बेफिक्री से बनाई बेफ़िक्रे : भारतीय युवाओं के मन को नहीं समझ पाए आदित्य

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आदित्य चोपड़ा जैसा बड़ा निर्देशक जब आठ साल बाद वापसी करे तो उनसे एक अच्छी फ़िल्म की आस होती है. लेकिन बेफ़िक्रे देखकर लगता है आदित्य की जानी-पहचानी धार अब कुंद हो चुकी है.

दिल्ली का लड़का धरम गुलाटी और पेरिस की लड़की शायरा की इस प्रेम कहानी में कहानी का कुछ पता नहीं चलता. बेजान ठण्डी कहानी को बेशुमार चुम्बनों से जिलाने की नाकाम कोशिश की गई है.

लड़का-लड़की लिव इन में रहते हैं और ब्रेकअप हो जाता है. बाद की प्रिडिक्टिबल कहानी के आखिरी बेवकूफाना मिनटों में लड़का-लड़की को प्यार हो जाता है.

इस प्यार होने के पहले ही ये दोनों मदमाते फ्रेंच माहौल में सारी कसरत कर चुके होते हैं. जिस्म मिल जाते हैं लेकिन दिल नहीं मिलते.

जाहिर है निर्देशक अपनी कहानी को बोल्डनेस के चरम पर ले जाते हैं. एक्स बॉयफ्रेंड अपनी एक्स के सामने दूसरी लड़की के साथ मधुमास रचाता है.

भाई आदित्य चोपड़ा हम भारतीय आधुनिक हैं लेकिन इतने भी नहीं है कि ऐसी कहानियों को पचा सके. इश्क भारत में भी पलता है लेकिन वो फ्रेंच वाइन और वन नाईट स्टैंड में नहीं पाया जाता.

हमारे यहाँ आलूबड़े की ट्रीट में, बस की लाइन में, गर्म चाय की उड़ती भाप में इश्क पींगे बढ़ाता है. कहानी की बोल्डनेस देखिये कि जिस रात नायक और नायिका पहली बार हमबिस्तर होते हैं, उसी रात नायिका के पूर्व प्रेमी से उसका ब्रेकअप हुआ है.

लड़की को लड़के में कोई रूचि नहीं है, वो तो शराब की खुमारी में अपनी जरूरत पूरी कर रही है. रणवीर सिंह और वाणी कपूर के बीच एक भी दृश्य ऐसा नहीं, जिसमें उनके बीच की केमिस्ट्री झलकती हो.

हमारे युवा दर्शक का भारतीय मन इस फ्रेंच फ्राइज को पसन्द करेगा, इसमें मुझे शक है. थिएटर में बैठे दर्शक कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रहे थे. फ़िल्म खत्म होने के बाद दर्शकों का ठंडापन बता रहा था कि पहली बार आदित्य चोपड़ा दर्शक की नब्ज़ पकड़ने में नाकाम रहे हैं.

दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे जैसी क्लासिक बनाने वाला निर्देशक इस बार देह के स्तर से ऊपर नहीं जा पाया, अफ़सोस है.

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