विविध भारत-मिज़ोरम : तल्वमंगईहना! सोचो कभी ऐसा हो तो क्या हो…

रोचक तरीके से नयी जगह को दिखाना हो तो डॉ. प्रवीण की ‘अजूबा नॉर्वे’ सीरीज़ अच्छी होती है. अगर वो मज़ेदार तरीके से नॉर्वे के बारे में नहीं लिखते तो हमें तो नक्शे पे नॉर्वे कहाँ है, इस से भी लेना देना नहीं रहता.

नॉर्वे के उनके किस्सों की वजह से बढ़ी रूचि के कारण आज कुमार प्रियांक का लिखा किस्सा दिख गया.

वो अपने बड़े भाई की नॉर्वे यात्रा का किस्सा सुना रहे थे. जब उनके बड़े भाई नॉर्वे पहुंचे, तो वहाँ के अखबारों से पता चला कि नॉर्वे में कोहराम मचा हुआ है!

अब शांतिप्रिय, शिकायत तक करने से परहेज करने वाले मुलुक में कोहराम काहे भैया?

तो भाई इसलिए, क्योंकि किसी हिल स्टेशन पर जाते समय किसी व्यक्ति ने रास्ते में पड़ने वाले दूकान से सामान तो ले लिया, पर उसका पैसा न चुकाया!

नॉर्वे के उस हिल स्टेशन के रास्ते में जितनी भी दुकानेँ थी, किसी में भी दुकानदार नहीं होता.

अपने जरूरत के हिसाब से सामान लीजिये और उनके वहाँ मौजूद रेट लिस्ट के हिसाब से पैसे काउंटर की दराज़ में रख दीजिये.

कहीं बकाया निकलता हो तो, वहीँ दराज में मौजूद पैसों से वापस ले लीजिये. नो झंझट! फटाफट!

बाद में हिल स्टेशन से लौटते समय, जिसने सामान लिया था, उसने पैसे जमा किये. उसने माफ़ी माँगी कि हड़बड़ी में सामान लेने के बाद, वह पैसे जमा करना भूल गया था!

नॉर्वे में लोग अपने पहाड़ों पर बने घर में जब जाते हैं तो फ़ोन, टीवी, इन्टरनेट सब छोड़ के जाते हैं. इसलिए बेचारे को तब तक नहीं पता था कि उससे हुई मामूली भूल के कारण नॉर्वे में कोहराम मच गया था!

सोचिये कि भारत में ऐसा हो तो क्या हो? मतलब दुकानदार अगर काउंटर छोड़ कर चला जाए ग्राहकों पर पैसे खुद देने की जिम्मेदारी छोड़ दे तो क्या होगा?

बड़ा बेकार सवाल है. मुझे पता है ऐसे सवाल पर ज्यादातर लोग हंसेंगे.

अब जैसा कि हम हमेशा कहते हैं, ज्यादातर भारतीय लोगों ने भारत घूम कर नहीं देखा.

अगर देखा होता तो इस सवाल पर बिलकुल नहीं हँसते. क्योंकि भारत के उत्तर-पूर्व में एक राज्य है मिजोरम, जिसकी राजधानी आइज्वाल है.

अगर आप आइज्वाल (Aizawl) के आस पास के इलाकों में घूमने निकलेंगे तो वहां आपको ऐसी ही दुकानें मिलेंगी जहाँ दुकानदार नहीं होता.

सौदा रखा होता है, लिस्ट होती है और एक डब्बा टंगा होता है. इनमें आम तौर पर स्थानीय सब्जियां, छोटी मोटी चीज़ें बिकती हैं.

आम तौर पर घरों के दरवाज़े के पास ही बनी ऐसी दुकानों को “न्घाह लोउ दावर” कहते हैं.

लिस्ट पर आम तौर में रोमन लिपि में कीमत लिखी होती है और प्लास्टिक का डब्बा हवा से उड़े नहीं इसलिए उसे बांध कर या उसके अन्दर बड़ा सा पत्थर डाल के रखते हैं.

ज्यादातर यहाँ मौजूद सामान की कीमत दस-पांच रुपये ही होती है. इन दुकानों पर जो सब्जियां बिकती हैं, उनमें से कोई भी हमने चख के नहीं देखी है. इसलिए स्वाद मत पूछियेगा.

हां मिज़ो लोगों का एक शब्द होता है, “तल्वमंगईहना” जिसका मतलब होता है हमेशा भलाई कीजिये, निस्वार्थ भाव से सेवा कीजिये, लोगों की मदद कीजिये.

पूरा एक वाक्य का अर्थ है, लम्बा चौड़ा सा, इसका अनुवाद छोड़िये, सही-सही उच्चारण भी संभव नहीं.

बाकी घंटे भर के लिए सी.सी.टी.वी. कैमरे ऑफ होने पर जैसी लूट पाट अभिजात्य लन्दन की दुकानों में सोफेस्टीकेटेड लोगों ने की थी, उनकी तुलना में तो ये आदिवासी कहलाने वाले इलाके कहीं बेहतर कहे जा सकते हैं.

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