मुझे किसी सर्टिफिकेशन की जरूरत नहीं : बाबा रामदेव

Baba Ramdev yogi sanyasi Patanjali

योग और कारोबार, दोनों में महारथी स्वामी रामदेव से राजेश मित्तल और अमित मिश्रा की बातचीत

संत कुटीर – यह नाम है बाबा रामदेव के हरिद्वार स्थित निवास का. बाहर से किले जैसा. अंदर खुले बाग जैसी जगह. पार्किंग में तरतीब से लगी 4-5 गाड़ियां. विदेश में बनी रेंज रोवर इस्तेमाल करने पर उंगली उठी तो स्वदेशी की अलख जगाने वाले बाबा अब आने-जाने के लिए देसी स्कॉर्पियो इस्तेमाल करने लगे हैं. इसी तरह आईफोन की जगह अब उनके पास माइक्रोमैक्स है.

बाबा एक झोले के साथ कुटिया के स्टाइल में बने अपने एकमंजिला कॉम्प्लेक्स की तरफ जाते दिखते हैं. हल्का-फुल्का शरीर, पर भारी-भरकम खड़ाऊं. हमें देखकर रुक जाते हैं, मुस्कराकर हाथ हिलाते हैं.

ढाई साल पहले पहली बार मिलने पर जो खुशी, मस्ती और अपनापन देखा था, उसमें कुछ कमी दिखी. शायद तेजी से बढ़ते कारोबार का भार है या कुछ और. पूछ ही लिया, पहचाना? बाबा ने फौरन तब की मुलाकात की चंद बातें ज्यों की त्यों दोहरा दीं.

उनकी याद्दाश्त पर क्लीन बोल्ड होकर हमने उनके बड़े-से, लेकिन सादा कमरे में बैठकर बातचीत शुरू कर दी. करीब सवा घंटे चली बातचीत में अपनी चीजों के सर्टिफिकेशन के सवाल पर वह जरा गुस्से में आ गए.

बाद में बाबा के एक करीबी ने बताया, बाबा को लंबे अरसे बाद गुस्से में देखा. यह भी सच है कि पतंजलि फूड पार्क में करीब 6 घंटे गुजारने के बाद कम-से-कम हमें तो यही लगा कि क्वॉलिटी में कोई कमी नहीं रखी जा रही है. पेश है बाबा रामदेव से हुई बातचीत के खास हिस्सेः

Q. सरकार ने 500 और 1000 रुपये के पुराने नोट बंद कर दिए हैं. उनके नए नोटों के साथ-साथ 2000 रुपये का नया नोट चलाया है. आप तो बड़े नोट पूरी तरह बंद करने की बात करते थे क्योंकि इससे काला धन इकट्ठा होता है. इस कदम पर आपका क्या कहना है?

A. मैं बड़े नोटों के विरोध की बात पर अब भी कायम हूं. मेरे हिसाब से 2000 रुपये का नोट चलाने से काला धन इकट्टा करने वालों को और सहूलियत हो जाएगी. ऐसे में इस मुहिम का कोई मतलब नहीं रह जाता.

Q. एक तरफ आम आदमी से थोड़ा एडजस्ट करने की बात कह कर उसे नोट बदलवाने के लिए घंटों लाइनों में लगवाया जा रहा है और दूसरी तरफ राजनीतिक पार्टियां अपने चंदे का स्रोत छुपाने के लिए खुद को आरटीआई से बाहर रखने के लिए एकजुट हो जाते हैं. इस पर आपका क्या कहना है?

A. दोहरे मापदंड नहीं चलेंगे. राजनीतिक दलों को आरटीआई के दायरे में लाने की जरूरत है जिससे यह बात साफ हो सके कि कोई भी दल काला धन नहीं ले रहा. ऐसा करना काले धन को रोकने के लिए बहुत जरूरी है.

Q. पब्लिक सेक्टर बैंकों का 85 हजार करोड़ रुपया सिर्फ 87 लोगों पर बकाया है. सरकार इनका नाम बताने को राजी नहीं. आपका क्या मानना है?

A. सरकार को नाम बताने चाहिए. लोगों को नाम जानने का हक है और ऐसा करने से बाकियों को भी भय होगा कि वे ऐसा न करें. उन पर उचित कार्रवाई भी होनी चाहिए.

