सामरिक संस्कृति और जन जागरूकता : 1971 युद्ध विजय के आलोक में

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द्वितीय विश्व युद्ध के नायकों में से एक जनरल जॉर्ज पैटन ने कहा था कि “आज़ादी का स्वाद बड़ा मीठा होता और ये सिर्फ वही जान पाते हैं जिन्होंने इसके लिये युद्ध लड़ा है. इसका स्वाद उन्हें पता नहीं चलता जो सुरक्षित रहते हैं.”

युद्ध हमेशा इतिहास रूपी पकवान के महत्वपूर्ण अवयव रहे हैं क्योंकि इतिहास का भी अपना स्वाद है वरना इतिहास-लेखन इतना समृद्ध नहीं होता. इस नज़रिये से देखा जाए तो ये पता चलता है कि किसी युद्ध में मिली जीत से हम क्या सीख सकते हैं.

1971 में मिली विजय और बांग्लादेश का निर्माण भारत के लिये हर तरह से उपयोगी हो सकता था लेकिन हमारी राजनीतिक नेतृत्व क्षमता ने लगभग कोई सबक नहीं लिया और उन्हें भी भुला दिया गया जो इस विजय के असल नायक थे.

जब जिन्नाह ने द्विराष्ट्र सिद्धांत की बात कही थी तो गांधी ने कहा था कि भारत के टुकड़े नहीं हो सकते. इस पर जिन्नाह ने हंसते हुए कहा- भारत एक कब था?

एम. जे. अकबर अपनी पुस्तक Tinderbox में लिखते हैं कि पाकिस्तान का विचार 1940 के मुस्लिम लीग के अधिवेशन के प्रस्ताव से नहीं निकला था बल्कि इस विचार के बीज औरंगज़ेब के समय में ही बो दिए गए थे. इसी विचारधारा ने मूर्तरूप लिया 1947 में जब पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान का उदय हुआ.

देश बनते हैं टूटते हैं पर विचार नहीं मरते. सन् 65 की लड़ाई हारने के बाद भी पाकिस्तान में वो विचार जीवित था जिसने 1970 में शेख मुजीबुर्रहमान को बहुमत मिलने के बावजूद वज़ीर नहीं बनने दिया. जनरल याहया खान ने कहा कि पूर्वी पाकिस्तान की भाषा उर्दू ही होगी, बंगाली नहीं.

पाकिस्तानी फ़ौज के लेफ्टिनेंट जनरल टिक्का ने पूर्वी पाकिस्तान के बुद्धिजीवियों को ढूंढ कर उनका कत्ल किया. टैंक, मशीन गनों के मुंह निहत्थे हिन्दू बंगाली लोगों पर खुले छोड़ दिये गए थे. नरसंहार इस कदर हुआ जैसा नादिर शाह के ज़माने में 17वीं सदी में भी नहीं हुआ था.

13 जून 1971 को Sunday Times में एक ही खबर थी: Genocide. पत्रकार मस्कारेनहास ने 5000 शब्दों में लिखा कि पाकिस्तान की सेना हिंदुओं का पूरा सफाया करने पर तुली थी, भले ही इसके लिये उन्हें बीस लाख हिंदुओं को मारना पड़े.

पण्डित रविशंकर ने बीटल्स के जॉर्ज हैरिसन और सरोद वादक अली अकबर खाँ के साथ मिलकर Madison Square में एक कॉन्सर्ट का आयोजन किया. उम्मीद थी बीस हज़ार की, मिले ढाई लाख डॉलर जिसे बंगाली शरणार्थियों को UNICEF के माध्यम से दान दे दिया गया. जयप्रकाश नारायण जी ने अंतर्राष्ट्रीय समर्थन हासिल करने के लिये 16 देशों की यात्रायें की थीं.

