किसमिस ही क्यों, अखरोट, बादाम, छुहारे सब हैं तुम्हारे!

कोई कहता है कि हिन्दू बड़ा उत्सवधर्मी समाज है इसलिए सबके त्यौहार मनाता है तो कोई कह रहा है कि हमारी सबको आत्मसात करने की सहिष्णु प्रवृत्ति है.

बात करते हैं उत्सव धर्मिता की… ज्यादा समय नहीं बीता जब हिन्दू समाज होली और दिवाली के अतिरिक्त बीसिवों अन्य त्यौहार बड़े धूम–धाम से मनाता था.

देखते ही देखते नाग पंचमी, कजरी तीज, अनंत चतुर्दशी, हरितालिका तीज, मकर संक्रांति, बसंत पंचमी जैसे तमाम त्यौहार या तो अपनी आखिरी सांसें गिन रहे हैं या क्षेत्र विशेष तक सिमट कर रह गए हैं.

दक्षिण भारत में होली के दिन छुट्टी नहीं रहती, यदि होली सप्ताहांत (शनिवार, रविवार) को नहीं पड़ी तो सब मुँह में पावडर पोत के दफ्तर पहुँच जाते हैं और उत्सव धर्मिता चली जाती है तेल लेने….

कलरलेस होली की बात करने वाले उत्सवधर्मी हैं… अक्षय तृतीया, राम नवमी और श्री कृष्ण जन्माष्टमी जैसे पर्व (हमारे आराध्य अवतारों के जन्मोत्सव) मात्र धार्मिक व्रत बनकर रह गए हैं और हम बात करते हैं उत्सवधर्मिता की…

बात कर लेते हैं आत्मसात और सहिष्णुता की, उत्तर भारत में कितनों को बिहू, पोंगल, ओनम के दिन बधाई और शुभकामनाएं देते देखा है?

कुछ साल पहले की घटना याद आ रही है, करवा चौथ पर किसी नबाब की रखैल का कोई बयान आया था, जिस पर क्रिया – प्रतिक्रिया का दौर चल रहा था.

किसी चैनल वाले ने एक मशहूर क्रिकेटर की धर्म पत्नी से राय मांग ली… महोदया एक मिनट में, “Karwa Chauth is not a Marathi Festival… so no comments” कह कर चलती बनी.

कहने का मतलब कि हमारी सहिष्णुता भी बड़ी स्वार्थी है… यह भी कुछ ख़ास चुनिन्दा अवसरों पर ही जाग्रत होती है…

दरअसल तमाम हिन्दू, सांस्कृतिक प्रदूषण रूपी वैचारिक बवासीर का शिकार हैं, जो ख़ास समय जैसे कि क्रिसमस, न्यू ईयर, ईद – बकरीद आदि अवसरों पर ही उभरती है…

इसके बाद भी कोई “मेरी क्रिसमस” कहना चाहता है तो भइया बिलकुल, तुम्हारी ही है क्रिसमस, कोई तुमसे छीने नहीं ले जा रहा है… किसमिस ही क्यों, अखरोट, बादाम, छुहारे सब तुम्हारे!

पुनश्च: यहाँ वैंकुवर में, कार्यालय में अगले साल तक के लिए छुट्टी है. 22-23 दिसम्बर से जनवरी 2-3 तक लगभग सभी बड़ी MNC में अवकाश ही रहता है. मुद्दे की बात यह है कि सभी अंग्रेजों ने Happy Holiday कहा, किसी ने “मेरी क्रिसमस” नहीं कहा.

उन्हें अच्छे से ज्ञात है कि मै एक हिन्दू हूँ और मुझे क्रिसमस की शुभकामनाएं देना औचित्यहीन है… वह बिलकुल वैसा ही होगा जैसे मैं उनको होली या दीवाली की शुभकामनाएं दे रहा हूँ.

वो अच्छे से समझते हैं कि इस तरह की बाते औचित्यहीन और सतही हैं, जिनका कोई अर्थ नहीं है… इनसे किसी की भावना भी आहत हो सकती है…

दूसरी तरफ, कुछ नव-चिलगोजे टाइप के हिन्दू आज रात से ही “मेरी क्रिसमस” के सन्देश भेजना शुरू कर देंगे.

सोच रहा हूँ कि आखिर गलती किसकी है. हम अंग्रेजों को नाहक ही दोष देते हैं… असली दोषी तो हम हिन्दू स्वयं हैं जो वैचारिक प्रदूषण की पगड़ी पहनने में गौरवान्वित अनुभुव करते हैं!

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