एक आदमी की महान कहलाने की महत्वाकांक्षा की कीमत चुकाता देश

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किसी भी देश के लिए उसकी विदेश नीति सबसे कठिन होती है. कांटो की सेज, बेहद जटिल. विदेश नीति बनाना एक हवा में बंधी रस्सी पर बिना सहारे के चलने से ज्यादा मुश्किल है.

इसका कारण यह है कि विदेशों से सम्बन्ध किसी सिद्धान्त या नीति से नहीं चलते बल्कि विशुद्ध व्यापारिक और आर्थिक कारणों से चलते हैं. अन्य महत्वपूर्ण कारण सामरिक हित होते हैं. यहाँ कोई देश किसी का नहीं जब तक आपसी हित न सधते हों. यहाँ स्वार्थ सबसे ऊपर होता है.

डॉनल्ड ट्रम्प अमेरिका के नए राष्ट्रपति हैं, एक महीने में कार्यभार संभाल लेंगे. जब वो राष्ट्रपति बने तो उन्हें ताइवान देश के राष्ट्रपति ने फोन करके बधाई दी. इस फोन को ट्रम्प साहब ने खुद अटेंड किया.

अमेरिकी इतिहास में ये अद्भुत घटना थी. प्रोटोकॉल के तहत अमेरिका, ताइवान को संप्रभु देश नहीं मानता, उसके साथ राजनयिक सम्बन्ध नहीं रखता. अगर ट्रम्प ने खुद फोन अटेंड किया, इसका अर्थ उन्होंने अमेरिका की पॉलिसी में बदलाव का संकेत दिया.

और चाइना ने इसका पुरजोर विरोध किया. हर लेवल पर किया. चाइना के राष्ट्रपति, अख़बार, विदेश मंत्री, सभी ने ट्रम्प की आलोचना की, चाइना-अमेरिका के रिश्तों पर पड़ने वाले असर को रेखांकित किया. धमकाया, चिरौरी की और अंत में अमेरिका को वन चाइना पॉलिसी की याद दिलाई. चीन ने कहा कि अमेरिका ने वन चाइना पॉलिसी के लिए प्लेज (संकल्प, प्रण) लिया हुआ है.

अब ये वन चाइना पॉलिसी क्या है?

1949 में सिविल वॉर के बाद जब चीन पर कम्युनिस्ट पार्टी का कब्ज़ा हुआ तब नेशनलिस्ट लोगों ने ताइवान नामक जगह में शरण ली. उसे स्वतंत्र देश घोषित किया और वहां अपना शासन स्थापित किया. चीन, ताइवान को अपना एक राज्य मानता है जिसे वो एक न एक दिन अपने में मिला लेगा, जैसा तिब्बत को मिला चुका है.

जब चीन ने अमेरिका एवं अन्य देशों के साथ राजनयिक रिश्ते बनाने शुरू किये, तब जब वो कम्युनिस्ट शासन से बाहर आकर अपने देश को विश्व की आर्थिक महाशक्ति बनाने पर अग्रसर हुआ, तब चाइना ने हर देश के साथ संबंधों की एक शर्त रखी.

वन चाइना पॉलिसी. अर्थात ताइवान चीन का अंग है. अगर चीन से रिश्ता है तो ताइवान से रिश्ते तोड़ने होंगे.

चीन का इतना बड़ा बाजार, मैन्युफैक्चरिंग हब, तमाम देशों ने बड़ा मौका देखा. ताइवान में दूतावास बंद होने लगे. अमेरिका ने भी अपना दूतावास बंद किया. वन चाइना पॉलिसी की जीत हुई.

लेकिन फिर विदेश नीति इतनी आसान कब थी? वही देश कामयाब है जो सबसे धूर्त है और इसमें अमेरिका का कोई मुकाबला नहीं.

अमेरिका ने ताइवान में एक यूनिवर्सिटी खोली, निजी तौर पर खुलवाई. वहां से वो अपने दूतावास चलाता है. हर तरह के सम्बन्ध रखता है. इसके अलावा एक पिद्दी से देश ताइवान को ही अमेरिका ने चीन के बराबर खड़ा कर दिया. बिना कोई ऑफिशियल रिश्ता रखे.

अमेरिका ने ताइवान को आर्थिक रूप से महाशक्ति बना दिया. खासतौर पर इलेक्ट्रॉनिक्स में.

और सामरिक रूप से भी. अमेरिका ने ताइवान को तमाम डिफेन्स सिस्टम बेचे. पिछले कुछ सालों में 12 बिलियन डॉलर के मिसाइल और अन्य इक्विपमेंट. एक हाथ से देता है, दूसरे हाथ से लेता है. निवेश भी, कमाई भी. चीन के सामने भला बना हुआ है. ताइवान के सामने भी.

चीन में कोई नहीं पूछता कि उसके राष्ट्रपति ने अमेरिका के राष्ट्रपति को झूला झुलाया तो भी अमेरिका चीन के कब्जे में क्यों नहीं है.

खैर ये अमेरिका और चीन का उदाहरण विदेश नीति में धूर्तता बताने के लिए. जो जितना धूर्त उतना कामयाब. तुम डाल-डाल, मैं पात-पात.