Q. कहा जा रहा है कि पतंजलि के प्रॉडक्ट्स की भारी डिमांड के कारण उसे आउटसोर्सिंग के जरिए पूरा किया जा रहा है, लोकल कंपनियों के माल पर अपना ठप्पा लगाकर बेचा जा रहा है. इसमें कितनी सचाई है?

A. हमारा 90 फीसदी प्रॉडक्शन इन-हाउस है. अगर कहीं पर आउटसोर्स भी किया जा रहा है तो इससे काफी लोगों को फायदा हो रहा है. मिसाल के तौर पर नमक है या आटा चक्कियां हमने किराए पर ले रखी हैं. इससे कई मजदूरों और देसी कंपनियों को भी काम मिल रहा है. हम तो सबके विकास की बात करते हैं. पतंजलि के साथ-साथ दूसरों को आगे बढ़ाना भी स्वदेशी अभियान के लिए जरूरी है.

Q. माना कि आउटसोर्सिंग गलत नहीं, सब बड़ी कंपनियां करती हैं लेकिन लोगों की चिंता क्वॉलिटी को लेकर है. मिसाल के तौर पर लोग कहते हैं कि आपका शहद जम जाता है इसलिए खराब है.

A. हम खुद क्वॉलिटी को लेकर सबसे सख्त हैं. एक भी प्रॉडक्ट बताएं, जिसमें हमने क्वॉलिटी के साथ समझौता किया हो. जहां तक बात शहद की है तो इसे लेकर देश के लोगों में भारी अज्ञानता है. हमने इसके बारे में जानकारी प्रॉडक्ट के लेबल पर भी दी है. शहद का जमना स्वाभाविक है. विदेशों में 99 फीसदी जमा शहद ही बिकता है. सरसों के फूलों से मधु लेने वाली मधुमक्खी का शहद जरूर जमेगा. अगर कोई शहद बिल्कुल नहीं जमता तो इसका मतलब वह नैचरल नहीं है.

Q. हाल ही में एक विदेशी मैगजीन में एक रिपोर्ट छपी है जिसमें देसी घी की क्वॉलिटी को लेकर सवाल उठाए गए हैं. अगर वह रिपोर्ट गलत है तो आप कानूनी कार्रवाई क्यों नहीं करते?

A. विदेशी मीडिया हमेशा मल्टिनैशनल कंपनियों का साथ देता है. यह उन्हीं की हरकत है. उन्होंने हमारी फैक्ट्री में अमूल घी के कार्टन देखे थे. असल में उन कार्टन में कुछ दूसरा कच्चा माल भर कर आया था. वह रिपोर्टर जिस फैक्ट्री में गई थी, वहां देसी घी बनता ही नहीं.

रिपोर्ट में आचार्य बालकृष्ण और सिंघल जी को पूरी तरह से गलत कोट किया गया है. जहां तक बात कानूनी कार्रवाई की है तो हम मीडिया पर किसी भी तरह की कार्रवाई से हमेशा बचते हैं. मैंने यह पॉलिसी बना रखी है कि मैं मीडिया और साधु-संत समाज पर कोई टिप्पणी नहीं करता. हर जगह अच्छे-बुरे लोग हैं. कोई ज्यादा ही हरकत करेगा तो हम सोचेंगे.

Q. लेकिन अगर आपके प्रॉडक्ट्स और कंपनी को लेकर सोशल मीडिया में निगेटिव बातें कही जाएं तो आपकी तरफ से इन पर सफाई तो आनी ही चाहिए.

A. सोशल मीडिया पर जिम्मेदार, देशभक्त और वैज्ञानिक सोच रखने वाले लोग हैं तो कुछ फिजूल लोग भी हैं. इन फिजूल लोगों पर कमेंट न करना हमारी समझदारी और जिम्मेदारी है. ऐसे लोग तो चाहते ही हैं कि हम उनकी बातों का जवाब दें और अपनी एनर्जी उनकी बकवास बातों में लगा दें.

ऐसा करने पर तो हम उनके मिशन को सफल कर रहे हैं. बेहतर है, उनका जवाब न दिया जाए. मैं प्रश्नों का विरोधी नहीं हूं लेकिन मल्टिनैशनल कंपनियों और एलोपैथी के हिमायतियों के कुप्रचार का जवाब देने की जरूरत नहीं समझता.

Q. आप और आचार्य बालकृष्ण तमाम बीमारियां भगाने के लिए घरेलू नुस्खे बताते रहते हैं, प्रवचनों, किताबों और फेसबुक जैसे सोशल मीडिया पर भी. कई नुस्खे काम करते हैं, कई नहीं. नुस्खों में भी चीजों की मात्रा, सेवन विधि और अवधि के बारे में सटीकता से नहीं बताया जाता. क्यों नहीं आप इन नुस्खों की साइंटिफिक स्टडी करवाते ताकि देश की गरीब जनता को सस्ते इलाज मिल सकें?

A. देश में सैकड़ों तरीके की सब्जियां और अनाज खाए जाते हैं. क्या हर तरीके के खाने को चखने से पहले क्लिनिकल ट्रायल किए गए हैं? हम हल्दी, जीरा, सौंठ आदि ही खाने को ही कहते हैं, जहर खाने को नहीं. ये सब नुस्खे बता कर मैं कोई दुकानदारी नहीं चला रहा.

आहार, विचार, व्यवहार और संस्कार पीढ़ी-दर-पीढ़ी चले आ रहे हैं. इनके पीछे वैज्ञानिक तथ्य हैं. ऐसे ही हमारे घरेलू नुस्खों में भी बहुत वैज्ञानिक तथ्य हैं. वे हजारों-हजार बरसों से आजमाए हुए हैं.

अब इन सबके ट्रायल की जरूरत क्या है? जहां तक मात्रा आदि का सवाल है, इंसान अपने विवेक से काम करता है. अगर कोई लौंग लेगा तो अपने आप ही 2-3 से ज्यादा नहीं लेगा. पता है कि ज्यादा खाएगा तो मुंह जल जाएगा.

Q. सारी आयुर्वेदिक दवाएं प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रंथों के आधार पर बनती हैं लेकिन आज नई-नई बीमारियां और वायरस आ गए हैं. ऐसे में क्या आयुर्वेद में नई रिसर्च हो रही है?

A. एक बात समझ लीजिए, इस धरती पर जितनी बीमारियां हैं, उन सबके इलाज भी इसी धरती पर हैं. मॉडर्न मेडिकल साइंस कहती है कि वायरस हर वक्त शक्ल बदलता रहता है लेकिन वायरस से होने वाली बीमारियां तो मात्र 1-2 फीसदी ही हैं. बाकी डायबीटीज, बीपी, हार्ट आदि से जुड़ी बीमारियां ही ज्यादा हैं.

हमने गिलोय का अलग-अलग बैक्टीरिया और वायरस पर ट्रायल करके देखा है. पाया है कि वह हर तरह के बैक्टीरिया को बांध देता है. बीपी की कारगर दवा मुक्ता वटी पर भी ट्रायल किए हैं.

तो ऐसा नहीं है कि हम रिसर्च नहीं कर रहे. हमने हाल ही में पतंजलि रिसर्च फाउंडेशन बनाया है. हमने इस पर भारी निवेश किया है. जल्दी ही नई रिसर्च सामने आएगी. एक-एक जड़ी-बूटी पर कंट्रोल्ड क्लीनिकल ट्रायल करेंगे.

Q. आपके तकरीबन सभी प्रॉडक्ट किसानों के पैदा किए गए कच्चे माल से बनते हैं. आप उनको ऑर्गेनिक तरीके से उगाने की शर्त क्यों नहीं रखते ताकि हमारे देश की मिट्टी, पानी आदि को रासायनिक खादों और कीटनाशकों से जहरीला होने से बचाया जा सके?

A. हमारा आंवला, एलोवेरा और तमाम जड़ी-बूटियां 100 फीसदी ऑर्गेनिक हैं.

Q. क्या आपने उनके ऑर्गेनिक होने का सर्टिफिकेट लिया है?

A. ( जरा गुस्से में) हर चीज के सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं. मैं योग गुरु हूं, तो क्या मुझे किसी सर्टिफिकेट की जरूरत है? मैंने तो कोई सरकारी डिग्री नहीं ली लेकिन फिर भी मैं आयुर्वेद, योग का जानकार हूं और डिग्री भी देता हूं. इसके लिए मुझे किसी डिग्री की जरूरत नहीं.

हम गुरु-शिष्य परंपरा से आते हैं. यह हिंदुस्तान भरोसे पर चलता है, सर्टिफिकेट पर नहीं. अब ऑर्गेनिक सर्टिफिकेट के लिए किसान को विदेशी कंपनी को 1-1 एकड़ के 10 हजार रुपये देने होंगे. यह तो उसे परेशान करने की बात है.

