खुद कचरा बन कर सफाई अभियान में ना खड़ी करें मुश्किलें

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एक किराने की दूकान से महीने में 5 से 6 हजार का सामान लेता आया हूँ. नगदी. दुकान के बगल में ही एटीएम मशीन से पैसे निकाल कर दिया करता था.

नोटबंदी के बाद से दुकानदार को कार्ड स्वेपिंग मशीन लगाने की कह रहा हूँ. हर दिन कल का कह-कह के एक महीने निकाल दिए.

साथ ही सामान भी जबरन उधार पर देता रहा. जो मेरे सिद्धांत के खिलाफ है. मगर मैं यही सोच कर सामान लेता रहा कि मशीन लगने पर तुरंत पेमेंट कर दूँगा.

लेकिन अब समझ आ रहा है कि वो नहीं लगायेगा. उसका मकसद नगद में ही धंधा करने का है.

ऐसा क्यों, इसे समझना कोई भौतिक शास्त्र का नया आविष्कार नही!

अब चाहता तो मैं भी नोटबंदी के विरोध में, नोटबंदी से होने वाली तकलीफ पर एक लंबा लेख लिख देता.

और साथ ही एटीएम के सामने पैसा निकालने के चक्कर में अपना समय बर्बाद करता और साथ ही बैंक की लाइन को और लंबी करता.

मगर मैंने उसे चेक से पेमेंट करके नयी दुकान ढूंढ ली, जो डेबिट कार्ड से पैसे लेती है.

यह दुकान रख-रखाव में साफ़ सुथरी है और चूंकि इलेक्ट्रॉनिकली हिसाब-किताब करती है तो उचित टैक्स भी देती होगी अर्थात आर्थिक रूप से भी अधिक साफ़ सुथरी है.

टैक्स चोरी सिर्फ बड़े-बड़े कारखानों के मालिक ही नहीं करते बल्कि हिंदुस्तान की गली गली में लाखों-करोड़ों रूपए सफ़ेद से काला और फिर सफ़ेद किये जाते हैं.

हमारी व्यवस्था ही नहीं विचार भी पूरी तरह से भ्रष्ट हैं. हालात इतने खराब हैं कि डकैतों को पकड़ने की मुहिम में जो लोग लगे हैं, उनमें भी चोरों की संख्या अधिक है.

बैंकों में क्या हो रहा है, किसी से छिपा नहीं. ऐसे में सजग और ईमानदार नागरिक का कर्तव्य और बढ़ जाता है.

हमें यह नही भूलना चाहिए कि पुराने मकान में रहने वालों को, घर की मरम्मत के दौरान अधिक कष्ट उठाना पड़ता है.

साफ़ सुथरा देश चाहिए तो कष्ट उठाइए और साफ़ करने में मदद कीजिये. खुद कचरा बन कर सफाई अभियान में मुश्किलें ना खड़ी करें.

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