बॉक्स ऑफिस की ‘धाकड़’ दंगल : हरियाणा की गलियों से शुरू होकर कॉमनवेल्थ खेल तक का रोमांचक सफ़र

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रात 11.45 बजे जब मैं दंगल का आखिरी शो देखकर बाहर निकला तो काफी कुछ स्पष्ट हो चुका था. ये एक ठाठिया थियेटर था, मल्टीप्लेक्स नहीं. किसी फिल्म के बारे में दर्शकों का असली मूड जानना हो तो सिंगल स्क्रीन वाली ठाठिया टॉकीज का ही रुख करना चाहिए.

50 रूपये की बॉलकनी पहले ही भर चुकी थी तो नीचे बैठकर खालिस आम दर्शकों के साथ फिल्म देखने का सौभाग्य प्राप्त हो गया. कुछ ऐसे संभ्रांत परिवार भी नीचे बैठे दिख गए जिनको बॉलकनी नसीब नहीं हो पाई थी.

मुझे याद नहीं कि फिल्म शुरू होने और खत्म होने के बीच कोई ऐसा लम्हा आया हो जब हमने अपना मोबाइल निकाल कर देखा हो. फिल्म दर्शक को इस कदर जकड़ लेती है कि घर जाने और नींद के आगोश में आने तक वह दंगल से मुक्त नहीं हो पाता.

इसी साल हमें फिल्म उद्योग ने एमएस धोनी और सुल्तान जैसी उत्कृष्ट खेल फिल्मों का उपहार दिया है और अब साल के अंत में एक और बेहतरीन खेल फिल्म आई है जिसके लिए जबर्दस्त जुनून देखा जा रहा है.

बेटे की चाह में चार बेटियां पैदा कर चुका फोगाट परिवार उस दिन सकते में आ जाता है जब गीता और बबीता गांव के छोरो को जमकर पीट डालती है.

गीता और बबीता को उनका पिता महावीर सिंह फोगाट पहलवान बनाने की जिद पर आ जाता है. सुकोमल बेटियों को अखाड़े की माटी और मुग़दर की कठोर भाषा सीखनी पड़ती है.

गांव के देसी दंगल में लड़की मर्द पहलवानों को उठा उठाकर पटकने लगती है. ये सफर हरियाणा की गलियों से शुरू होकर 2010 के कॉमनवेल्थ खेलों के आखिरी रोमांच पर खत्म होता है.

पहले दंगल में जीते 50 रूपये के नोट से स्वर्ण पदक हासिल करने का ये सफर बड़े परदे पर आंसू और हर्ष के मिश्रित रसायन के साथ भव्यता से प्रस्तुत होता है.

ऐसा लग रहा था कि सुल्तान पहले प्रदर्शित करके सलमान खान बॉक्स ऑफिस की बाज़ी जीत गए लेकिन अब लग रहा है दंगल आने वाले दिनों में सुल्तान को भी पछाड़ देगी.

आमिर खान, फातिमा सना शेख, सान्या मल्होत्रा, सुहानी भटनागर और ज़ारिया वसीम फिल्म के मुख्य आधार स्तम्भ है. ये लड़कियां जिन्हें कोई कल तक जानता भी नहीं था, आज घर-घर में चर्चित हो गई हैं.

गीता की युवावस्था का किरदार निभा चुकी ज़ारिया वसीम आने वाले वक्त की सितारा होंगी इसमें कोई शक नहीं. सुहानी भटनागर का अभिनय भी बेहद प्रभावित करता है.

आमिर खान ने दंगल के लिए विशेष तैयारी की थी. फिल्म में वे दो लुक में नज़र आए हैं. एक युवा कसे हुए बदन वाला पहलवान और दूसरा वृद्ध हो चुका थुलथुले बदन वाला महावीर.

चूँकि आमिर को ठीक इस फिल्म के बाद नई फिल्म के लिए कसे हुए बदन का लुक चाहिए था इसलिए कहानी का बाद वाला हिस्सा पहले शूट किया गया और पहले वाला बाद में. वृद्ध फोगाट के सीन शूट करने के बाद आमिर ने कसरत कर बदन को तराशा.

निर्देशक नितेश तिवारी ने फिल्म के हर विभाग में जोरदार काम किया है. फिल्म के ‘मास्टर शॉट’ हो या कैमरा वर्क, नितेश बेजोड़ साबित हुए हैं.

फिल्म के गीत प्रीतम चक्रबर्ती ने तैयार किये हैं जो फिल्म की कहानी में गुंथे हुए हैं. प्रीतम का संगीत दंगल की आत्मा बनकर उभरता है. हानिकारक बापू, गिलहरियां और धाकड़ बहुत लोकप्रिय हो रहे हैं.

कुल मिलाकर दंगल हमें निर्मल आनंद देती है. कुश्ती की बारीकियां सिखाती हैं और सबसे अहम् कि सन्देश देती है. खेल के प्रति समर्पण और गुरु की अहमियत सिखाती है.

फिल्म में ख़ास दृश्यों पर बहुत मेहनत की गई है. गीता फोगाट का अपने पिता के साथ कुश्ती लड़ने वाला सीन बहुत वास्तविक है. जिन्होंने ये सीन देखा होगा वे मेरी बात से सहमत होंगे.

इसके अलावा जब गीता गोल्ड मैडल के लिए आखिरी 17 सेकेण्ड में जो दांव लगाती है, उसे विशेष कैमरा तकनीक से दिखाया गया है. यही फिल्म का मास्टर शॉट है.

जब फिल्म शुरू हुई तो राष्ट्रगान नदारद था. एक सवाल मन में उठने लगा जिसका जवाब आखिरी के एक दृश्य में मिला.

भारत 55 किलोग्राम महिला वर्ग के फाइनल में पहुँच गया है. गीता का पिता उसका पहला कोच है सो इस नाते दर्शक दीर्घा में बैठकर उसका हौसला बढ़ा रहा है.

गीता का नया कोच दुर्भावना से ग्रसित होकर फाइनल से पहले फोगाट को धोखे से एक कमरे में बंद करवा देता है. कमरे में बंद बाप बेटी की जीत के लिए प्रार्थना कर रहा है.

तभी राष्ट्रगान शुरू होता है और आंसू पोंछता फोगाट उठ खड़ा होता है. सावधान की मुद्रा में खड़ा फोगाट जान चुका है कि भारत जीत गया है. साथ ही सारे दर्शक उठ खड़े होते हैं राष्ट्रगान के सम्मान में…

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