Healthy Life : ब्राउन ब्रेड के नाम पर कहीं अब भी मैदा ही तो नहीं खा रहे

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ईसा पूर्व 3000 वर्ष पहले मिस्र में डबल रोटी बननी शुरू हुई थी. धीरे-धीरे रूप बदलते हुए डबल रोटी स्लाइस ब्रेड बनी. फिर वर्षों तक सफ़ेद रहने के बाद इसने रँग बदला और ब्राउन हो गयी.

जब ब्रिटिश हमारे देश में आए तब अपने साथ अपनी चिकित्सा पद्धति भी लाए. उसके पहले तक हमारे वैद्य और मुगलों के हकीम ही चिकित्सा करते थे.
हकीमों का तो नहीं पता पर वैद्य जी आयुर्वेद के सिद्धान्त “लंघनं परमं औषधम” का पालन करवाते थे.

फलस्वरूप बुखार होने पर दवा तो कम ही दी जाती थी भोजन जरूर बंद कर दिया जाता है. जब एलोपैथ का आगमन हुआ तब डॉक्टर साहब पहले ब्रेड खाने के लिए बोलते थे तब दवा खाने को. धीरे-धीरे ब्रेड बुखार का अनिवार्य खाना बन गया.

बचपन में दादी ब्रेड के सिवा और कुछ खाने ही नहीं देती थी जूस पीने की छूट जरूर मिलती थी जो अच्छी ही नहीं लगती थी. समय के साथ बदलाव आता गया और डॉक्टर्स की सलाह भी बदलती गयी…… अब डॉक्टर्स ने व्हाइट ब्रेड की जगह ब्राउन ब्रेड खाने की सलाह देनी शुरू की.

अब पता चला है कि ब्राउन ब्रेड और व्हाइट ब्रेड में सिर्फ रँग का फर्क़ होता है बस जिसमें फाइबर नहीं होता है. क्योंकि दोनों मैदा से ही बनते हैं कलर डाल कर ब्राउन कर दिया जाता है.

अब एक नयी सलाह है………

होल व्हीट ब्रेड खाएँ क्योंकि इसके हर स्लाइस में कम से कम दो-तीन ग्राम फाइबर होता है. वो इसलिए क्योंकि इसको मैदा से नहीं गेंहूँ के आटे से बनाया जाता है.
होल व्हीट ब्रेड के लेवल को चेक करके देख सकते हैं 100 % होल व्हीट लिखा होना चाहिए.

आजकल मल्टीग्रेन ब्रेड भी मिल रहे हैं पर उसमें भी मैदे की मात्रा ही सबसे ज्यादा होती है, ओटमील और होल व्हीट की मात्रा बहुत कम.

जागो ग्राहक जागो…… बिना पढ़े कुछ मत खरीदो.

अच्छा हाँ एक बात याद दिला दूँ….. अब ब्रेड बुखार में नहीं ब्रेकफास्ट में खाया जाता है और आलस होने पर डिनर में भी.

हैल्दी खाएँ हैल्दी रहें.

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