भारतीय मुसलमान तब तक ही भारतीय है जब तक कि उनमें जिन्दा है हिन्दू तत्व

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भारत में दो तरह के मुसलमान पाये जाते हैं.. एक भारतीय मुसलमान और दूजा अरबी मुसलमान.. !

भारतीय मुसलमान यानि भारतीय मानसिकता वाले मुसलमान, और अरबी मुसलमान यानि अरबी मानसिकता वाले मुसलमान.

चम्बल घाटी जो कुख्यात डाकुओं के लिए जानी जाती है वहाँ हजारों मुस्लिम जाट, गुर्जर, यादव और राजपूत शासकों के अधीन रहे जब दिल्ली में सय्यद, लोदी, ख़िलजी और मुग़ल राज कर रहे थे.. लेकिन इन्हें कभी कोई परेशानी नहीं आई.. क्यों नहीं आई जानते हो क्यों? .. क्योंकि ये भारतीय इस्लाम को मानने वाले लोग थे, अरबी इस्लाम से कोसों दूर!

काफी हद तक मैं सहमत हूँ! .. लेकिन भारतीय इस्लाम??

ये जरा मुझे अटपटा सा लगता है.. मैं तो कहूँगा कि ये भारतीय इस्लाम नहीं बल्कि हिन्दू हैं.. इन्हें तो इस्लाम के बारे में तो कुछ पता ही नहीं होता है.. कुछ भी नहीं.. इनका अरबीकरण बड़े तरीके से होता है.

जब देश का बंटवारा हुआ था तो बहुत जगह दंगे हुए थे.. उत्तर भारत, पूरब भारत और दक्षिण में भी खूब दंगे हुए थे.. लाखों लोग मारे गए थे.. लेकिन सुदूर गाँव-देहातों में कोई हलचल नहीं थी.. मेरे झारखण्ड साइड तो कुछ भी नहीं.

सब मौज में थे.. गुजर मियां, फुचन मियां, शंकर मियां, मंगर महतो, शुकर महतो, बुधन महतो के साथ खूब मस्ती से काम कर रहे थे. देश का बंटवारा हो रहा क्या हो रहा बिल्कुल ही बेफिक्र… केवल इनके नाम में बस मियां लगा था.. इस्लाम से तो ये कोसों दूर थे.. कुछ अता-पता नहीं इस्लाम के बारे में.

दिन में बीसों बार ‘राम-राम’ होता था एक दूसरे से.. अभी भी ऐसे बूढ़े मिल जाएंगे जो सिर्फ नाम के मियां हैं.. इनसे इस्लाम के बारे में पूछो तो कुछ भी नहीं बता पाएंगे.. कोई भी मुसलमान अपने नबी का नाम बड़े अदब के साथ लेता है, कान पकड़ते हुए भी.. जब भी ‘मोहम्मद’ बोलेंगे तो ‘सल्लाहो अलैहि वसल्लम’ ज़रूर बोलेंगे साथ में.. लेकिन ये तो ऐसे मुसलमान होते है जिन्हें ‘सल्लाहो अलैहि वसल्लम’ बोलने में जीभ भी ठीक से पलटती नहीं है. और न तो वे पाँच वक़्त के नमाजी होते है.. बस कमाते खाते है और मियां नाम ढोते खुश रहते हैं.. उन्हें खुद नहीं पता कि वे मुसलमान क्यों हैं?

तो सिवाय शारीरिक परिधान और मूंछ-दाढ़ी के अलावा एक भारतीय मुसलमान और एक हिन्दू में कोई फ़र्क़ नज़र नहीं आता है .. अगर दूर देश में कोई घटना घटित होती है मुसलमानों के द्वारा तो ये दोनों मिल के गरियाते हैं, कोसते हैं.. न तो ये मुहर्रम में भेद कर पाते हैं और न सरस्वती पूजा में.. बस जम के आनन्द उठाते हैं.।

लेकिन अब परिवर्तन आने लगता है.. गाँव में बरगन्डी कलर का दाढ़ी लिए बड़े भाई का कुरता और छोटे भाई का पायजामा पहने दमदार इतर का फाया कान में ठूंसे मौलवी जी की इंट्री होती हैं.. अरबी पैसे के बल पे मदरसा और मस्जिद खोली जाती है.. और फिर इनमें अरबी इस्लाम नाम का इंजेक्शन डाला जाने लगता है..

बूढ़े तो वही हैं लेकिन इनकी नई पौध?? इनकी नई पौध अब अरबी इस्लाम को धारण किये जा रही हैं.. इस्लाम को अच्छे से समझ बुझ रहे हैं.. इनमें साफ़ परिवर्तन दिखने लगा हैं.. बच्चे अब गोल जालीदार टोपी और उर्दू लफ़्ज़ों से सज्जित होने लगे हैं… मोहम्मद सल्लाहो अलैहि वसल्लम अब फटाक से मुँह से निकलने लगा हैं.. उन्हें अब हलाल क्या हैं और हराम क्या हैं वो भलीभांति मालूम चलने लगा हैं..

काफ़िर कौन होते हैं कुफ़र क्या होता हैं, उनके दिमागों में ठूंसा जा रहा हैं.. जन्नत और हूरें कैसे प्राप्त हो सकती हैं उनकी तालीम दी जा रही हैं… अब मुहर्रम ईद तो बड़े जोश खरोश के साथ मनाते हैं लेकिन दुर्गा पूजा, सरस्वती पूजा से लगातार दूर होते जा रहे हैं.. अब तो हालात ऐसी कि उनके मोहल्ले से कोई प्रतिमा नहीं गुजरेगी.

अब ये भारतीय होते हुए अरबी हुए जा रहे हैं.. खान-पान से लेकर पहनावे तक में अरबियों की नकल किये जा रहे हैं.. एक दातुन से महीना भर काम चला सकते हैं, बिना नहाये हफ्ता भर इत्र छिड़क छिड़क के रह सकते हैं.. लौटा, मग्गा से पछारन करना अब कुफ़्र सा हो गया है.

कुछ सालों बाद अब कह सकते है कि अब ये नई पौध बिल्कुल अरबी हो चुकी है.. !!

अब इन्हें काफिरों के साथ रहने में प्रॉब्लम होने लगी हैं.. इनमें सामूहिकता बढ़ गई हैं.. ये कहीं भी झुण्ड में टूट पड़ते हैं.. अगर कहीं से भी इस्लाम के नाम पे न्योता मिलता है तो बस जिहादी बन कूद पड़ते हैं.

भारतीय मुसलमान तब तक ही भारतीय है जब तक कि वो किसी मुल्ला-मौलवी के संपर्क में न आ जाय और इस्लाम की सही शिक्षा न ले ले. .. इसलाम में दीक्षित होते ही ये उपद्रवी और अंततः इस्लाम के लश्कर बनते हैं.

भारतीय मुसलमान तब तक ही भारतीय हैं जब तक कि उनमें हिन्दू तत्व जिन्दा है..

या सीधे कहे तो आज का भारतीय मुसलमान एक पोटेंशियल अरबी है…

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