अपने नॉलेज, अपनी दक्षता, अपनी कार्य कुशलता को बढ़ाइये, तनख्वाह अपने आप बढ़ जाएगी

0
46

शायद आपने तानपुरा देखा होगा. असली नहीं भी तो किसी ना किसी शास्त्रीय संगीत के टीवी प्रसारण में या किसी तस्वीर में देखा होगा. अक्सर गायक गायिकाएं इसके साथ ही गाते हैं.

ये तारों वाला एक वाद्य यंत्र होता है और जब आप किसी शास्त्रीय गायक से पूछेंगे कि तानपुरे में कितने तार होते हैं तो प्रबल संभावना है कि वो चार तार बताएगा.

जब आप पूछेंगे की स्वर कितने होते हैं तो जवाब मिलेगा तीन, षङज् , पंचम और खरज का स्वर. लेकिन जब आप तानपुरा देखेंगे तो उसमें छह तार लगे होते हैं, चार तार नहीं होते!

जब आप संगीतज्ञ से पूछेंगे तो पता चलेगा कि एक चीज़ ‘भाव’ है और तानपुरे में षङज् – मध्यम भाव और षङज् – पंचम भाव होते हैं. तानपुरे के साथ गाने पर गुणित स्वर आते हैं, जैसे पंचम से ऋषभ, या षङज् से गन्धार आएगा.

जरुरत से ज्यादा तार स्वर के सहयोग के लिए होते हैं. यही आप अगर हारमोनियम के साथ गाने वाले को ध्यान से सुन लें तो गाने वाले का गन्धार कहीं और, और हारमोनियम का कहीं और सुनाई दे जायेगा.

मेरा विश्वास है कि पढ़ने में आपको ये पहला पैराग्राफ रॉकेट साइंस जैसा लगा होगा. शास्त्रीय संगीत जानने वाले, सुनने वाले इसे पढ़कर बस मुस्कुरा देंगे. तो आखिर ये लिखा क्यों?

मेरी शास्त्रीय संगीत में कोई विधिवत शिक्षा भी नहीं है. उस से सम्बंधित काम भी नहीं कर रहे होते, आम तौर पर तो प्राइवेट फर्म में नौकरी करते होते हैं. लेकिन ऐसी ही साधारण तनख्वाह वाली मामूली नौकरियों के दौरान एक पुराने ऑपरेशन मैनेजर ने मामूली सी चीज़ सिखाई थी.

आपकी तनख्वाह सिर्फ एक by product है. आप जब कुछ भी सीखते हैं तो आपका ज्ञान बढ़ता है, तो सीखने का main product आपकी knowledge में बढ़ोत्तरी है. इस बढ़ी हुई काबिलियत का by product आपकी salary में सिर्फ reflect होता है.

अगर आपकी नॉलेज ना बढ़ रही हो तो आपकी इनकम भी नहीं बढ़ेगी. यही वजह है कि रिक्शे वाला हमेशा रिक्शा ही चलाता रह जाता है. चूँकि रिक्शा चलाने से उसकी नॉलेज किसी तरह भी नहीं बढ़ती इसलिए उसकी कमाई भी नहीं बढ़ेगी.

वहीँ एक अकाउंटेंट की जानकारी हर रोज़ किसी ना किसी नयी किस्म की entry की वजह से थोड़ी बढ़ जाएगी, कंप्यूटर प्रोग्रामर नए कोड लिखने के तरीके सीख जायेगा, इसलिए उनकी तनख्वाह थोड़े थोड़े समय में बढ़ जाएगी.

ये दोनों बातें एक साथ इसलिए याद आयीं क्योंकि कुछ दिन पहले अजित सिंह जी कवियों – कवियत्रियों को 200-300 रुपये प्रति सम्मलेन मिलने पर आश्चर्य कर रहे थे कि शास्त्रीय संगीत कलाकार तो 20-30 हज़ार रुपये पाते हैं.

उनका ख़याल था कि भिखारियों जैसा बर्ताव करके कवियों ने अपना भाव गिरा लिया है. ये भी वजह है लेकिन इन कवि सम्मेलनों में जाने वाले कवियों से कभी अचानक हिंदी कविता के बारे में पूछ लीजिये. श्रृंगार रस की थी क्या कविता, छायावादी कवि वो मानते हैं खुद को या कुछ और, अलंकार कहाँ कहाँ हैं कविता में कौन से हैं, ऐसे सवाल कीजिये. भाषा की उनकी जानकारी जांच लीजिये बिलकुल बेशर्मों की तरह.

शास्त्रीय संगीत वाला जहाँ आपको एक लाइन गाकर समझाने की कोशिश करेगा, आपको जवाब दे पायेगा, वहीँ ज्यादातर कवि आपका सवाल समझ पाएंगे इसमें भी शक है. तो जैसा कि उनका मानना है वैसे ही हम भी समझते हैं कवियों की ये गरीबी ये मुफलिसी उनकी खुद की वजह से भी है. दोनों लोगों की ऐसा समझने की वजह थोड़ी सी अलग हो सकती है.

बाकी जिसकी तनख्वाह प्राइवेट जॉब में नहीं बढ़ रही हो तो वो स्थिति भी ज्यादातर उस आदमी ने खुद ही बनायी होती है. अपने नॉलेज, अपनी दक्षता, अपनी कार्य कुशलता को बढ़ाइये तो तनख्वाह भी अपने आप ही बढ़ जाएगी.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY