ज़रूरी था बुरहान जैसे आतंकी का मारा जाना

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एक बार दक्षिण पंथियों के बारे में सोचिये. जाहिर है मेरा ख्याल भी आएगा. साथ ही साथ हो सकता है आपको सुब्रमणियम स्वामी की भी याद आये.

अगर दोनों दक्षिणपंथी हैं, तो क्या दोनों एक ही हैं?

बिलकुल नहीं होंगे, उनका काम करने का सोचने का तरीका अलग है मेरा अलग.

अपराध की भाषा में इसी काम करने के अलग अलग तरीके को मोडस ओपरेंडी (modus operandi) कहते हैं. ये व्यक्ति पर ही नहीं संगठनों पर भी लागू होता है.

तीन दशक पुराने कश्मीर घाटी के आतंकवाद को देखेंगे तो यहाँ आतंकी संगठन एक दूसरे से भी, इन्हीं विचारों के अलगाव की वजह से, भिड़ते रहे हैं.

बुरहान वानी, हिजबुल मुजाहिद्दीन का था जिसका मुखिया सैय्यद सलाहुद्दीन है.

ये पाकिस्तान परस्त तो है मगर इसमें ज्यादातर आतंकी कश्मीरी हैं. ये शायद ही कभी घाटी के बाहर किसी वारदात को अंजाम देता है.

इसकी तुलना में लश्कर, हाफिज़ सईद का आतंकी संगठन है जिसमें पाकिस्तानी पंजाब प्रान्त के कई आतंकी हैं.

ये कश्मीर के बाहर भी हमले करता है, जैसे कि 26-11 का मुंबई हमला लश्कर का ही था.

ऐसे में बुरहान का हाफिज़ सईद से हाथ मिलाना एक खतरनाक संकेत था. बुरहान जैसे आतंकी का मारा जाना ज़रूरी था.

बाकी बुरखा ‘राडिया’ धुत्त का, बुरहान का बचाव कोई अनोखी बात नहीं थी, उनके दलालों की संगत वाले ऑडियो तो पहले भी सुने जाते रहे हैं.

(ऊपर दिए नक़्शे का सफ़ेद वाला इलाका ही आतंकवादग्रस्त जिले हैं, बाकी पूरा जम्मू-कश्मीर शांत रहता है)

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