भारत में भी उसकी विदेश नीति के गुण गाये जाते हैं. खासतौर पर प्रथम प्रधानमंत्री जी के. वो बहुत महान थे, हद से ज्यादा महान. उनके बाद भगवान ने महान प्रधानमंत्री बनाने बंद कर दिए.

नेहरू जी विश्वनेता थे. महान बचपन से ही थे. उन्होंने भारत की विदेश नीति आदर्शवाद की बुनियाद पर रखी. कश्मीर में पाकिस्तान ने दखल दिया. सबसे पहले नेहरू जी ने कश्मीर को UN (संयुक्त राष्ट्र) को सौंप दिया. भाई विश्व बिरादरी, तुम फैसला करो. हम महान लोग हैं.

इस नीति का आगे आने वाले प्रधानमंत्रियो ने अनुसरण किया. एक मामूली बदलाव के साथ. उन्होंने कहना शुरू किया कि कश्मीर द्वियपक्षीय मसला है. इसे भारत पाकिस्तान को मिलकर सुलझाना है.

गौर कीजिये, चाइना ने जब देशों से सम्बन्ध स्थापित किये तो अपनी ताकत का इस्तेमाल किया. उनसे साइन करवाये कि ताइवान चाइना का हिस्सा है. तिब्बत तो बहुत पहले ही हो चुका था. हॉन्गकॉन्ग उसने ब्रिटेन से ले ही लिया.

और भारत के प्रधानमंत्री विदेश दौरे के बाद जब प्रेस कांफ्रेंस को संबोधित करते थे तो बताते थे कि कश्मीर द्विपक्षीय मसला है. और इसे सम्बंधित देश ने मान लिया है.

आखिर हम महान लोग थे. आदर्शवादी लोग. हमने देश दान किये हैं, फिर पानी क्या चीज है.

महान नेहरू जी पाकिस्तान से शांति चाहते थे. पाकिस्तान कश्मीर को अपना बताता था. कश्मीर उसका तो उसकी नदियां भी… पाकिस्तान की.

नेहरू जी ने पाकिस्तान की भावना समझी. और पाकिस्तान के साथ सिंधु नदी जल समझौता किया. जिसके तहत भारत ने तीन नदियों के पानी पर अपना हक़ छोड़ दिया.

नेहरू जी ने फैसला दिया कि हम इन तीन नदियों का 81% पानी पाकिस्तान को देंगे. अगर कोई बिजलीघर इन नदियों पर बनेगा तो कोई बांध बनाकर इनका पानी नहीं रोका जायेगा.

जान लीजिये कि चीन से होकर सतलुज, ब्रह्मपुत्र और कई नदियां भारत में आती हैं. भारत और चीन में समझौता नहीं है, न हो सकता है.

कुछ साल पहले सतलुज नदी के चीन वाले हिस्से में भू स्खलन से नदी रूक गयी थी, झील बन गयी थी और फिर जब झील टूटी तो उसकी बाढ़ भारत में आयी थी.

तब भारत बहुत गिड़गिड़ाया कि उस कृत्रिम झील को देखने, उसका अध्ययन, उसके प्रभाव को समझने की इजाजत चीन दे. लेकिन चीन ने उसकी तस्वीर भी न दी.

और भारत ने अपनी तीन नदियां पाकिस्तान को दे दी. लेकिन सिर्फ इतना ही नहीं किया. अभी महानता पर मुहर कहाँ लगी. पाकिस्तान को नेहरू जी की महानता पर विश्वास नहीं था. नेहरू जी इस बात पर बहुत नाराज हुए.

समझौते में लिखा गया कि इस ट्रीटी की गारंटी वर्ल्ड बैंक लेता है, जब तक नश्वर संसार रहेगा, वर्ल्ड बैंक भारत के गले में रस्सी बांधकर पाकिस्तान को पानी दिलवाएगा.

यही कारण है कि ये ट्रीटी रद्द नहीं हुई. कई बार युद्ध हुए लेकिन इस ट्रीटी पर फर्क नहीं पड़ा.

अब मोदी सरकार ने इस ट्रीटी पर पुनर्विचार शुरू किया तो पाकिस्तान वर्ल्ड बैंक पहुंच गया. पाकिस्तान की अपील पर वर्ल्ड बैंक ने एक कोर्ट बना दिया, भारत को सम्मन भेज दिया. एक न्यूट्रल आर्बिट्रेटर नियुक्त हो गया. जो इस मसले की सुनवाई करेगा.

एक आदमी की महानता की इतनी बड़ी कीमत चुका रहे हैं. बेइज्जती झेल रहे हैं. आदर्श बनने की कीमत दे रहे है. एक आदमी की महत्वाकांक्षाओं की कीमत.

जब अन्य देश नाटो बना रहे थे, G-7 और G-20 बनाकर आपसी रिश्ते, आर्थिक, सामरिक और व्यापारिक सहयोग कर रहे थे… हम निर्गुट आंदोलन का ढोंग कर रहे थे. आदर्शवाद स्थापित कर रहे थे. विश्व में अहिंसा और प्रेम फैला रहे थे.

काश कोई मोदी जैसा प्रधानमंत्री इस देश को पहले मिला होता जो विदेश नीति में कुटिलता को समझता. जिसके लिए देशहित सर्वोपरि होता.

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