ढाका में अमरीकी राजदूत ब्लड ने अपने आकाओं को लिखा कि हम (यानि अमरीकी) पाकिस्तानी सेना के इस वहशीपन को रोकने में नाकाम रहे हैं. लेकिन राष्ट्रपति निक्सन और राजनयिक सिपहसालार किसिंजर पश्चिमी पाकिस्तान को अपना मित्र बता रहे थे. ये मित्रता 1999-2001 में भी दिखी और आज ग़ुलामी में बदल चुकी है.

बहरहाल, हमनें 1971 में बंगाली शरणार्थियों को पाला पोसा, उन्हें अपनी मुक्ति वाहिनी नाम की voluntary force बनाना सिखाया और उनकी आज़ादी के लिये युद्ध भी लड़ा.

3 दिसम्बर से 16 दिसम्बर तक चले इस युद्ध के नायक थे जनरल (बाद में फील्ड मार्शल) सैम मानेकशॉ, नौसेनाध्यक्ष एडमिरल सरदारी लाल मथरादास नन्दा, एयर चीफ मार्शल प्रताप चन्द्र लाल, बनारस में जन्में R&AW के चीफ रामेश्वर नाथ काव, उनके डिप्टी के. शंकरन नायर, वायु सेना में एकमात्र परमवीर चक्र विजेता फ्लाइट लेफ्टिनेंट निर्मल जीत सिंह सेखों, सेना में तीन PVC विजेता लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल, मेजर होशियार सिंह, लांस नायक अल्बर्ट एक्का और सशस्त्र सेनाओं के सभी जवान और अधिकारी.

लेफ्टिनेंट जनरल जे एफ आर जैकब और लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा ने 16 दिसम्बर 1971 को पाकिस्तान के लेफ्टिनेंट जनरल ए ए के नियाज़ी से आत्मसमर्पण के दस्तावेज पर दस्तखत करवाया. विश्व युद्ध के बाद किसी जंग में मिली ये सबसे बड़ी निर्णायक विजय थी.

अंतर्राष्ट्रीय दबाव को ज्यादा दिन झेलने की ताक़त इंदिरा गांधी में नहीं थी. उनकी डिप्लोमेसी पहले ही दम तोड़ चुकी थी जब अमेरिका ने अरब सागर में जंगी जहाज़ USS Enterprise तैनात कर दिया था.

जनरल जैकब लिखते हैं कि 13 दिसम्बर को संरा सुरक्षा परिषद में अमरीका युद्ध खत्म करने का प्रस्ताव ला चुका था जिसे रूस ने वीटो कर दिया था. रूस ने चेतावनी दी थी कि अगला वीटो नहीं होगा. अगले 3 दिन के भीतर ही हमनें पाकिस्तान को आत्मसमर्पण के लिये मजबूर कर दिया था.

जब 93,000 दुश्मन सैनिक हथियार डाल चुके थे, तब इंदिरा ने संयुक्त राष्ट्र महासचिव को पत्र लिखा कि हम पाकिस्तान से द्विपक्षीय सम्बन्ध चाहते हैं- ये तत्कालीन सचिव पी एन धर ने लिखा है जिसका ज़िक्र जसवंत सिंह ने अपनी पुस्तक India at Risk में किया है. नतीजा निकला जुलाई 1972 के शिमला समझौते के रूप में.

इस समझौते का स्वरुप बड़ा हास्यास्पद है. पहले लिखा है कि हम पाकिस्तान से संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में बताये गए दिशा निर्देशों के आलोक में सम्बन्ध रखेंगे. यह भी कहा गया कि कश्मीर में 1971 तक जो नियंत्रण रेखा की स्थिति है उसका दोनों देश सम्मान करेंगे और कोई भी मसला आपसी बातचीत से सुलझाएंगे. इतना ही नहीं विज्ञान और प्रौद्योगिकी में एक दूसरे की सहायता करेंगे.

