हमारे पास ‘राष्ट्रीय चरित्र’ का, सामूहिकता का कोई कांसेप्ट है ही नहीं…

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Sully : Miracle on the Hudson क्लिंट ईस्टवुड की फिल्म है, अभी 2 हफ्ते पहले ही आयी है.

इसमें टॉम हैंक्स एक ऐसे एयरलाइन पायलट की भूमिका में हैं जिसे इमरजेंसी में प्लेन का इंजन खराब होने पर 155 सवारियों से भरी प्लेन को हडसन नदी के बीच में उतारना पड़ता है.

बस, इतनी सी कहानी है, कहानी में कोई ट्विस्ट और टर्न नहीं है…. कहीं भी अनावश्यक रूप से इसे ड्रामेटाइज नहीं किया गया है.

अगर इस कहानी पर बॉलीवुड फिल्म बनाता तो इसका क्या किया होता यह तो एक अलग ही हॉरर स्टोरी है. पर मूल प्रश्न यहाँ कुछ और है.

यह जनवरी 2009 की एक सत्य घटना है. यह एविएशन के इतिहास की अनूठी घटना है जब ऐसी एक क्रैश लैंडिंग की गई और सभी 155 यात्री सकुशल बच गए.

पर इसपर फिल्म बनाई क्यों गयी? यह एक महान सिनेमेटिक थीम नहीं था. पर यह एक रियल लाइफ की बहुत ही इंस्पिरेशनल घटना है…और पश्चिमी समाज ऐसी घटनाओं, ऐसी उपलब्धियों को सेलिब्रेट करना जानता है.

सिनेमा उनके लिए इस घटना के पब्लिक सेलिब्रेशन का माध्यम है… पूरा देश ही ऐसी विषम परिस्थितियों में धैर्य और संयम से, समन्वय के साथ रियेक्ट करना सीखता है… Keep Calm and Carry on… यह यहाँ की संस्कृति में बसा है…

फिल्म में आप दृश्य देखते हैं… जहाज़ पानी में लैंड कर जाता है. सारे यात्रियों को जहाज़ को खाली करके जहाज से बाहर बने इमरजेंसी फ्लोट पर आने को कहा जाता है.

सभी एक एक करके फ्लोट पर आते हैं, लाइफ जैकेट पहनते हैं, उन्हें बचाने के लिए स्टीमर आते हैं… सभी एक-एक करके उसमें चढ़ जाते हैं… कहीं धक्का मुक्की नहीं, कहीं भगदड़ और पैनिक नहीं.

आपदा प्रबंधन और प्रतिक्रिया तो छोड़िए, हमारे दिन-प्रतिदिन की प्रतिक्रिया भी इसके आस-पास भी नहीं है.

पटना स्टेशन पर तिनसुकिया एक्सप्रेस में रिजर्वेशन डब्बे में चढ़ने के लिए भी जो भगदड़ और मारामारी होती है, वह टाइटैनिक के डूबने पर हुई भगदड़ से कम नहीं है.

सड़कों पर ओवरटेकिंग के लिए लोग ऐसे जान देने को तैयार होते हैं जैसे पीछे से गॉडजिला आ रहा हो, जान बचा कर भागना हो.

मंदिरों में, मेले में लोग एक दूसरे पर चढ़े जाते हैं… आये दिन भगदड़ में 50-60 लोग मर जाते हैं.

क्या वे हमसे श्रेष्ठ लोग हैं? क्या, उनमें संयम और धैर्य हमसे ज्यादा है?

बिलकुल नहीं…

व्यक्तिगत रूप से एक भारतीय में संयम और धैर्य उनसे कहीं कई गुना ज्यादा है. पर आपदा के समय हम क्या उतने संयत और व्यवस्थित रूप से व्यवहार कर पाते हैं?

हमारी संस्कृति, हमारा राष्ट्रीय चरित्र वह नहीं है जो हम हैं. हमारा व्यक्तिगत चरित्र हमारा राष्ट्रीय चरित्र नहीं होता…

हम सब मिलकर, सामूहिक रूप से समन्वित रूप में जैसा व्यवहार करते हैं वही राष्ट्रीय चरित्र को निर्धारित करता है.

पर मुझे लगता है, व्यक्तिगत रूप से सामान्यतः बेहतर चरित्र वाले लोगों के इस देश में हमारे पास ‘राष्ट्रीय चरित्र’ का, एक कलेक्टिव करैक्टर, कलेक्टिव आइडेंटिटी का, कलेक्टिविस्म का, सामूहिकता का कोई कांसेप्ट है ही नहीं…

And this is one of our Unknown-unknown … वह अज्ञानता जिससे हम अनभिज्ञ हैं.

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