मूर्त से भी प्रकट होता है अमूर्त ही

Bhadrachalam-Vaikuntha-Rama

नास्तिक होना मुझे एक बचकाना अहंकार प्रतीत होता है, और आस्तिक मैं कभी हो नहीं पाया. बचपन से चले आ रहे इस आंतरिक संघर्ष ने बडा संत्रास दिया है. जब भी किसी मंदिर मस्जिद में जाता हूँ तो किसी अरूप से तीन ही चीजें मांगता हूं ::: अपने पुत्र का योगक्षेम, सारे मित्र परिजनों के लिए सुख शांति और अपने लिए श्रद्धा का प्रसाद. आशा करता हूँ कभी वह इस अकिंचन की भी सुनेगा.

पिछले वर्ष दोबारा भद्राचलम के श्रीसीताराम मंदिर जाने का सुयोग हुआ. सहयोगियों ने ब्राह्म मुहुर्त में होने वाले अभिषेकम् की प्रक्रिया के विशेष दर्शन की व्यवस्था की थी. काले पत्थर की सुंदर किंतु काल के प्रभाव से किंचित क्षरित् हो रही प्रतिमा – श्रीराम जी की बायीं जंघा पर विराजमान सीता.

वेदमंत्रों के उच्चार के साथ चांदी की बनी एक शंखाकार अरघी से मूर्ति को एक पंडित दुग्ध से स्नान करा रहे थे. काले पत्थर पर सफेद दूध की धाराएं बडी मनोरम लग रहीं थीं. श्रीराम के शरीर पर तो प्रस्तर के ही आवरण थे, पर माता सीता के शरीर पर ऊपर से भी वस्त्राभरण डाल दिये गये थे – धातु की बनी कंचुकी, एक लहंगा और एक उत्तरीय.

दुग्ध स्नान के उपरांत भगवान् का जलाभिषेक हुआ. फिर हल्दी, चंदन और कुंकुम का लेप. फिर दुग्ध स्नान और फिर जलाभिषेक. यह प्रक्रिया चार पांच दुहराई गयी और अंततः श्रीराम और सीता के मस्तकों पर तुलसीदल की मालाएं और रुद्राक्ष के बने कंठाहार रख कर उनका अभिषेक किया गया. फिर देव प्रतिमाओं और दर्शनार्थियों के बीच एक पर्दा खींच दिया गया और मंत्रोच्चार करने वाले पंडित तेलगू में श्रीसीताराम मंदिर और रामदास महात्म्य, तथा सुल्तान तनका शाह की कथा सुनाने लगे.

करीब आधे घंटे के बाद सामने का पर्दा हटाया गया. सहसा यह विश्वास नहीं हुआ कि हम उसी प्रतिमा का साक्षात कर रहे हैं कि जिसका अभिषेक हम थोडी देर पहले तक देख रहे थे. श्रीसीताराम का देदिप्यमान ऐश्वर्य देखते ही बनता था. भारी कारीगरी वाले रेशमी वस्त्र, रत्नखचित स्वर्णाभूषण, श्रीराम के मस्तक पर लम्बा, दप दप करता किरीट, चार भुजाओं में सोने के ही बने धनुष, बाण, शंख और चक्र (ठीक इसी शैली का एक चक्र मंदिर के विमान पर भी शोभायमान है). पूरा गर्भगृह ही क्या, पूरा मंदिर परिसर ही मानो एक आलौकिक प्रभा से भासित हो रहा था.

पीछे खडे किसी व्यक्ति ने मंद स्वर में गाना शुरु किया – आपदाम् अपहर्तारम्, दातारं सर्व संपदा. लोकाभिरामं श्रीरामम् , भूयो भूयो नमाम्यहम्…

– संजय कुमार

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