सचमुच की आदिवासी संस्कृति देखनी हो तो यहाँ आइए, नहीं तो सुनते रहिए खड़गे जैसों की

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जड़ी बूटियों से हाइपर टेंशन, डायबिटीज़, कोलेरा, मीज़ल्स जैसी बीमारियों के इलाज के बारे में क्या ख्याल है आपका?

क्या हुआ, बात कुछ कुछ स्वामी रामदेव जैसी लग रही है?

हो सकता है, बिलकुल हो सकता है कि मेरी ये बात अजीब लगे, लेकिन ऐसा इसलिए है क्योंकि एक तो भारतवासियों ने भारत घूम के नहीं देखा, ऊपर से दलहित चिंतकों ने यहाँ की आदिवासी जनजातियों के बारे में कभी आपको पूरा सच बताया ही नहीं.

जैसे कि अगर आपको ये बता दिया जाये कि भारत में, गोंड भित्ति चित्रों में पालतू घोड़े नजर आते हैं तो फिर वो आर्यन इन्वेज़न के समय घुड़सवार ‘आर्यों’ का स्थानीय ‘द्रविड़ों’ पर हमला कह कर लोगों को भड़काना मुश्किल हो जायेगा.

ईसाई हमलावरों के भारत में आने के समय तक भारत में बोली जाने वाली भाषाओँ में गोंड एक प्रमुख भाषा थी. भारत के सबसे बड़े इलाके में यही भाषा चलती थी.

1800 के बाद के समय में गोंड जनजाति और उसकी भाषा को गायब किया गया, ये बताने पर तो ‘दलित आदिवासियों’ पर किन्हीं ‘ब्राह्मणों’ के अत्याचार भी साबित नहीं हो पाएंगे.

अभी भी भारत के एक भाग मध्य प्रदेश में गोंड काफी संख्या में हैं. लेकिन अगर गोंड आबादी को सचमुच उनके अपने तौर तरीकों, उनकी अपनी परम्पराओं में देखना है तो आपको पातालकोट जाना होगा.

नाम पातालकोट इसलिए है क्योंकि ये इतनी गहराई में है कि पाताल जैसा लगता है. एक प्रचलित मान्यता के अनुसार रावण का पुत्र मेघनाद शिव उपासना के बाद इसी रास्ते से पाताल गया था.

ऐसा भी माना जाता है कि अठारहवीं शताब्दी में राजाओं ने जो सुरंगे बनवा रखी थीं, वो पंचमढ़ी (होशंगाबाद जिला) से आकर इसी घाटी (छिंदवाड़ा जिला) में कहीं खुलती थी.

ये इलाका, यहाँ की आबादी, बरसों दुनियां की नज़रों से ओझल रहे, अभी कुछ ही साल पहले लोगों को यहाँ के गाँवों और करीब दो-तीन हज़ार की आबादी का पता चला है.

इस इलाके में पुरुषों और महिलाओं की गिनती लगभग बराबर है. बाकि आबादी से कटे रहने कारण ज्यादातर बीमारियों का इलाज यहाँ स्थानीय वैद्य यानि ‘भुमक’ करते हैं.

जाहिर है यहाँ पायी जाने वाली ज्यादातर बीमारियों का पूरा इलाज उनकी जड़ियों से हो जाता है.

इनकी धार्मिक मान्यताओं को देखा जाये तो पूजा के स्थान को ‘देवघर’ कहा जाता है. मुख्य रूप से ‘महादेव’, ‘मदाई’, ‘मदमी देवी’, ‘सूरजदेव’ जैसे देवताओं पूजा होती है.

त्योहारों में काफी सारे जेवर भी पहने जाते हैं, वैसे ही बीड्स (beads) वाले जैसे आजकल आदिवासियों के नाम पर अपनी रोटियां सेंकने वाले पहनते हैं. बिलकुल वैसे ही.

अगर सचमुच की आदिवासी संस्कृति देखनी हो तो उसके लिए ये बिलकुल सही जगह है.

भोपाल से छिंदवाड़ा जाने रास्ते में एक डायवर्सन है पातालकोट के लिए. लेकिन चाहे जिधर से जायेंगे घाटी में कम से कम पांच से दस किलोमीटर चलना होगा.

मतलब सचमुच जाने के लिए पांच किलोमीटर पहाड़ों पर चलने का अभ्यास हो या शारीरिक सामर्थ्य तभी जाने की सोचिये.

मध्यप्रदेश सरकार इस जगह को संरक्षित कर के यहाँ की आबादी की जीवनशैली को बचाने की कोशिश कर रही है.

इसे eco tourism के स्थल के रूप में शायद थोड़े समय में मान्यता मिल जाएगी. फ़िलहाल यहाँ कोई रुकने जगह नहीं है, लगभग 15 गाँव हैं जहाँ आप रात में नहीं रुक पाएंगे.

सबसे नजदीक तामिया के PWD या वन विभाग के गेस्ट हाउस में रुकने का इंतज़ाम हो सकता है.

सदियों तक भारत की आर्य आबादी से कटे लोगों को कोई अलग द्रविड़ परम्पराओं के बदले हिन्दुओं जैसी ही परम्पराओं में पातालकोट में देखा जा सकता है.

दूसरा तरीका है तथाकथित ‘बुद्धिजीवियों’ का लिखा, किसी रथों वाले लोगों के, भारत पर आक्रमण को, किताबों में पढ़ना.

वैसे एक अंग्रेज़ A O Hume द्वारा 1885 में स्थापित की गई राजनैतिक पार्टी के सदस्य खड़गे, द्रविड़ और आर्यों बारे में भी कुछ कहते हैं. आप उनकी भी सुन सकते हैं.

बाकि जब वो गाना लिखा गया होगा ना, ‘कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना…’, तो कुछ सोचकर ही लिखा गया होगा.

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