Walk For Bihar : पटना की दीवारें बन रही है पेंटिंग का कैनवास

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विक्रम बेताल के किस्सों में से एक किस्सा एक दूसरे राजा का भी है. बेताल ये किस्सा सुनाते हुए कहता है कि राजा के दरबार में एक बार एक ब्राह्मण परिवार आया. जवान आदमी करीब पच्चीस वर्ष का, उसकी पत्नी, पुत्री और गोद में एक छोटा सा बालक.

उसने राजा से आश्रय माँगा तो राजा ने पूछा वो काम क्या कर सकता है? ब्राह्मण ने पूर्व में अंगरक्षक का काम स्वीकार किया, वो बोला राजा जो कहे वो अक्षरशः पालन करेगा और पारिश्रमिक में एक मुद्रा हर रोज़ लेगा.

राजा ने उसके हथियारों के अनुभव को जांचा परखा और उसे नौकरी पर रख लिया. साल भर अंगरक्षक राजा की सुरक्षा में काम करता रहा, कोई विशेष घटना नहीं हुई. एक रात जब ब्राह्मण पहरे पर था और राजा सो रहा था तो देर रात किसी स्त्री के रोने की आवाज़ आई. राजा ने रक्षक को रोने का पता लगा कर आने कहा. रक्षक आवाज की दिशा में बढ़ा और थोड़ी ही देर में रोती स्त्री तक जा पहुंचा.

युवती गहनों से सजी-धजी, बियाबान जंगल में बैठ कर रो रही है ये देख उसने आश्चर्य से पूछा देवी आप कौन है ? यहाँ बैठी क्यों रो रही हैं ? स्त्री बोली वो राजलक्ष्मी है. राजा और उसके परिवार ने बरसों से उसे आश्रय दे रखा था. लेकिन दैवी प्रकोप ! राज्य पर आक्रमण की योजना बन रही थी और मंत्री छल करने वाला था. छल से राजा मारा जाता और राजलक्ष्मी को अपने लिए कोई नया आश्रय ढूंढना पड़ता. इसलिए वो बैठी रो रही थी.

ब्राह्मण ने पूछा इस से बचने का कोई उपाय ? राजलक्ष्मी बोली, कठिन है ! अगर कोई राज्य का सेवक अपने पुत्र की बलि राजा के बदले दे दे तभी राजा बच सकता है. ब्राह्मण ने कुछ देर विचार किया फिर वो घर गया और अपने परिवार को सब बताया. पति पत्नी अपने पुत्र को लिए देवी के पास आये और पति ने अपनी तलवार से अपने ही पुत्र की बलि चढ़ा दी.

छोटी बालिका अपने भाई को मरते देखना बर्दाश्त नहीं कर पाई उसने ये देख कर आत्मघात कर लिया. स्त्री ने अपने दोनों बच्चों को मृत देख कर सदमे से चल बसी. अपने पूरे परिवार को मरा देखकर ब्राह्मण ने सोचा वो किसके लिए जिए-कमाए ? तो उसने भी आत्महत्या कर ली. उधर रक्षक के काफी देर नहीं लौटने पर राजा भी आवाज का पीछा करता आ गया था, लेकिन जबतक वो सेवक को रोकता उसने अपना सर चढ़ा दिया था. पूरे ब्राह्मण परिवार को अपने कारण मरता देख राजा आत्मग्लानी से भर गया. उसने भी अपनी तलवार से देवी के चरणों में अपना सर चढ़ा दिया.

जैसे ही राजा ने अपना शीश चढ़ाया, देवी मुस्कुराई. उनके वर से पांचो पुनः जीवित हो उठे ! राजा ने बरसों शासन किया और रक्षक और उसका परिवार भी उन्ही के आश्रय में रहा.

ये कहानी सुना कर बेताल ने विक्रम से पूछा बताओ विक्रम देवी जो पूरे परिवार की बलि पर भी सिर्फ राजा का राज्य छोड़ रही थी, उसने राजा के सर चढ़ाने पर पूरे परिवार को पुनःजीवित क्यों कर दिया ?

विक्रम बोले बेताल, राजा के लिए प्राण देना तो सेवक का कर्तव्य है ! इसलिए सेवक का बलिदान बड़ी बात नहीं थी. लेकिन सेवक के लिए राजा बलि हो जाए ये अनूठी घटना थी. इसलिए जब राजा ने अपनी बलि दी तो देवी ने सबको जीवित कर दिया. जवाब सुनते ही बेताल फिर से भाग कर पेड़ पर जा लटका.

ऐसा हमारे रोज के जीवन में भी होता है. कोलकाता बरसों देश की राजधानी रही है, अभी भी उसे कला-साहित्य के लिए जाना जाता है. वहां कोई चित्रकला की प्रदर्शनी लगना आम बात है. दिल्ली तो अभी ही राजधानी है वहां कला के कद्रदानों की क्या कमी?

पटना में जब कला की बात होती है तब बड़ी बात होती है. कुछ दिन पहले यहाँ Walk For Bihar की टीम ने ऐसी ही एक पहल की है. पटना शहर की दीवारें अब पेंटिंग का कैनवास होती जाती हैं.

कुछ ही दिन पहले ब्लेज़ जोसेफ ने भी इस प्रोजेक्ट में काम किया है. अगर कभी आप Blaise के घर जाएँ तो उनकी दिवार पे ढेर सी कलाकारी मिलेगी. जहाँ तक मुझे याद है, छोटे बच्चों के हाथों में लगे रंग के छाप से उनके आंगन की दीवारें रंगी हैं.

बरसों पहले उन्हें समस्तीपुर के स्कूलों में ऐसे ही बच्चों को बिना लम्बे ताम-झाम और कीमती रंग-कागज़ के बिना पेंटिंग सिखाते देखा है. ये पेंटिंग ब्लेज़ ने हड़ताली मोड़ के पास के दरोगा राय पथ की दिवार पे की है. तस्वीर कल हमने मोबाइल से ले ली.

बाकी ये दीवारों को रंगने की शुरुआत पिछले साल ही जे सुशील और मीनाक्षी ने कर दी थी. मगर उनका जिक्र अब अगली बार.

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