इसी काया में मोक्ष

बहुत दिनों से मैं
किसी ऐसे आदमी से मिलना चाहता हूँ
जिसे देखते ही लगे
इसी से तो मिलना था
पिछले कई जन्मों से…

यह देह रोज ही जन्मे, रोज ही मरे
झरे हरसिंगार की तरह
जिसे पाकर मन
फूलकर कुप्पा हो जाए….

बहुत दिनों से मैं
किसी ऐसे आदमी से मिलना चाहता हूँ
जिसे देखते ही लगे
अगर पूरी दुनिया अपनी आँखों नहीं देखी
तो भी यह जन्म व्यर्थ नहीं गया
कि पा गया मैं उसे
जिसे मेरे पुरखे गंगा नहाकर पाते थे..

किसी को मैं अपना कलेजा
निकालकर देना चाहता हूँ
मुद्दतों से मेरे सीने में
भर गया है अपार मर्म

मैं चाहता हूँ कोई
मेरे पास भूखे शिशु की तरह आए ….

कोई मथ डाले मेरे भीतर का समुद्र
और निकाल ले सारे रतन
कि मुझे भी देखकर किसी की छातियों में
दूध उतर आए..

मैं जानना चाहता हूँ
कैसा होता है मन की सुन्दरता का मानसरोवर

– दिनेश कुशवाह

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