‘Divide and Rule’ अंग्रेजों की नीति ही नहीं, उनकी भाषा में भी है

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‘एकता में शक्ति है’ जैसी कहावतें हम लोग बचपन से पढ़ते आये हैं. एक कहानी के अंत में ये सुनाया जाता था.

कहानी में एक दूर दराज के गाँव में एक किसान था जिसके 7 बेटे थे. बेटे बड़े ही निकम्मे और आलसी थे. सारा समय उनका झगड़े में बीतता. आपस में मार पीट होना रोज़ की बात थी.

किसान की समझ में आ गया कि उसके गुजरने के बाद इनकी आपस में एक दिन भी नहीं बनने वाली. बंटवारा होगा, खेत भी बिकेंगे, काम और कमाई की कमी होगी, आस पास के ईर्ष्यालु पड़ोसियों को भी जलते घर में हाथ सेंकने का मौका मिल जायेगा.

चिंतित किसान ने इस मुद्दे पर खूब सोचा विचारा और एक दिन अपने बेटों को आँगन में बुलाया.

वहां 7 लकड़ियों का एक बंधा हुआ गट्ठर पड़ा था. किसान ने गट्ठर की तरफ इशारा किया और बताया कि उसने जमीन का ज्यादा हिस्सा उसे दिया जायेगा जो शरीर से तगड़ा हो. जो भी भाई इस गट्ठर को बिना खोले तोड़ देगा उसे ज्यादा बड़ा हिस्सा मिलेगा.

भाइयों ने एक दूसरे की तरफ देखा और प्रतिद्वंदियों की तरह गट्ठर पर टूट पड़े. एक एक करके सबने जोर लगाया, लेकिन 7-7 लकड़ियों का एक साथ बंधा हुआ गट्ठर कहाँ टूटने वाला था? थोड़ी देर में सब ने हाथ खड़े कर दिए.

फिर किसान ने कहा, अच्छा ठीक है अगर सारी लकड़ियाँ एक साथ नहीं टूटी तो फिर इन्हें खोल कर अलग-अलग करो और फिर तोड़ो. खुला हुआ गट्ठर तुरंत ही टुकड़े टुकड़े हो गया.

इसके साथ ही किसान ने समझाया, जैसे ये लकड़ियाँ एक साथ थी तो नहीं टूटी, वैसे ही तुम भी साथ-साथ रहोगे तो ज्यादा मजबूत रहोगे. अलग-अलग हुए तो आसानी से कोई भी एक-एक करके निपटाता जाएगा.

इस कहानी के बनने के कई साल बाद इसे Aesop’s Fables में शामिल किया गया. इसका मतलब भी अंग्रेजों ने बखूबी समझा ‘Divide and Rule’ की नीति ही नहीं उनकी भाषा पर भी ध्यान दीजिये.

हिंदी में समूह या झूंड शब्द सबके लिए इस्तेमाल होते हैं, अंग्रेजी में ऐसा नहीं है. भेड़ियों के झुण्ड को Pack of Wolves कहते हैं, शेरों के समूह को Pride of Lions, मछलियों के झुण्ड के लिए School of Fishes इस्तेमाल होता है.

जिराफ़ के झुण्ड को कहते हैं Tower of Girrafe, यहाँ तक की कौवों के झुण्ड का भी नाम है उसे Murder of Crow कहते हैं, जो ज्यादा काला वाला एक पहाड़ी कौवा होता है, उसके झुण्ड को Unkindness of Ravens कहा जाता है.

इस टूट फूट का नतीजा हिन्दुस्तानियों को बरसों से भुगतना पड़ा है. हमारा इतिहास ही नहीं बदला, इसकी वजह से हमारा भूगोल ही बदल गया है.

1950 में जहाँ स्कूल में पढ़ाते वक्त हमारे पड़ोसी देश नेपाल, चीन, पकिस्तान, श्रीलंका, भूटान, बर्मा हुआ करते थे, 25 साल बीतते बीतते इनमे एक नाम और बांग्लादेश भी जुड़ गया.

इतने पर भी हम लोग चेते हों ऐसा भी नहीं दिखता. एक रात में पूरे शहर को मौत की नींद सुलाने वाला आराम से 30 साल बाद बूढ़ा हो के मर जाता है और यहाँ के लोग उसे वापिस विदेश भेजने में मदद कर रहे होते हैं.

अभी फेसबुक की दीवारें कहीं ‘सेक्युलर दिवस’, कहीं ‘भगवा दिवस’ और कहीं ‘काला दिवस’ के झंडों से रंगी दिखतीं हैं.

ऐसे मौकों पर भारत की संसद की याद जरूर आ जाती है, वहां लोग अपने पाप भूल कर दूसरों से माफ़ी मंगवाने की क़वायद में लगे हुए हैं.

जहाँ लोगों को एक साथ मिलकर पूरे देश की बेहतरी करनी थी, वहां कोई कहता है कि वो गाँव गोद नहीं लेगा, कोई सफ़ाई अभियान के विरोध में है.

गाली गलौच में तो सभी लगे थे, भ्रष्टाचार और दंगा फ़ैलाने के अभियोग भी सब पर हैं. पूरा देश एक साथ मिल कर आगे बढ़ सके इसकी कोशिश होती नहीं दिखती.

आप कहेंगे कि इस समूह और एकता में बल है, वाली कहानियों का संसद से क्या लेना देना? तो भाई अंग्रेजी में उल्लुओं के झुण्ड को Parliament कहते हैं.

A group of owls is called a parliament. There are other collective nouns in use for groups of owls, including flock, but parliament is the most frequently cited word.

Other words that have been claimed for groups of owls include stare, congress, glaring, hooting, bazaar and sagaciousness, according to the Baltimore Bird Club.

Many of these make reference to the owl’s large staring eyes or to their solemn appearance. Many species of owl are solitary, so seeing a flock or parliament of owls is a rare event indeed.

On a strictly scientific level, the two groups of birds which contain owl species are the family Tytonidae and the family Strigidae.

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