नैसर्गिक या ऑर्गेनिक खेती की बात तो सही है लेकिन सर्टिफिकेट को जरूरी करना किसानों के लिए नई समस्या पैदा करने वाला काम होगा. वे पहले से ही परेशान हैं और हम उन पर एक और बोझ लाद देंगे.

हां, मैं इस बात की गारंटी लेता हूं कि अपने फार्म में हम पूरी तरह से नैसर्गिक खेती कर रहे हैं. वैसे हम जरूरी सर्टिफिकेशन जैसे फूड प्रॉडक्ट्स के लिए FSSAI और आयुर्वेदिक दवाओं के लिए आयुष मंत्रालय का लाइसेंस तो लेते ही हैं.

Q. आप अपने विज्ञापनों में मल्टिनैशनल कंपनियों को भला-बुरा कहते हैं और देशविरोधी बताते हैं जबकि सरकार तो उन्हें लाइसेंस देकर काम करने का बढ़ावा देती है. आप क्या कहेंगे?

A. विज्ञापन हमने चलाया है, बिल्कुल सही चलाया है और आगे भी चलाएंगे. जरूरी नहीं कि सरकार जिस काम के लिए लाइसेंस दे, वह सही ही हो. सरकार तो शराब, सिगरेट और न जाने किन-किन चीजों को लाइसेंस दे देती है तो क्या ये सब सही है?

कोई चीज लीगल हो सकती है लेकिन इससे वह समाज के लिए सही भी हो, जरूरी नहीं है. सरकार ने तो गायों का कत्लखाना खोलने के भी लाइसेंस दिए हैं तो क्या यह सही है?

मैं विदेशी कंपनियों के खिलाफ हूं. ये ईस्ट इंडिया कंपनी की तरह हैं. सरकार ने डब्ल्यूटीओ के साथ संधि की है जिससे वह बंधी है लेकिन मैंने ऐसी कोई संधि नहीं की है. इसलिए मैं खुल कर विरोध करता हूं.

मुझे कोई नहीं रोक सकता. यह बात और है कि विपक्ष में रहते हुए बीजेपी और मोदी जी भी ऐसी बातें करते थे. सरकारें संधियों की बंदिशों की वजह से ‘मेक इन इंडिया’ कहती हैं लेकिन मैं कहता हूं ,‘मेक बाय इंडियंस’.

Q. अब आप और क्या लाने वाले हैं?

A. फिलहाल टेक्सटाइल पर काम चल रहा है जिसमें 15 श्रेणियां होंगी. योगा वियर तो होगा ही, अंडरवियर से लेकर जींस तक, लंगोट से लेकर कोट तक सब बनाएंगे. अपने देश की विरासत खादी के ऊपर भी कई विदेशी कंपनियां पैसे बना रही हैं. इसको तो बंद करना ही होगा. हम करीब 1000 प्रॉडक्ट्स के साथ आने वाले हैं. हमारे अपने शोरूम होंगे. अगले साल से इसे शुरू कर देने का इरादा है.

Q. फल-सब्जी में भी आएंगे?

A. उसका अभी नहीं सोचा है.

Q. और दूध?

दूध पाउडर तो हमने शुरू कर दिया है. उसका नाम है, दूध का ATM. जब भी दूध चाहिए, पानी में घोल कर पी लो.

Q. पर स्वामी जी, हमें तो आपसे ताजा, कुदरती चीजों की अपेक्षा थी, नाकि प्रोसेस्ड और प्रिजर्वेटिव फूड की.

A. यह प्रोसेस्ड नहीं है. इसमें एक भी चीज ऐड नहीं की गई है. एक फीसदी भी प्रिजर्वेटिव नहीं. बस ताजा दूध में से पानी को खींच लिया गया है. वैसे ताजा दूध भी अगले महीने दिसंबर तक चालू हो जाएगा, लेकिन सिर्फ गाय का.

Q. पर आप प्रिजर्वेटिव वाली प्रोसेस्ड चीजें तो बनाते हैं. आंवला रस, ऐलोवेरा जूस आदि में आप भी सोडियम बेंजोनेट का इस्तेमाल करते हैं. तो आपकी चीजें बाकियों से कैसे बेहतर हैं?

