घर के प्रधानमंत्री और देश के प्रधानमंत्री में साम्य

modiji-with-manika-mohini

मुझमें और मोदी में साम्य. सुन कर जल गए ना? आगे पढ़ो.

मोदी जी देश के प्रधान मंत्री हैं, मैं अपने घर की मुख्य मंत्री, प्रधान मंत्री, राष्ट्रपति, सब. देखिए, मैंने अपनी बादशाहत कैसे चलाई. एक घर को चलाने के लिए बुद्धिमत्ता की ज़रूरत होती है. देश को चलाने के लिए तो और भी बड़ी बुद्धिमत्ता चाहिए ताकि समर्थक, विरोधी सब खुश रहें.

1. मेरे साम्राज्य की गृह मंत्री है मेरी DIL (daughter-in-law) बरखा, जो घर की ओर ध्यान न दे तो मेरा साम्राज्य डाँवाडोल हो जाए. एक बार उसने अल्टीमेटम दे दिया, ‘खाना बनाने के लिए जब 8-10 हज़ार का cook मिल सकता है तो मैं खाना क्यों बनाऊँ? नौकरों से काम करवाना भी तो आखिर काम होता है.’

मैंने मान लिया. मानना पड़ा. अंत में बरखा की तारीफ़ भी की (चाणक्य नीति के साथ), ‘तुमने बढ़िया cook ढूँढा है, तुमसे बढ़िया खाना बनाता है. सच, तुम्हारे इस फ़ैसले को मानने के बाद सारा घर स्वादिष्ट खाना खा रहा है.’

2. मेरे साम्राज्य का वित्त मंत्री है, मेरा योग्य पुत्र, जिसके वित्त पर मुझ मुख्य मंत्री का अधिकार न हो तो मेरे साम्राज्य की पूरी अर्थ व्यवस्था चरमरा जाए. व्यस्त इतना कि कभी कोई बिल भरने को कह दो तो साहब अंतिम तिथि पूछेंगे, और अंतिम तिथि बिल भरे बिना निकल जाएगी.

आखिरकार सारे बिल स्वतः निकासी के लिए नेट पर लगा दिए. मज़ेदार बात यह कि अगर वह यानि फर्स्ट अकाउंट होल्डर अपने अकाउंट से कोई चेक काट दें तो वापस आ जाता है. बैंक उनके हस्ताक्षर नहीं पहचानता बल्कि मुझ जॉइंट अकाउंट होल्डर के हस्ताक्षर पहचानता है. आहाहा. मारा गया बंदा, गया काम से.

3. मेरे साम्राज्य की छोटी प्रजा है sober सिद्धांत, जिसका स्कूल जाने से ज़्यादा मन लगता है इंटरनेट पर पढ़ाई करने में. इंटरनेशनल स्कूल में पढ़ता है पर स्कूल के बारे में उसकी राय यह, ‘बकवास है स्कूल. कुछ पढ़ाई-वड़ाई नहीं होती. यू ट्यूब पर सारी क्लासें अवेलेबल हैं. यू ट्यूब पर जाकर सर्च में सब्जेक्ट का नाम लिख दो और क्लिक कर दो.

बस, एक टीचर क्लास लेती हुई स्क्रीन पर आ जाती है. मैं तो उसी से पढ़ता हूँ.’ ‘अरे पैसे के दुश्मन, तो इतनी फ़ीसें क्यों बर्बाद कर रहा है. स्कूल से नाम कटा देते हैं. घर बैठ कर पढ़.’ ‘न न, स्कूल का ठप्पा ज़रूरी है, वर्ना प्राइवेट कैंडिडेट कहलाऊँगा.’ असहमत होते हुए भी उसे क्या कहें, क्योंकि वह हर साल क्लास में टॉप करता है. रिपोर्ट कार्ड में क्लास टीचर के remarks होते हैं, very sober, very intelligent, well mannered, studious child…. जिओ मेरे लाल. देश के बारे में विचार यह कि ‘This country is too dirty. Who would like to live here?’

4. मेरे साम्राज्य की बड़ी प्रजा है मेरी जान मनु. कत्थक और वेस्टर्न डांस दोनों सीखती रही पर लक्ष्य बनाया वेस्टर्न डांस को. स्टेज पर अभिनय करने में सक्षम पर असली जीवन में भोली-भाली, छलहीन सच्ची बालिका. संस्कृति के नाम पर अपने देश की खामियाँ उससे सुन लो. मुझ मुख्य मंत्री तक को नहीं छोड़ती.

मनोचिकित्सक बनने की प्रक्रिया में है. अभी अधकचरा ज्ञान है पर आप उसे कोई समस्या बताएँ तो आपके मन की परतें एक-एक कर यूँ खोलेगी कि आप प्रभावित हुए बिना नहीं रहेंगे. देश के नाम पर विचार यह कि ‘रहने लायक नहीं है.’

अब मेरे अनुभव से उन तर्कों के उत्तर जो मोदी जी के समर्थन में कहे जाते हैं.

