मानेगा तो कोई नहीं, फिर भी चलो मज़े ले लेते हैं

0
26

ऐसा सुझाव किसी ने आज तक दिया नहीं होगा और कोई भी राजनीतिक पक्ष या नेता इसे अपनाने की हिम्मत नहीं दिखाएगा इसकी मैं खुद ही गारंटी देता हूँ, फिर भी यह सोच आपके साथ शेयर कर रहा हूँ, सोचो कभी ऐसा हो तो क्या हो….

व्यावहारिक तौर पर हम सब चाहते हैं कि हमारे बच्चों को जिन्दगी में अच्छे जोड़ीदार मिले.

मान लीजिये कन्या का पिता है, वर तलाश रहा है.

जाहिर है कि कोई निकष होंगे, जैसे क्या उसकी कमाई बेटी तथा होनेवाले बच्चों के खर्चे उठाने के लिए पर्याप्त है या नहीं इत्यादि…

अगर बेटी ने खुद पसंद किया है तो उसे सीधा पूछता है कितना कमाते हो. लड़का उसकी अपेक्षा से कम कमाता हो तो नाराजगी जताता है.

…. और अगर लड़का कहे कि उसने, लड़की को दिखाए हुए सभी सपने पूरे करने के लिए ससुर से ही आस लगाई है तो कुछ भी हो सकता है.

और अगर वो पिता उबल पड़े तो कोई इसमें कुछ गलत भी नहीं मानता.

यह रही मेरी बात की बैकग्राउंड. अब मुद्दा देखिये:

जहाँ भी चुनाव होने हों वहां अगर हर पक्ष को कहा जाए कि वो टीवी पर अपने बजट को पेश करे कि कहाँ से पैसे उगाहने वाला है.

अगर जिस पक्ष की सरकार है, उसे देश / राज्य / निगम / पंचायत – जिसके भी चुनाव हों, उसकी मौजूदा आर्थिक स्थिति के आंकड़े पेश करना है, अभ्यास के लिए समय देना है और फिर हर पक्ष – जिसमें वर्तमान सत्तापक्ष भी आ जाता है, अपना पहले वर्ष का बजट प्रस्तुत करें.

चुनाव के विस्तार अनुसार टीवी चैनल नेशनल हो या स्थानीय, सब मतदाताओं को चर्चा देखने को मिले.

चर्चा शांतिपूर्वक हो, शोर कर के सामनेवाले का प्रश्न या फिर कौन क्या कहता है, यह दर्शकों को समझ ही नहीं आये, यह बात न होने पाए. सवाल का जवाब सीधा दिया जाए, बात घुमाई न जाये.

और बंधन यह हो कि जो पक्ष चुनाव जीते उसे वही बजट लाना होगा जो उसने टीवी चैनल पर दिखाया हो.

अब जिस तरह से इस सुझाव को विविध पक्ष के पक्षधर ही लताड़ेंगे या हर कोई कहेगा कि हमारा पक्ष तो ले आयेगा लेकिन क्या आप दुसरे पक्षों की ईमानदारी की गारंटी ले सकते हैं?

मैंने तो पहले ही कहा था कि किसी की ऐसे कुछ करने की हिम्मत नहीं होगी, बस, हर एक के थोड़े मजे ले लेते हैं… अब इतना कहने पर शायद कोई भी कुछ न कहे, यह भी हो सकता है.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY