नकारात्मक मीडिया ने भारतीय को बना दिया सिर्फ “शिकायत कुमार”

मेरी माँ हमेशा कहती थी “बड़े सोचने वालों की संगत से ही आदमी बड़ा बनता है”.

कल रात डिस्कवरी चैनल पर भारतीय रेल के बारे में कार्यक्रम आ रहा था. जिस तरह से भारतीय रेल में खान पान से लेकर सफाई और तकनीकी कार्य से लेकर सुरक्षा का रोज और इतने बड़े स्तर पर कार्य होता है वो कितना बड़ा और रोज चलने वाला भगीरथी कार्य है वो ऐसे कार्यक्रम देख कर पता चलता है.

फिर तो मुझे एकाएक जल विभाग द्वारा की जाने वाली जलापूर्ति, सफाई विभाग द्वारा की जाने वाली सफाई इत्यादि का ध्यान आ गया .ऐसे हजारों कार्य है जो रोज इतने बड़े स्तर पर इतनी बड़ी जनसँख्या के लिए एक मशीनरी से रोज किये जाते हैं.

जब आप आम भारतीय से बात कीजिये रेल, यातायात, पानी, सफाई, सुरक्षा, सभी मुद्दों पर हर भारतीय इस सिस्टम से नाखुश और अंत में ये कहता जरूर मिल जाएगा “सब चोर है जी .”

हमारे यहाँ आंदोलनों में सार्वजनिक सम्पति को नुकसान पहुँचाना बहुत आम बात है. ये एक तरह से तथाकतिथ “चोरों” पर जनता का गुस्सा भी होता है. पर आखिर क्या वजह है इतनी नाराजगी की?

लोकतंत्र में प्रचार का मुख्य कार्य होता है मीडिया का. दुर्भाग्य से हमारे देश में मीडिया ने सिर्फ नकारात्मक प्रचार के सिवा कुछ किया ही नहीं है. कॉल ड्राप पर सैंकड़ो घंटे कार्यक्रम चला देने वाले कभी भी इतना बड़ा नेटवर्क कैसे खड़ा हुआ और कितनी समस्या से जूझते हैं यह नहीं बताता.

सड़क, फ्लाईओवर, हाईवे, इत्यादि के निर्माण के समय होता ट्रैफिक जाम दिखाने वाला मीडिया, उनके निर्माण में लग रहा श्रम और बाद के फायदे नहीं दिखाता.

नकारात्मक मीडिया ने भारतीय को सिर्फ “शिकायत कुमार” बना दिया है.

मेरी माँ सही कहती थी कि बड़ी सोच वालों के साथ रहने पर ही हम बड़ा सोच सकते है. सबसे ताज़ा उदाहरण नोटबंदी है.

चलिए उम्मीद करता हूँ कि “बड़ा और सकारात्मक” सोचने वाला मीडिया भी हमें मिलेगा. मेरी सकारात्मक सोच का आप इसे प्रारम्भ कह सकते हैं.

–  श्याम साबू

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