भारतीय मुसलमान

अंग्रेजी से जिस तरह हिन्दी का सीधा सम्बन्ध रहा, अरबी से नहीं. आम मुसलमान अरब की दिशा में सिजदा करता हो, उसकी भाषायी गर्भनाल हिन्दी से ही जुड़ी है. इसके बाद अगर किसी भाषा की बात की जाए तो भी उसका रिश्ता अरबी से नहीं फ़ारसी से जुड़ता है, बरास्ता उर्दू. हिन्दी का अरबी से रिश्ता भी बरास्ता फ़ारसी ही है.

दरअसल हिन्दुस्तान में फ़ारसी तब दाखि़ल हुई जब उसका अपना पर्याप्त अरबीकरण हो चुका था. इसी तरह हिन्दी पर तुर्की का भी सीधा प्रभाव नहीं पड़ा. हिन्दी में जो भी तुर्की शब्द समाये हैं वे सभी फ़ारसी के ज़रिये ही.

भारतीय मुग़ल दरअसल तुर्क थे मगर उन्हें तुर्कसरज़मीं छोड़े इतना अरसा हो चुका था कि उनकी कौटुम्बिक भाषा फ़ारसी हो चुकी थी. इसीलिए मुगलों की सरकारी भाषा फ़ारसी थी.

90 फीस़द भारतीय मुसलमानों के पुरखे तो हिन्दू ही थे. बाकी दस फ़ीसद मुसलमान अफ़ग़ान, फ़ारस या तुर्क-मंगोल हैं. मुहम्मद बिन कासिम (गुलाम) को छोड़ कर सीधे कोई अरबी हमलावर भारत आया हो, ऐसा कहीं पढ़ा नहीं.

इन तथ्यों के बीच यह जानना दिलचस्प होगा कि भारतीय मुसलमान वैयक्तिक पहचान के लिए अरबी मूल के नाम ज्यादा चुनता है. बहुत थोडे लोग फ़ारसी-तुर्की मूल के नाम बरतते हैं. हिन्दी मूल के नाम पसंद करने वाले या तो हैं ही नहीं या बिरले होंगे.

भारतीय मुसलमान का लगाव बोलचाल के स्तर पर हिन्दी और उसकी लोकबोलियों की ओर ज्यादा है. इसके बावजूद विवाह-शादी में निम्नआय वर्ग का मुसलमान भी अंग्रेजी में शादी कार्ड छपवाता है, बजाय हिन्दी या उर्दू के.

यही बात नामों को लेकर है. नाम चाहे मौलवी रखे या पढ़ा लिखा मुस्लिम खुद. चुनेगा अरबी मूल का नाम ही. हालाँकि नामों की पद्धति फ़ारसी वाली है. अरबी इब्न, बिन या बिन्ते वाली पद्धति अभी नहीं आई है. पर कुछ युवा इसका प्रयोग कर रहे हैं.

पढ़ने का जहाँ तक प्रश्न है, आम भारतीय मुसलमान उर्दू से कतराता है, देवनागरी ही उसने अपना ली है. इसके बावजूद वह अपनी मातृभाषा उर्दू, फ़ारसी या अरबी तक लिखवाता है.

ये कुछ बिन्दु हैं जो मेरे आसपास के समाज में मुझे नज़र आते हैं. हिन्दू-मुसलमान के बीच अगर सर्वाधिक सहमति की बात कोई हो सकती है तो वह है गंगा-जमनी तहज़ीब. इसके बाद हिन्दू अपनी राह, मुस्लिम अपनी राह. कोई एक-दूसरे को समझना नहीं चाहता या वैसा करने की खुली इच्छा दिखाई नहीं जाती.

धर्मनिरपेक्षता की छिछली परत छूने वाली रस्मी कार्रवाइयाँ समाज को बहुत ज्यादा प्रभावित नहीं करतीं मसलन कुछ हिंदुओं का रोजा रखना या जन्माष्टमी पर कुछ ख़वातीन द्वारा अपने लाडले को कन्हैया बनाना. ठीक वैसे ही जैसे हिन्दू जमातों में जातीय संकीर्णता से मुक्ति के दिखावे ज्यादा नज़र आते हैं, दिली ख़्वाहिश कम.

नोट
1. एक दूसरे के सामाजिक ताने-बाने और साझे सरोकारों के बावजूद आम हिन्दू और आम मुसलमान एक दूसरे के लिए अजनबी हैं. ये बिन्दु निजता में दखल नहीं बल्कि सामाजिक अध्ययन से जुड़े हैं.
2. इस सन्दर्भ में किसी भी किस्म की अशोभन शब्दावली, जातीय टिप्पणी न करें.

– राग भोपाली

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