हिम्मत ना हार, चल चला चल फकीरा चल चला चल…..

2008 में मुलाक़ात से पहले… फोन पर उस फक़ीर की ज़ुबान से ये बात निकली “मैं और मेरी किताबें अकसर ये बातें करते हैं”, तो सिर्फ़ ये सोचा कि उसकी हर बात की तरह यकीनन इसमें भी बहुत गहरा अर्थ होगा क्योंकि वो कोई भी बात यूं ही तो नहीं कह देता.

इसका अर्थ तब ज़ाहिर होना शुरु हुआ जब 2008 में फ़कीर से मिलने के बाद उससे किताबें सुनना शुरु की. जीवन में किताबें तो बहुत पढ़ी हैं, जिनको पढ़ने के बाद भी ज़हन में खयाल रह जाता था कि पता नहीं ठीक से पढ़ी या नहीं. क्योंकि कई बार हम उस मन:स्थिति में नहीं पहुंच पाते जिसमें लेखक ने लिखा होता है. लेकिन किताब को यदि उसके लेखक की ज़ुबान से सुनने को मिले तो लगता है, किताब को पढ़ा नहीं जिया है.

और फ़क़ीर की ज़ुबान से किसी किताब को सुनने के मायने यही है कि किताब उसके लेखक द्वारा सुनी जा रही है. फिर चाहे वह अमृता की तेरहवां सूरज हो, चाहे दुष्यंत कुमार की काव्य नाटिका एक कंठ विषपायी हो या फिर बब्बा (ओशो) के कहे हुए वचन.

अमृता की तेरहवां सूरज और उनचास दिन सुनते हुए तो मैं खुद अमृता हो गई थी. तेरहवां सूरज का दूसरा भाग है उनचास दिन और उसको सुनते हुए खयाल आया था कि अब उसके तीसरे भाग को लिखने का समय आ गया है. ऐसी अनहोनी घटना तभी घट सकती है जब आप के कानों में पड़ने वाली आवाज़, लिखने वाले की ही हो. तभी तो आप लेखक में इतने समाहित हो जाते हैं कि उसी की तरह सोचने लगते हैं.

कवि नीरज द्वारा लिखा श्रृंगार गीत जब पढ़ा तो लगा, नहीं!!! यह मेरे टेस्ट की कविता नहीं है, मन नहीं लगा उसको पढ़ने में. लेकिन उसी श्रृंगार गीत को जब उसके मुंह से सुना तो लगा जैसे कवि नीरज ने वो गीत हमारे लिए ही लिखा है. उसका एक-एक शब्द जैसे हमारी पहली मुलाकात को वर्णित कर रहा था.

कई महिनों से उस फक़ीर को सिर्फ़ एक आवाज़ के रुप में जानती थी, उसको पहली बार साक्षात रुप में देखना किसी स्वप्न के सच हो जाने जैसा ही था. और उस पहली मुलाकात के लिए किसी कवि ने पहले से ही कोई कविता रच दी हो हमारे लिए, तो कोई अचंभा नहीं है. जो आदमी किताबों से बातें करता हो, वे किताबें और किताबों के रचयिता इतना तो कर ही सकते हैं उसके लिए.

और उन अद्भुत क्षणों को शब्दों में पिरोना तो और भी मुश्किल है मेरे लिए जब वो बब्बा (ओशो) की किताबों को सुनाता है. बब्बा ने कभी कुछ लिखा नहीं, सिर्फ बोला है. वे राइटर नहीं ओरेटर हैं.

जब किसी लेखक की लिखी हुई बातों को वो उसी अंदाज़ और अर्थों के साथ सुनाता हो तो किसी की कही हुई बातों को उन्हीं के अर्थों में समझाने का जादू सिर्फ़ उस फ़कीर के ही बस का है. और वो बातें जब बब्बा द्वारा कही गई हों तो लगता है कि उनको सुनने के लिए स्वयं वो भी आए हैं.

उसका कारण भी है, जिस कमरे में जिस कुर्सी पर बैठ कर वो उन्हें पढ़ता है, कई बरस पहले उसी जगह बब्बा(ओशो) भी बैठा करते थे. वहां अकसर ओशो की बैठक हुआ करती थी. उसकी ज़ुबान से ओशो बोल रहे हैं या ओशो उसकी ज़ुबान से बातों को दोहरा रहे हैं या वो खुद वहां आ कर खुद को सुन रहे हैं, कोई नहीं जानता, कोई समझ ही नहीं सकता. ये अद्भुत क्षण, पल, समय, जो गुज़रता है वो समझने के लिए नहीं, अनुभव करने के लिए होता है.

किसी को भी यह बात अतिशयोक्ति लग सकती है, लेकिन ये सच है कि बब्बा को पढ़ते समय उसके शरीर के चारों ओर मुझे एक दिव्य प्रकाश दिखाई देता है. मनुष्य के आसपास बनने वाले aura को देखा जा सकता है लेकिन जो aura, जो प्रकाशवान गोला बुद्ध्, महावीर या हमारे देवी देवताओं के सिर के पीछे हम उनके चित्रों में देखते हैं, वह प्रकाशमान दिव्य गोला मुझे उस फ़कीर के सिर के पीछे भी दिखाई देता है.

ऐसे समय मन में एक ही विचार, एक ही बात, एक ही जज़्बा होता है कि…. I am blessed!!! स्वामी ध्यान विनय.

सिर्फ़ वो ही अपनी किताबों से बातें नहीं करता, उसकी 6000 किताबें भी उससे उतने ही प्रेम से बातें करती हैं और मैं उसकी ग़वाह हूं.

एक बार फिर यही कहूंगी इतनी लम्बी कहानी मैंने सिर्फ स्वामी ध्यान विनय की प्रशंसा के लिए नहीं लिखी… उसके बारे में तो मेरे नायिका सीरीज में पाठक पढ़ते रहते हैं…

ये उस प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी की उस बात को भी सिद्ध करती है जो उन्होंने कही कि – “हम तो फ़कीर है, हमारे पास है ही क्या, जब जी चाहे झोला उठाये चल पड़ेंगे…” क्योंकि इन फकीरों के झोले में हम आप की तरह धन दौलत और एशो आराम की वस्तुएं नहीं होती जनाब…

इनके झोले में किताबें और उन किताबों के अन्दर का वो अमूल्य खज़ाना होता है जो ये अपने “जीवन” पर जितना खर्च करते हैं उतना ही बढ़ता  जाता है … (स्वामी ध्यान विनय के केस में आप इस “जीवन” शब्द को “माँ जीवन शैफाली” के रूप में भी पढ़ सकते हैं)

तो मोदीजी को भी हमेशा से किताबें पढ़ने और लिखने का शौक रहा है. मोदी जी एक सफल लेखक और कवि भी हैं, वो गुजराती में लिखते हैं. मोदी जी स्वामी विवेकानन्द के बहुत बड़े फैन हैं. उनकी पसंदीदा किताब है “जीवन और हिन्दू दर्शन”. उन्होंने एक अभियान को “विवेकानन्द युवा विकास यात्रा” का नाम भी दिया है.

जब मोदी युवा छात्र थे वो तब भी वडनगर की लाइब्रेरी में नियमित तौर पर जाया करते थे. इसलिए पढ़ाई लिखाई उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा है. देश की सांस्कृतिक विरासत और प्राचीन भारत का इतिहास पढ़ना भी उन्हें अच्छा लगता है.

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पत्रकार किशोर मकवाणा ने मोदीजी पर लिखी अपनी पुस्तक में वर्णन किया है कि मोदी को लोग लेखक, कवि, नाटककार के रूप में नहीं जानते हैं. जबकि मोदी ये सब हैं. मोदी ने बचपन में स्कूल में नाटक का मंचन भी किया है. इसके अलावा उन्होंने कौन से नाटक और किताब लिखी, ये सब जानने के लिए किताब के पन्ने पलटने होंगे. इस किताब में मकवाणा ने नरेंद्र मोदी के जीवन संघर्ष की कहानी को विस्तार से लिखा है.

हाल ही में केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने वाराणसी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गुजराती काव्य संग्रह ‘आंख आ धन्य छे’ का डॉ. राजलक्ष्मी श्रीनिवासन द्वारा किये गये संस्कृत अनुवाद ‘नयनम इदम धन्यम’ का विमोचन किया.

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में चिकित्सा विज्ञान संस्थान के के. एन. उड़प्पा सभागार में आयोजित पुस्तक विमोचन समारोह के मुख्य अतिथि जावड़ेकर ने इस कठिन प्रयास के लिए संस्कृत विदुषी डॉ. राजलक्ष्मी की सराहना की और कहा कि कविता में मानवीय भावनाओं को प्रभावित करने की अतुलनीय शक्ति होती है. कविता के लिए विचारों में रचनात्मकता और गहराई जरूरी तत्व होते हैं, जो सामान्य व्यक्ति में नहीं पाये जाते.

प्रधानमंत्री मोदी का यह काव्य संग्रह प्रकृति के वास्तविक स्वरूप को प्रस्तुत करता है. ईमानदारी, त्याग और क्षमाभाव का उनके स्वभाव में समावेश है और उन्होंने इन्हीं भावनाओं को कविताओं के माध्यम से व्यक्त किया है.

मोदीजी के इस काव्य संग्रह का हिन्दी, अंग्रेजी और तमिल में पहले ही अनुवाद किया जा चुका है और अब संस्कृत रूपांतरण भी आ गया.

तो ये जो फ़कीर होते हैं वे ही सही अर्थों में समृद्ध होते हैं… जो खज़ाना इनकी झोली में है पहले उसका लाभ उठा लो… फिर किसी दिन अचानक ये अपना झोला उठाकर चल देंगे तो अफ़सोस करते रह जाओगे… क्योंकि …

सूरज, चंदा, तारे, जुगनू
सबकी अपनी हस्ती है
जिसमें जितना नीर हो, बदली उतनी देर बरसती है
तेरी शक्ति अपार, तू तो लाया रे अकेला गंगा
धरती पे उतार, हिम्मत न हार …
चल चला चल फकीरा चल चला चल…..

– माँ जीवन शैफाली

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Modi Faqir
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