ये वो समय था जब हमारे पास कश्मीर दुबारा पाने का मौका था, लेकिन हम दुश्मन से मैत्री सम्बंध बना रहे थे. हमनें LoC के रूप में सियाचेन का भार अपने कंधे ले लिया. जिस तरह नेहरू ने बड़ी चालाकी से खुद को शांतिप्रिय और उदार साबित किया था उसी चातुर्य से इंदिरा ने अपनी छवि कठोर शासक की बनाई.

इतना ही नहीं सशस्त्र सेनाओं के लिये वन रैंक वन पेंशन की व्यवस्था उसी समय खत्म कर दी गई जो अंग्रेजों के ज़माने से चली आ रही थी. राजनीतिक, नागरिक और सैन्य सम्बधों में दरार बढ़ती ही चली गयी.

सवाल ये उठता है कि हम अपनी सामरिक दक्षता और नीतियां किन कसौटियों पर परखते हैं. क्या भारत की कोई सामरिक संस्कृति है जिसको याद कर के हम गौरवान्वित महसूस करें और जो हमें भविष्य के खतरों से निबटने के लिये प्रेरणा दे सके?

पिछले वर्ष सुषमा स्वराज पाकिस्तान को शिमला समझौते की याद तो दिलाई लेकिन वो भी तब जब पाक अधिकृत कश्मीर में खुल्लम खुल्ला मानवाधिकार को धिक्कार कर पाकिस्तान भारत विरोधी गतिविधियों में लिप्त है. हालांकि नरेन्द्र मोदी ने बलोचिस्तान का मुद्दा उठा कर पाकिस्तान की दुखती रग पर हाथ धर दिया है.

जब पाकिस्तान बिहार पर लालू की जीत की ख़ुशी मना सकता है तो हम PoK के लोगों पर ढाये गए ज़ुल्म का मसला अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी के सामने क्यों नहीं रख सकते? हम पाकिस्तान को अंदर से तोड़ने का प्रयास क्यों नहीं कर पाते?

हम संयुक्त राष्ट्र से आतंकवाद के खिलाफ एकजुट हो कर असहिष्णु  होने का सपना देख रहे हैं लेकिन पहले हमें वहां आतंकवाद की परिभाषा लिखवानी पड़ेगी. अगर भारत के प्रयासों से सं. रा. Terrorism की एक सटीक परिभाषा ही अपना लेता है तो बड़ी बात होगी वैश्विक स्तर पर लड़ने की तो बात ही छोड़ दीजिये.

हमने अपने सामरिक प्रतिष्ठानों की इतनी उपेक्षा की है कि दुश्मन गाहे बगाहे चिढ़ाता है. हम महान रक्षा रणनीतिज्ञ के. सुब्रमण्यम को लगभग भुला चुके हैं और आज के समय के विशेषज्ञों की राय विचित्र रूप से बंटी हुई दिखती है. अब तो विदेशी बुद्धिजीवी आ कर हमें नीतियों की शिक्षा देते हैं.

जब 1971 युद्ध के नायक सैम मानेकशॉ का देहांत हुआ था तो एक भी केंद्रीय मंत्री अंत्येष्टि में नहीं पहुंचा था. पत्रकार और पूर्व सैन्य अधिकारी कैप्टन आर. विक्रम सिंह ने लिखा था कि अगर सैम बहादुर अमरीका में होते तो उन्हें द्वितीय विश्व युद्ध के सुप्रीम Allied कमांडर जनरल ड्वाइट डी. आइजनहावर जैसा सम्मान मिलता जो आगे चलकर अमरीका के राष्ट्रपति बने.

हमें समाज में एक ऐसी संस्कृति विकसित करनी थी जिससे युवाओं को स्वतः सेना में योगदान देने की प्रेरणा मिलती और उस जज़्बे से कई पुश्तें तैयार होतीं. आज भारतीय सेना में 14,000 अफसरों की कमी है. सेना, जवान देश के नौजवानों को लुभाने के लिये कंप्यूटर गेम बना रही है. आई आई टी से निकला कोई छात्र शायद ही सेना में नौकरी करना चाहता है.

