापस आने के बाद इन्हें देश भ्रमण कराया जाता हैं..

इतना ही नहीं नये-नये लोगों को क्रिश्चियनिटी में लाने के लिए उनके आगे इन्हें लिटाया जाता हैं.. और जो ऊपर उल्लेखित नन जैसी होती हैं वो रोज-रोज मरती हैं.. और एक सामान्य आयु गति से दोगुने तेज़ गति से बूढ़ी होते जाती हैं.
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बस और क्या कहूँ.. क्रिसमस का यही तोहफा ले लो…

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