1. जिज्ञासा : मोदी जी को अपने लिए कुछ नहीं चाहिए, फिर भी इतनी मेहनत क्यों कर रहे हैं?

उत्तर : मैं भी इतनी मेहनत कर रही हूँ. मुझे किसी चीज़ की कमी नहीं. आराम से घर में बैठ कर ठाठबाट से रह सकती हूँ. मेरी संतान को भी मेरे पैसे का कोई लालच नहीं. लोग भी सुना देते हैं, ‘आखिर आप क्यों इतना खट-खप रही हैं?’ सो जिज्ञासुओं, यह कई लोगों का अपना स्वभाव होता है कि वे चैन से नहीं बैठ सकते. उनके दिल, दिमाग़ और शरीर में गज़ब का जोश और ताकत होती है, जिसे आप खलल भी कह सकते हैं.

उनका अपना स्वार्थ न भी हो, तब भी वे कर्म में लगे रहते हैं. This is their way of life. ठीक उसी तरह, जैसे निकम्मे लोग अकर्मण्यता में डूबे रहते हैं और कोई कामधाम नहीं करते. अब आई बात समझ में, मोदी जी बिना किसी स्वार्थ के क्यों इतना कर रहे हैं? जो भी कर रहे हैं, अपने मन का कर रहे हैं, मेरी तरह.

2. जिज्ञासा : अधिकतर नेताओं ने अपने भाई-भतीजों को कहाँ से कहाँ पहुँचा दिया. मोदी जी ने अपने किसी बंधु को लाभ नहीं पहुँचाया. सब फटेहाल रह रहे हैं.

उत्तर : 1. कई रिश्तों में शुरू से अलगाव की स्थिति होती है. जब पहले कोई लगांव रहा ही नहीं तो शिखर पर पहुँच कर लगांव कैसे बने? 2. जिनकी मदद की जाती है, उनमें अपना भी कुछ potential होता है. बिना potential के व्यक्ति की मदद नहीं की जा सकती. 3. कुछ रिश्तेदार शिखर पर पहुँचे अपने भाई बंधु से ईर्ष्या करते हैं और हीन भावना में रहते हैं.

अमिताभ बच्चन के भी सारे रिश्तेदार उनके संपर्क में नहीं हैं. इस बात का मुझे व्यक्तिगत अनुभव है. मेरे कई दूर-पास के संबंधी बड़ी कंगाली में रह रहे हैं. मैंने बहुत बार उन्हें नौकरी देनी चाही, उनके लिए अलग से काम खोलने के प्रस्ताव रखे लेकिन कुछ की हीन भावना आड़े आ गई, कुछ में potential नहीं, कुछ में भयंकर नखरा और कुछ में भयंकर ईर्ष्या. कहावत है, नरक के कीड़े नरक में खुश रहते हैं.

3. जिज्ञासा : वर्तमान स्थिति में मोदी कहाँ गलत हैं?

उत्तर : मेरा अनुभव. बहुत साल पहले की बात है. मैंने अपने घर में नोटबंदी कर दी. बस, इतने पैसे मिलेंगे, उससे ज़्यादा नहीं. कम खर्च करो. मन को मारना सीखो. अपने से नीचे वालों को देखो. लोगों के पास खाने को नहीं है और तुम्हारे खिलौने इतने महँगे आ रहे हैं. ब्ला ब्ला ब्ला. मेरी प्रजा में खलबली मच गई. प्रजा के चेहरे मुरझा गए. माथे पर तेवड़ियां पड़ गईं. हँसी का रंग बदल गया. खुसर-पुसर होने लगी. लव यू कहने पर हेट यू ध्वनित होने लगा….

अचानक एक दिन मुझ तानाशाह की अंतरात्मा जागी, ‘यार मणिका, सब तेरा मरना चाह रहे होंगे. कुछ तो ऐसा कर कि तेरे मरने पर चार लोग तो सच्चे दिल से रोएँ. ‘अच्छा है, बला टली’ कह कर कोई तुझे विदा न करे. तू आज ही समझ ले कि तू मर चुकी है. मरने के बाद कैसे किसी को कंट्रोल करेगी? सबको आज़ादी दे और सबकी दुआएँ ले.’

इस अंतर्ज्ञान के बाद थोड़ा किफ़ायती होने का पाठ पढ़ा कर मैंने सबके हाथों में अपने ख़ज़ाने की चाबी सौंप दी. उसके बाद से सब खुश हैं. पूरे घर में चहचहाहट है. हर वक़्त मम्मी ही मम्मी, अम्मा ही अम्मा. दिन में मैं घर में नहीं होती, तो मैसेज आ जाता है, ‘पिज़ा खाना है, इतने रुपये अलमारी से निकाले. डांस की फ़ीस देनी है, इतने रुपये अलमारी से निकाले. यह करना है, इतने रुपये, वह करना है, इतने रुपये….’ अब प्रजा भी खुश है, राजा भी खुश है. मेरी प्रजा की ख़ुशी में ही मुझ राजा की ख़ुशी है.

इति कथा सम्पन्न आहे.

 – मणिका मोहिनी

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY