ज्ञान बांटने की वस्तु है, जबरदस्ती ठूंसने की नहीं

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भारतीय स्कूलों में बच्चों को एक दिन में कई पीरियड्स पढ़ने पड़ते हैं. दो पीरियड्स के बीच में ऑफिशियल टाइम टेबल में इसके लिए कोई अंतराल नहीं दिया गया होता.

अतः एक टीचर के जाने और अगले टीचर के आने के बीच में उन्हें लघुशंका, पानी पीने जैसे और काम करने होते है. लेकिन इसके लिए कोई समय नहीं अलॉट किया जाता.

उसके बाद हर टीचर को ये उम्मीद होती है कि क्लास में बैठने वाले प्रत्येक छात्र तरोताजा हो. तुलनात्मक रूप से बच्चों और किशोरों के लिए ये बिलकुल भी आसान नहीं होता. एक नवविकसित दिमाग के लिए मनोवैज्ञानिक तौर पर पांच मिनट के अंदर एक विषय से दूसरे विषय के लिए खुद को तैयार कर पाना इतना आसान नही है.

टाइम टेबल बनाते वक्त कम मौकों पर ही इंटरपीरियोडिक इंटरवल की दरकार महसूस होती है. अगर किसी ने चर्चा भी की तो नजरअंदाज करते हुए उन पर अमल नहीं किया जाता. इसे बच्चों की सामान्य समझ पर छोड़ दिया जाता है.

ध्यान देने योग्य बात ये हैं कि इसमें पहली क्लास तक के बच्चे शामिल होते हैं. यही कारण है कि भारत के ज्यादातर स्कूलों में विज्ञान, गणित, अंग्रेजी को कठिन विषय मानते हुए इनके पीरियड्स प्रथम पाली में लगा दिए जाते है. इसके पीछे का कुतर्क ये होता है कि इन कठिन विषयों को समझने में दिमाग का तरोताजा होना आवश्यक है जो की प्रथम पाली में ही होता है.

बचपन में अक्सर बीमार रहने की वजह से मेरे लिए पढ़ना टेढ़ीखीर जैसा था. इतिहास, भूगोल के चैप्टर को याद करने के नाम से ही मेरी साँसे फूल जातीं थी. सिर्फ मैथमैटिक्स गेम की तरह लगती थी इसलिए पसंद थी.

अपने स्कूल के दिनों के बारे में अगर सोचूं तो मुझे ऐसा लगता है कि अगर उस समय आठ की बजट चार छोटे छोटे पीरियड होते और आठ दस विषय की बजाय बस दो चार विषय होते तो शायद स्कूल के बाद मुझे इतनी पढ़ाई न करनी पड़ी होती.

CBSE द्वारा लिया गया कदम CCE काफी कुछ इसी समस्या को ध्यान में रखकर लिया गया है. परन्तु ऐसा लगता है जैसे दवा की पर्याप्त दी जाने वाली मात्रा में कमी कर दी गयी हो.

फिलहाल वर्तमान शिक्षा का जो स्वरुप है, बेशक मैं उसमे इन्वॉल्व हूँ परन्तु इससे मेरी सहमति बिलकुल नही है. इसे और दिलचस्प और कम बोझिल करने की जरुरत है.

सेकंड हाफ के बाद स्टूडेंट्स का थका हुआ उतरा चेहरा देखने बाद किसी भी अध्यापक के लिए क्लास लेना आसान नहीं होता. क्योंकि की ज्ञान बांटने, देने की विषयवस्तु है जबर्दस्ती ठूंसने की चीज नहीं.

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