नाम में का धरो है बे…

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saifeena son taimur satire

हमाये परम ज्ञानी बालसखा चिरकुटनाथ लांडे ने मुम्फल्ली तोड़ते हुए चिरपरिचित दार्शनिक टोन में हमसे खड़ी भाषा में कहा कि गौतम जी, विश्व के महान नाटककार श्री नाथूराम करमचंद नेहरू जी ने कहा है कि “व्हाट्स इन द नेम..!” , अर्थात् “नाम में का धरो है बे”…अब जबराट उधारी ज्ञान से लबरेज लांडे साब को करेक्ट करना मतलब ख़ुद पर इंद्र के वज्रपात को निमंत्रण देना होता है सो हम चुप रहे, मगर आज उनके इस फन में एक पन(pun) नज़र आया.

वे बोले, भईये, नाम में कछु नई धरो… हमाये इते एक मलखान चचा रए. 38 बरस की भरी जवानी में संन्यासी हो गए काए की उनकी दूसरी बीवी तीसरे बार भग्ग गयी रई.. दो पौने दो साल हरिद्वार, काशी में रहे फिर लौट आये इतयी गाम में! बघेलखण्ड, बुंदेलखंड और महाकौशल क्षेत्र के लोगों को ‘मलखान’ शब्द का इतिहास पता ही है.. बाक़ियों को बता दें की ये महोबा के पाँच शूरवीरों में महाबली भीम सदृश्य थे.

अब हम हमेशा की तरह चाय वाले को दो और चाय का इशारा कर, अपना सम्पूर्ण चित चिरकुटनाथ की बातों में लगा के सुनते रहे उनकी बात.. वे बोले मलखान चचा पूरे 5 फिट 1 इंच के थे और सवा सैंतालिस किलो की भीमकाय व्यक्तित्व के धनी थे. हमने पूछा लांडे साब ये तो बताओ मिहरिया उनकी भागती क्यूँ थी?

वे बोले, यार हम कउन सों ऊँखे घर के दरबान रए जो हमें पता हूहे… और फ़ालतू की बातों में धंसनकी अपनी आदत नईया.. हाँ, उड़त उड़त अफवा सुनी रई के मलखान में मर्दों वाली बात नई थी. ऊपर ते पहली लुगाई सुशीला बाई के भागबे के बाद.. जे दूसर वाली जो सुलक्षणा आई थीं वा के लक्षण ठीक नई रए..! तो हम कह रए हते की भईये की “नाम में का धरो है..”

इतने में बेचारा चिंटू चायवाला चिहक के बोल पड़ा, बड्डे अबई बताये रहे कोऊ नाटककार नेहरू ने कही है जे बात… चाय पकड़ते हुए और मुँह की खैनी एक और थूंकते हुए लांडे साब बोले – ‘अबे, अदरक कूटने में ध्यान दो नई तो तुम्हे कूट देहें और कउन तुमको कलेक्टरी का इझाम निकालनों हे बे..!’  इसके पहले की लांडे साब असंवैधानिक भाषा तक पहुँचते, हमने उन्हें सँभालते हुए कहा -‘ अरे बच्चा है जाने दो प्रभु.’

बिफ़रे हुए लांडे साब बोले – ‘बच्चा हैं तो बोलो की मुँह में अंगुरी डाल के चुप्पे बड़न की बात सुने… ख़ैर, तो नाम में कछु नईया गौतम साब..!’ हम चुस्की लेते रहे और इशारों में चिंटू को समझाये की वो मस्ती से आनंद ले हमारे बालसखा की बाल-सुलभ गप्पों का.

लांडे साब बोलते गए- “अब एक बार हम दिल्ली गए हते, काम रहो यूनिभर्सिटि के प्रोफेसर साब खों तो हम भी हो लिए संगे. वहाँ एक मोटे से सरदार जी मिले हमाये नाम को सुनते ही लगे खिसियाने, अब हम चुप रह गए वा टेम तो… बाद में हमने उनसे पूछी की सरदार जी आपखों नाम का है वे बोले ‘सरदार ज़ालिम सिंह’…

अब हम जो ठठा के हँसे वे घबरा गए और बोले क्यूँ इसमें क्या ग़लत है ‘लांडे’.. हमने कई के कछु नईया गलत मलत, बस जोकर सी सकल बारन को ज़ालिम सिंह सा नाम जँच नई रा..!”

हाहाहा, ठहाका लगते हुए हमने पाया की ख़ुशी से लाल लांडे साब इस दिल्ली की घटना को आज भी दिल्ली फ़तह करने वाले भाव में याद रखे हुए हैं, हमने उन्हें फिर बातों बातों में काका हाथरसी की सुप्रसिद्ध रचना ‘नाम बड़े और दरसन छोटे’ की कुछ पंक्तियाँ पढ़ के सुनायीं की –

“बेच रहे हैं कोयला, लाला हीरालाल,
सूखे गंगारामजी, रूखे मक्खनलाल.
रूखे मक्खनलाल, झींकते दादा-दादी-
निकले बेटा आसाराम निराशावादी.
कहं ‘काका’, कवि भीमसेन पिद्दी-से दिखते,
कविवर ‘दिनकर’ छायावादी कविता लिखते.”

सभी लोग खिलखिला पड़े, तभी बम्बई से छुट्टियों में जबलपुर आये एक मित्र ने कहा -‘ भैया, लेकिन हर इंसान पैसा और शोहरत नाम कमाने के लिए ही तो काम करता है, कमाता है ना.. और वो कहते हैं की आपके जाने के बाद बस आपका नाम ही रह जाता है.’

बालक की धृष्टता को लांडे साब अनदेखा ना कर सके, वे बोले -‘ ऐसो है लल्लू की हमाये आगे फिलॉसॉफी पेलियो मती, और रही बात नाम रह जाता है.. वो सब बम्बईया गानों में रह जाता है खाली. हमाये यहाँ कित्ते फन्ने खां आये और गए… अब कुत्ते भी नई पूँछ रये उन खों..! नाम में का धरो हे बे..!’

हमने कमान सम्भालते हुए, अपने बालसखा के काँधे में हाथ रखा जो सिर्फ मेरा एकाधिकार है… और मैंने कहा-‘ पियूष तुम गलत नहीं हो और लांडे साब भी सही हैं… बस बात इतनी है कि जिन्हें फ़र्क पड़ता है नाम धाम से वे सारी उम्र वे काम करते हैं जिससे उनकी ख्याति और बढ़े, कुछ अपना या अपने बच्चों का अच्छा नाम इसलिए रखते हैं कि कुल का नाम रौशन हो…

अब किसी बच्चे का नाम अगर राम की जगह कुम्भकर्ण रखा जाए तो सारी उम्र वो बच्चा परेशान भी होगा और मज़ाक बनाये जाने का उस पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी पड़ेगा. कभी किसी ने सुना है कि कंसकुमार वर्मा या महिषासुर प्रसाद या शकुनि कुमार झा या रावण मिश्रा…  भई, नाम कमाना एक बात है, लांडे साब सिर्फ़ नाम की बात कर रहे हैं.’

चिरकुटनाथ लांडे का गर्वित चेहरा देख मैं भांप गया कि इनके अंदर का सोया कोई दार्शनिक फिर अंगड़ाई ले रहा है, हमने कहा-‘ सही है न बड्डे..’ वे तुरंत बोले की-‘ गौतम जी, भईये अब तुम जानते हो हमें.. ये कॉनवेंटी चिरांद सरीखे लौण्डे का जाने हमारी कलाएँ यार..!’

इतने में उनकी नज़र पड़ गयी आज के अख़बार पर, और चिहुक के बोले-‘नाश हो जाए इन फ़िल्मी लोगन का… ठठरी बंधे इनकी… दही जार के… साले हमारी भावनाओं का मज़ाक उड़ाते हैं, इनही महतारी की……’ हमने सम्भालते हुए कहा की अरे रुको दादा.. काहे इत्ता गरम हो रए, का हो गओ…’

और उनके फेंके अख़बार को उठा कर हमने देखा कि साहब, सामने खबर थी की पद्म सम्मान से सम्मानित और नवाब पटौदी खानदान के वारिस सैफ़ अली खान को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुयी है और करीना कपूर खान के ज़ानिब से अख़बार ने बताया कि साहबज़ादे का नाम ‘तैमूर’ रखा गया है.

सामने बैठे पियूष ने मुझसे कहा-‘ भैया, क्या ख़बर और दादा इत्ता क्यूँ भड़क गए… और हाँ आप बता रहे थे कि नाम में कुछ नही रखा.. मैं सोचता हूँ आप सही हैं..!’
इतने में भड़के हुए लांडे साब पियूष को धौल जमाते हुए, धकियाते हुए बोले -“अबे, ऐ.. कॉन्वेन्टी… साले अपने बम्बईया बकैती ना भांजो बे यहां… चलो निकलो… ठाकरे तुम्हारा मुम्बई को बम्बई बोल देने में फिल्में रुकवा देता है… और तुम ज्ञान पेल रहे हो नाम में क्या है.. भाग्ग साले, दोगले लोग..”

हम उन दोनों के बीच में कूद पड़े… पियूष से हाथ मिलते हुए बोले की दोस्त घर निकलो और शाम को चाय पे आना… थोड़ा लांडे साब को सम्भालते हैं, दिल के बुरे नहीं हैं.. बस ज़ुबाँ थोड़ी तेज है… और शब्दों में क्या धरा है यार.. भावनाओं को समझो और सुनो.. चाय के पैसे हम दे देंगे.. सुट्टे की भी दे देंगे.. तुम बस निकलो अब यहाँ से.’

तो दोस्तों.. आज सुबह की चाय कट्टे की दार्शनिक कहानी का बड़ा विरोधाभासी अंत हुआ… और हमारा चाय वाला चिंटू तीन-चार शब्द बार-बार पूछ रहा है हमसे – ‘ भैया, ये नाम, शब्द, भावना क्या होता.. कौन किससे , कब कैसे खिलवाड़ कर जाता है.. समझे नहीं..!’

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