रक्षा क्षेत्र में हमारे उत्पादन में गुणवत्ता की भारी कमी है. कुंद हथियारों से जंग नहीं जीती जाती. 1971 के बाद भारत का प्रभाव दक्षिण एशिया क्षेत्र में बढ़ने की बजाए घटा है. विघटनकारी शक्तियों का मनोबल ऊंचा है. UN के राजनयिक David Malone लिखते हैं कि भारत की थिंक टैंक बिरादरी उदासीन है जिसे और प्रोत्साहन की जरूरत है.

बुद्धिजीवियों और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया के माध्यम से एक प्रकार का छद्म युद्ध प्रतिदिन लड़ा जाता है. मीडिया एक नए हथियार का रूप ले चुका है. 1999 करगिल युद्ध में जनरल वेद प्रकाश मलिक ने रघु रॉय को युद्ध क्षेत्र से भगा दिया था क्योंकि कुछ दिन पहले किसी और की रिपोर्टिंग से पाकिस्तान को हमारी स्थिति का पता चल गया था.

कहते हैं कि मीडिया वही दिखाता है जो समाज में होता है. इसकी आड़ ले कर सामरिक महत्व से जुड़ी किताबें, पत्रिकाएं हिंदी या क्षेत्रीय भाषाओं में प्रकाशित नहीं होतीं. लोग समसामयिक मैगज़ीन खरीदते हैं ऑनलाइन पढ़ते हैं लेकिन दिवंगत कैप्टन भरत वर्मा द्वारा स्थापित Indian Defence Review बहुत कम लोग देखते हैं.

हमारे देश में कोई भी छात्र defence studies जैसा विषय ले कर पढ़ाई नहीं करना चाहता. स्कूलों की किताबों में युद्ध का इतिहास नहीं पढ़ाया जाता. एयर वाईस मार्शल अर्जुन सुब्रह्मण्यम लिखते हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यह चाहता था कि 1962 में लड़ी गई उन लड़ाइयों की गाथाएं हमें देश को सुनानी चाहिये जिनमें हमे विजय मिली थी. गौरतलब है कि यदि किसी युद्ध को समग्रता में न देख कर टुकड़ों में आंकलन किया जाए तो कई छोटी बड़ी लड़ाइयां लड़ी जाती हैं जिनमें अपने वीर अपने प्राणों की आहूति देते हैं.

अभी कुछ दिन पहले ही फ़ेसबुक के मालिक मार्क ज़ुकेरबर्ग ने अपनी बेटी के साथ फ़ोटो शेयर की और मजाकिया अंदाज़ में कैप्शन दिया कि वो उसे किसिंजर की किताब World Order पढ़ाना चाहता है. ये वही हेनरी किसिंजर है जिसने कभी बांग्लादेश में नरसंहार को रोकने के लिए किसी भी तरह की सहायता देने से मना कर दिया था.

आज शांति का पाठ पढ़ाने वाले किसी भी देश ने 1971 में हमारी सहायता नहीं की थी. हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम अपने बच्चों के मन में किसी हीरो की छवि गढ़ते समय अपनी सशस्त्र सेनाओं को याद करें क्योंकि इतिहास वही बनाया करते हैं, इतिहासकार तो सिर्फ कलम चलाते हैं.

References:-

1. 1971 A Global History of the creation of Bangladesh by Srinath Raghavan
2. India at Risk by Jaswant Singh
3. Tinderbox by MJ Akbar
4. The Blood Telegram by Gary J Bass
5. The Long Road to Siachen by Kunal Verma & Rajiv Williams
6. Does the Elephant Dance by David M Malone
7. National Security a Primer by Col P K Gautam
8. The Man who Bombed Karachi by Admiral SM Nanda
9. Liberation Bangladesh by Maj Gen Dhruv C Katoch
10. The Brave: Param Vir Chakra stories by Rachna Bisht Rawat.
11. Indian Defence Review Net editions.
12. India’s Wars A Military History by AVM Arjun Subramaniam

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