A. हमने हानिकारक कोल्ड्रिंक्स के खिलाफ 10 साल अभियान चलाया. विकल्प के तौर पर आंवला रस, ऐलोवेरा जूस आदि लाए हैं. इनमें हम सोडियम बेंजोनेट का इस्तेमाल काफी सीमित मात्रा में करते हैं जिससे नुकसान न के बराबर है.

अगर हम खाने की किसी चीज को प्रोसेस न करें तो साल भर उसे कैसे उपलब्ध करा सकते हैं. मिसाल के तौर पर आंवले को लें. इसे साल भर खाने के लिए ऐसा करना जरूरी हो गया है. आयुर्वेद कहता है कि आम जैसे फल तो सीजनल खाओ लेकिन ऐलोवेरा, आंवला जैसी चीजें 12 महीने खाने का विधान है.

Q. हाल ही में आचार्य बालकृष्ण को फोर्ब्स मैगजीन ने सबसे रईस लोगों की लिस्ट में शामिल किया है जबकि आप कहते हैं कि पतंजलि किसी एक इंसान की कंपनी नहीं है?

A. कंपनी बनाने के लिए कुछ नियम होते हैं जिनसे हम भी बंधे हैं. ऐसा ही एक नियम है कि कंपनी के शेयर कोई इंसान ही रख सकता है, न कि कोई ट्रस्ट. इसलिए आचार्य जी को हमने यह जिम्मेदारी सौंपी.

आचार्य जी ने अपनी वसीयत के जरिए ऐसा लिख दिया है कि मेरी सारी संपत्ति ट्रस्ट की है. वह तकनीकी रूप से भले ही अमीर हों, लेकिन असल में वह फकीर हैं. 1 रुपया भी सैलरी में नहीं लेते.

Q. आप कहते हैं कि हम कमाई के लिए नहीं, भलाई के लिए कारोबार कर रहे हैं, लेकिन कंपनी का प्रॉफिट तो हजारों करोड़ का है और वह लगातार बढ़ता जा रहा है. तो क्या आप भी प्रॉफिट के बिजनेस में आ गए हैं? आपको तो ‘नो प्रोफिट, नो लॉस’ या मार्जिनल मुनाफे पर चीजें बेचनी चाहिए थीं.

A. हम सस्ता बनाएं, तब भी दिक्कत. हम प्रॉफिट कमाएं, तब भी दिक्कत. लोग कहते हैं कि पतंजलि का शहद, ऐरोवेरा इतना सस्ता कैसे है. हम लोगों के घरेलू बजट में 25 से 50 फीसदी तक मंथली सेविंग करा रहे हैं. हमारी 90 फीसदी चीजें सस्ती हैं.

Q. आपका सरसों का तेल सबसे महंगा है.

A. सबसे महंगा तो नहीं, पर अब हम कनाडा से आया हुआ सस्ता कनोला ऑयल नहीं मिलाते जो खतरनाक जीएम बीजों से बनता है. ना ही पाम ऑयल मिलाते हैं. पतंजलि के तेल में आपको एक बूंद भी मिलावट की नहीं मिलेगी.

फिर से प्रॉफिट के मुद्दे पर आते हैं. हमारी 90 फीसदी चीजें सस्ती हैं. उसके बाद जो थोड़ा-बहुत प्रॉफिट है, वह इस वजह से है कि हरिद्वार सन 2020 तक टैक्स-फ्री जोन है. इसकी वजह से 10-12 फीसदी बचत हो जाती है. बाकी अगर थोड़ा-बहुत प्रॉफिट होगा, तभी तो काम आगे बढ़ेगा.

पतंजलि की शुरुआत बैंक से 500 करोड़ रुपये का लोन लेकर की और फिर उसे वापस भी चुका दिया. हम न बैंक का पैसा मारते हैं, न किसी से दान नहीं लेते है, न ही शेयर बाजार से. जो भी प्रॉफिट होता है, वह या तो सेवा में लगता है या फिर विस्तार में.

Q. ऑनलाइन पर आपका सामान डिस्काउंट पर है, लेकिन आपके पतंजलि मेगा स्टोर पर एमआरपी पर ही मिलता है. ऐसा क्यों?

A. ऑनलाइन कंपनियां तो वैसे भी डूबने वाली हैं. पतंजलि के प्रॉडक्ट बेचने वाला जमीन, दुकान, वैद्य आदि पर काफी इनवेस्टमेंट करता है.

