परिवर्तन के बीज : स्वतंत्रता का अर्थ आज़ादी नहीं, अपने बनाए तंत्र में रहना

0
41

“अगले जन्म मोहे अमेरिकन कीजो” जेरी ने व्यंगात्मक ढंग से मोहन की चुटकी लेते हुए कहा. “खाली दिमाग शैतान का घर. भाई परीक्षा के बाद का समय केमिकल लोचा कर ही देता है. चल गोवा चलते हैं, सुना है वहां बहुत सस्ती है.” जेरी बोला.

“हाँ भाई, चलते हैं लेकिन गोवा नहीं कहीं और.”

“फिर कहाँ? थाईलैंड की औकात नहीं है, और गोवा के इलावा कुछ घूमने लायक है नहीं यहाँ.”

“राजस्थान चलते हैं-मेवाड़. मुझे महाराणा प्रताप का किला, संग्रहालय, और समाधी स्थल देखना है. कहीं पढ़ा था, एक बार वियतनाम के प्रधानमंत्री भारत आये. तो उन्होंने सबसे पहले महाराणा प्रताप के समाधी स्थल जाने की इच्छा व्यक्त की.

सरकारी लोग बड़े अचरज में थे कि गांधियों की समाधी छोड़ ये कहाँ चले? जब पहुंचे तो वहां की मिट्टी अपने साथ रख ली. सरकारी लोगो ने पूछा, क्या भई ये मिटटी का क्या करोगे?

उत्तर मिला- बड़े आश्चर्य की बात है, इतने महान व्यक्ति के बारे में आप भारतीय ही नहीं जानते, वियतनाम एक छोटा सा देश होने के बाद भी अमेरिका से इसलिए जीत सका क्योंकि हमें महाराणा प्रताप से प्रेरणा मिली. हम भारत की भूमि को प्रणाम करते हैं कि यहाँ ऐसे महान वीर पैदा किये. ये मिटटी में अपनी देश की मिट्टी में मिला दूंगा.”

“ठीक है, ठीक है वहीँ चलेंगे. चल अभी पका मत.” जेरी ने बोला.

“चल घर चलते हैं. दादाजी को मंदिर लेके जाना है. पापा हैं नहीं मेरी ड्यूटी लगाई है.” मोहन के दादाजी मनोहर लाल शर्मा स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे. 92 वर्ष की आयु में भी प्रतिदिन प्राणायाम, योग करके मंदिर अवश्य जाते थे. वैसे अपने सबसे छोटे पुत्र मुकेश (मोहन के पिताजी) के साथ ही जाते थे पर उनके नगर से बाहर होने के कारण आज मोहन के साथ जायेंगे.

“हेलो, दादाजी?”

“हाँ, बेटा मोहन?”

“मैं आ रहा हूँ आप तैयार रहना मंदिर के लिए.”

“मैं तो कब से तैयार बैठा हूँ. जल्दी आ. पता नही कहाँ दिनभर घूमता रहता है.”

“बस आया दादाजी”

मोहन दादाजी के साथ प्राचीन संकटमोचन हनुमान मंदिर पहुंचा. दादाजी के साथ उसने भी चालीसा पढ़ ली (आखिर चालीसा और दो चार सामान्य मन्त्र छोड़ कर कुछ आता भी नहीं था.) चालीसा का रट्टा मारा था, वो 10 मिनिट में हो गयी. पर दादाजी तो विधिवत पूजन करते थे. तो दादाजी की प्रतीक्षा में व्हाट्सअप-फेसबुक खोल लिया.

आनंद ने वीडियो भेजा है, नीचे लिखा है Must watch. किसी वक्ता के भाषण का अंश. आनंद भी मोहन का अच्छा मित्र है, पढ़ने में होशियार था, IIT मुम्बई से सिविल इंजीनियरिंग कर रहा है.

क्लिक करते ही वीडियो शुरू होता है-

“स्वतंत्रता का अर्थ क्या? आज़ादी? नही! स्वतंत्रता का अर्थ अपने बनाए तंत्र/व्यवस्था में रहना. हमारा सब कुछ तो विदेशी होता जा रहा है, हम यूरोपियन बन जायेंगे तो भारत रहेगा कहाँ? हमारी भाषा विदेशी, कपड़े विदेशी, खाना विदेशी, गाना विदेशी, मनोरंजन विदेशी, अभिलाषा विदेशी, ज्ञान भी विदेशी. इसीलिए मैं कहता हूँ आज़ादी नहीं आई है.”

“देश को जब तथाकथित आज़ादी मिली तो संविधान बनाने के लिए संविधान सभा बनाई गई जिसमें 296 सदस्य थे, उसकी किसी कमिटी के अध्यक्ष थे भीमराव आंबेडकर. इस संविधान को 11 महीने 18 दिन में बनाया गया लेकिन कार्य मात्र 166 घंटे ही हुआ. कैसे विश्व का सबसे बड़ा संविधान मात्र 166 घंटे में बन गया? 1953 में आंबेडकर जी ने कहा भी कि मुझे अनुमति मिले तो सबसे पहले मैं इस संविधान को आग लगा दूँ.”

“असल में जवाहर लाल नेहरू ने अंग्रेजो की शर्त मानी थी कि कानून और शिक्षा व्यवस्था ब्रिटिश की ही चलेगी. तो Government of India act 1935 को बिना कोमा-फूल स्टॉप हटाए वैसा का वैसा (34735 कानून), कुछ और देशों का संविधान भी जोड़ा गया. और अंग्रेजो ने सभी कानून बनाये ही थे भारत के लोगो को गुलाम रखने के लिए.

जैसे इंडियन फारेस्ट एक्ट 1867, इसके अनुसार जंगल ‘सरकार’ की संपत्ति हैं और कोई पत्ता भी ले जायेगा तो अपराधी होगा, इसके लागू होते ही सरगुजा के विश्व का सर्वोत्तम जंग रहित लोहा बनाने वाले 10000 कारखाने बंद हो गए, वो टेक्नोलॉजी भी लुप्त हो गयी, कपास से कपड़ा बनाने वाले हजारों उद्योग बंद हो गए.”

“ऐसा ही है इंडियन पुलिस एक्ट/इंडियन पीनल कोड 1860, जो संस्था हमारी सुरक्षा के लिए है आज आम व्यक्ति उस पुलिस से डरता है और शोषित भी किया जाता है.” वीडियो के अंत में लिखा – भाई राजीव दीक्षित के अन्य वीडियो यूट्यूब पर देखें.

“क्या दिनभर मोबाइल में लगा रहता है? पढ़ते, लिखते हो कि नहीं? पता नही इस ज़माने के लड़कों का क्या होगा? अब चलो 5 मिनट से सामने खड़ा हूँ होश ही नहीं है.” दादाजी मोहन पर क्रोधित हो गए.

“दादाजी, मुझे आपसे आज़ादी वाली कहानियां सुननी हैं जो आप बचपन में सुनाते थे.”

“हाँ बेटा, घर चल खाना खाकर जरूर सुनाऊंगा.” दादाजी का गुस्सा कुछ शांत हुआ. पर मोहन की जिज्ञासा बढ़ती जा रही थी. मन ही मन सोच रहा था मुझे आखिर पहले से यह सब क्यों नहीं पता था. दादाजी के किस्से भी आधे अधूरे एक आध ही याद है.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY