इस्लाम का मतलब समर्पण होता है, पता है न

केरल जिस बैठक में भाग लेने आया हूं, उसमें एक मजे़दार घटना हुई है. एक समुदाय विशेष की मानसिकता समझने के लिए इसे साझा कर रहा हूं.

कार्यशाला केरल में है, तो ज़ाहिर तौर पर खाने के मेन्यू में खास तौर से ‘बीफ’ है (यहां एक केरल का खास व्यंजन बनता है, जो बीफ से ही बनता है- यह मुझे नहीं पता कि गोमांस से या भैंसे के मांस से. )

उसी तरह कुछ व्यंजनों में ‘पोर्क’ यानी सूअर भी रहता है- खासकर सुबह के नाश्ते में. कुछ ड्राइवर या ऑफिस ब्वॉय टाइप के लोगों ने तो डर के मारे शाकाहार अपना लिया है, वे बड़ा या इडली के साथ सांभर से काम चला रहे हैं.
लगभग 50 का समूह है, उसमें तीन मोहम्मडन. एक बड़े पद पर काम करनेवाला, दो ऑफिस असिस्टैंट टाइप के हैं.

खैर, मज़ेदार बात अब सुनिए, बड़े वाले साहब मेरे पास पहले ही दिन आए (मेरे रुद्राक्ष, शिखा और टीका को शायद देखकर) और हंसते हुए बोले- ‘यहां बीफ भी है (भावार्थ, तुम साले कितने बड़े मूर्ख हो)… मुसलमान सब ही खाता होगा (भावार्थ, तुम साले हिंदू किसी काम के नहीं, हमें देखो, हमारे लिए खास व्यवस्था है…’

मैंने मुस्कुराते हुए कहा, ‘भाईजान यहां सूअर भी है, सुबह के नाश्ते में खासकर… आप तो अंग्रेजीदां है, पता ही होगा.’

भाईजान का चेहरा तुरंत लंबोतरा हो गया. उन्होंने कहा, ‘हां यार, वही तो मैंने भी देखा. इसीलिए, तो मैं शाकाहारी हो गया हूं, साला पता नहीं क्या खिला दे? ‘
मैंने आखिरी गुगली डाली, ‘आगे से हैमबर्गर भी मत खाइएगा, बड़ी मीटिंग्स में जाने पर. वैसे, मैं आपको पूरी लिस्ट भेज दूंगा, पर यह निश्चित मानिए कि कभी न कभी आप सुअर खा चुके हैं.’

भाईजान अब तक निढाल हो चुके थे.

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इस कहानी का उद्देश्य यह है कि हिंदू जिस तरह अपने धर्म, मान्यता, परपंरा को कैज़ुअली लेते हैं, उन पर सवाल करते हैं, वह कभी भी मोहम्मडन कर ही नहीं सकते हैं.

इस्लाम का मतलब समर्पण होता है, पता है न. यह एक व्यक्ति के विचारों के संग्रह वाली किताब पर आधारित है, जिसे अंतिम सत्य माना गया है, उसमें किसी भी बदलाव या संशोधन की गुंजाइश नहीं है.

झगड़े की जड़ यह है कि आप यह कटु सत्य कहते हुए हिचकते हैं, गंगा-जमनी तहज़ीब के नाम पर आपने दुनिया भर का झूठ परोस रखा है (खैर, उन झूठों पर फिर कभी).

हिंदुओं का मूलवाक्य- एकं सत्, विप्रा बहुधा वदंति होता है, ये भी याद होगा ही.

– व्यालोक पाठक

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