रे फकीरा मान जा….

बात 2007 की है जब मैं इंदौर में रहती थी… एक मल्टी नेशनल कंपनी में काम करती थी… तनख्वाह इतनी थी कि उस ज़माने के हिसाब से घर खर्च निकालने के बाद चाहे जितना रूपया खुद पर खर्च कर सकती थी… बाज़ार गए हैं कोई साड़ी एक नज़र में पसंद आ गई तो बस चाहिए… … Continue reading रे फकीरा मान जा….