Q. क्या अब भी आपका कोई ड्रीम प्रोजेक्ट है?

A. मैं अगले 5-10 साल में भारत को 100 लाख करोड़ का मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने का सपना देखता हूं. हमारी तरह के सौ लोग हों तो ऐसा मुमकिन है. पतंजलि तो 1 लाख करोड़ रुपये के कारोबार को तो छुएगी ही.

Q. यूपी और उत्तराखंड में चुनाव आने वाले हैं. आप किसके साथ हैं?

A. हम फिलहाल राजनीतिक तौर पर सर्वदलीय-निर्दलीय हो गए हैं. जब तक देश पर कोई भारी संकट न आए, तब तक राजनीति पर कोई बात नहीं करूंगा.

Q. दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल और पीएम नरेंद्र मोदी, दोनों ही आपके करीब हैं, लेकिन दोनों ही हमेशा एक-दूसरे से भिड़े रहते हैं. क्या आप बीच-बचाव के लिए आएंगे?

A. अगर मैं ऐसा करता हूं तब मीडिया कहता है कि आप राजनीति में क्यों कूद रहे हैं. अब आप लोग कह रहे हैं कि बीच-बचाव क्यों नहीं करते. मैं कह चुका हूं कि जब तक कोई बड़ा संकट न हो, मैं राजनीतिक मसलों में दखलंदाजी नहीं करूंगा.

Q. केजरीवाल ने परिवर्तन के लिए आंदोलन किया, फिर उन्हें लगा, बदलाव राजनीति के जरिए ही मुमकिन है. आपके मन में नहीं आता कि देश में मैं जो बदलाव लाना चाहता हूं, उसके लिए राजनीति में ही आ जाऊं?

A. मेरी भीष्म प्रतिज्ञा है कि कभी भी सीधे तौर पर राजनीति में नहीं आऊंगा.

Q. तो आपको लगता है कि बदलाव व्यापार के जरिए लाया जा सकता है?

A. नहीं. हमें तो यह सत्य स्थापित करना था कि मल्टिनैशनल कंपनियों के चक्रव्यूह को तोड़ा जा सकता है और समृद्धि सेवा के लिए होती है. मैं एक बड़ी परंपरा स्थापित करने के लिए काम कर रहा हूं. यह व्यापार नहीं है.

Q. आपका उत्तराधिकारी?

A. पतंजलि का उत्तराधिकारी कोई संन्यासी ही होगा. हमने अपने जैसे करीब 400-500 तैयार कर दिए हैं.

Q. बनाएंगे तो किसी एक को ही ना?

A. इसका हमारे यहां पूरा प्रोसेस है. पहले ब्रह्मचारी बनाते हैं, फिर संन्यासी. हम वैदिक गुरुकुलम में सैकड़ों की तादाद में विद्वान, विदुषी, तपस्वी और संन्यासी तैयार कर रहे हैं जो हमारे बाद इस विरासत को संभालेंगे.

Q. आप संन्यासी हैं और संन्यासी तो इस जगत को माया मानते हैं.

यह बात किस शास्त्र में लिखी है. मैंने सारे शास्त्र पढ़े हैं – वेद, उपनिषद, दर्शन, रामायण, महाभारत, गीता, कुरान, बाइबल. जैन, बौद्ध, सिखों के भी सारे ग्रंथ पढ़े हैं. सबमें संन्यास धर्म की बात है. जगत को माया कहीं नहीं बताया गया है.

Q. आदि शंकराचार्य ने जगत मिथ्या कहा है.

A. वहां मिथ्या का अर्थ अनित्य है, मतलब परिवर्तनशील. यह सृष्टि का सिद्धांत है. इसे ऐसे कैसे कह सकते हैं कि दुनिया बेकार है. फिर मैं योगी होने के नाते कर्मयोग में विश्वास रखता हूं.

Q. क्या आपको साधना के लिए वक्त मिल पाता है, इतने सारे प्रपंचों के बीच?

A. जिसके पास काम नहीं होगा, वह ज्यादा प्रपंच करेगा. मैं रोज सुबह 4 बजे से लेकर 8 बजे तक खुद योग करता हूं और औरों को भी कराता हूं. 3-4 घंटे शाम को भी साधना करता हूं. दिन भर कर्म करो, सुबह-शाम योग करो. यही आदर्श परंपरा है.

– राजेश मित्तल  Editor, Sunday Edition at Navbharat Times, The Times of India group

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