प्रेम का संगीत : संवाद

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अर्शी :

जब तारों को छूते हो तुम सितार के,
आह्लादित हो स्पंदित होता है
मेरा रोम-रोम,अंग-अंग,
जिससे प्रस्फुटित होता है स्वर।
हर अंग से निकलते हैं
सात स्वर, 24 श्रुतियाँ,
और ले जाती हैं तरंगें…
मुझे शिवरंजिनी की डोली में
किसी सघन वन में,
और अनायास ही
शांत झील के किनारे
फिर तुम्हारी उँगलियाँ
मालकौंस की नौका में बिठा कर
सतत प्रवाहित करती हैं मुझे
और अचानक से
गंधार और निषाद पर आया ठहराव
उड़ा ले जाता है पहाड़ी की चोटी के एकांत पर,
जहाँ से दिखता है क्षितिज।

हर स्थान पर योग घटित हो रहा
राग विराग से परे
अनहद नाद के रूप में।
जब सुनता है कोई और तो
वितरित हो जाता है तरंगों का कुछ अंश,
किन्तु इस एकांत में यह नाद
मुझ से निकल ध्वनित होता जाता है
और प्रतिध्वनित हो
मुझ तक ही लौट आता है,
समाहित होता है
और तीव्र कर जाता है
स्वरों के स्पंदन को।
इस तीव्रता को सहन करने में
अक्षम होती जा रही देह,
चेत आ और जा रहा है,
लग रही समाधि
और हो चुका
मेरा “मैं” समाधिस्थ ॥

अर्श :

खुद भी कहाँ सक्षम हो पाता हूँ
इस तीव्रता को सहने में।
रुकने सी लगती हैं उँगलियाँ मेरी
जब रख देता हूँ अपने हाथ
तुम्हारे कपोल पर
और पाकर तुम्हारे स्पर्श की ऊष्मा
जी उठती है उँगलियाँ मेरी
तुम्हारे ही प्रेमाह्लाद में नृत्य करती हैं
तार पर उँगलियाँ पुन;
और होती जाती है गति
तीव्र,तीव्रतर,तीव्रतम…।

और रच देता है प्रेम
एक अनहद नाद !
फिर तारों के खिंचाव से
हुए विचलन से क्लांत होकर
अपने ही स्वेद में भिगोता हूँ तुम्हें।
और अनहद के निनाद से
गुंजित हृदय लिए…
तुममें ही पाता हूँ विश्रांति,
तुम्हें ही करता हूँ व्यक्त,
और तुममें ही होती है
मेरी अभिव्यक्ति…॥

– आशु चौधरी ”अर्शी”

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