कहीं आप भी किसी ‘दीदी’ या ‘मफलर वाले अंकल’ के बहकावे में तो नहीं आ गए?

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सोशल मीडिया पर मैंने बड़े बड़े धुरंधर लेखक देखे हैं… चाहे कविता कहानियाँ हो, सामाजिक विश्लेषण हो, दर्शन शास्त्र हो, अध्यात्म हो … सब एक से बढ़कर एक…

जब भी मैं कोई लेख लिखती हूँ तो बड़ी डरी सहमी सी रहती हूँ… लिखने के बाद जब फेसबुक पर पोस्ट करती हूँ तो पांच दस मिनट के लिए आँखें भींच लेती हूँ… फिर धीरे से एक आँख खोलकर कमेंट्स पढ़ती हूँ… अब किसी ने टोका या तब किसी ने टोका… मैडम क्या उल जुलूल लिखती रहती हैं… पहले थोड़ा सा पढ़ लिख लीजिये…

और खुद को बीच बीच में सान्त्वना देती रहती हूँ… शैफाली… कोई बात नहीं धीरे धीरे सीख जाओगी लिखना… ये बड़े बड़े लेखक भी लिख लिख कर ही सीखे हैं… आधा कच्चा आधा पका जैसा भी आता है लिखती रहो धीरे धीरे हाथ रवां हो जाएगा…

फिर ये विमुद्रीकरण का दौर शुरू हुआ…. उन बड़े बड़े लेखकों की कलम से जो निकल रहा है… उसको पढ़ पढ़ कर दंग रह गयी… कोई बड़ी ऊंची साहित्यिक भाषा में, तो कोई राजनैतिक ज्ञान बघारते हुए…. ये बड़ी बड़ी पोस्ट नोट बंदी के और साथ ही मोदीजी के खिलाफ लिख रहे हैं…

फिर मेरे अन्दर के लेखक को मैंने पीछे धकेला और आगे खड़ा किया उस देश भक्त को, जिसे कम से कम इतनी समझ तो है ही कि कौन किस के लिए अपनी कलम को बेच रहा है…

कुछ है जो किसी राजनीतिक पार्टी के लिए लिख रहे हैं, कुछ हैं जो व्यक्तिगत हित साधने के लिए लिख रहे हैं… कुछ ऐसे भी हैं जो सिर्फ प्रसिद्धि पाने के लिए या व्यक्तिगत खुन्नस निकालने के लिए नोट बंदी के खिलाफ लिख रहे हैं…

मैंने खुद से कहा शैफाली ये समय प्रेम परमात्मा या कविता कहानी लिखने का नहीं है… ये समय है हाथ में मशाल लिए उन सामान्य लोगों को कालेधन और नोट बंदी के फायदे समझाने का…

तो ऐसे में मिला मुझे ये वीडियो… पिछली बार GST पर भी पल्लवी जोशी के वीडियो की खूब चर्चा हुई थी, वही पल्लवी इस बार नोटबंदी के फायदे समझाते हुए एक वीडियो लेकर आई हैं…

कालेधन के बारे में बहुत सरल भाषा में समझाया है पल्लवी ने… लेकिन जो इस वीडियो की पञ्च लाइन है वो है “कहीं आप भी किसी ‘दीदी’ या ‘मफलर वाले अंकल’ के बहकावे में तो नहीं आ गए?”

सोशल मीडिया पर कई लोग मुझे इसी बहकावे में आये नज़र आते हैं … उन लोगों को ख़ास ये वीडियो देखना ही चाहिए….

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