सिर्फ SENSEX का ऊपर नीचे होना तय नहीं करता देश की तरक्की

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इस देश में उम्मीद है कि 3 लाख करोड़ के आसपास का काला धन देश में होगा. इसी काले धन का बहुत बड़ा हिस्सा भारत से बाहर जाता है. यहाँ गिनती में आया 3 लाख करोड़. GLOBAL FINANCIAL INTEGRITY के पिछले वर्ष की रिपोर्ट के अनुसार 2004 से 2014 में भारत ने 30 लाख करोड़ का काला धन बाहर भेजा है. अर्थात लगभग 3 लाख करोड़ प्रति वर्ष.

अब आप यह न समझें कि यह सारा पैसा हवाला से जाता है. उसी रिपोर्ट के अनुसार इसमें से 84% पैसा चालान या बिल की हेरा फेरी से जाता है. मतलब मैं एक निर्यातक हूँ मैंने अपना सामान का बिल कम कर दिया और अमेरिका या किसी और देश के ग्राहक को कहा आधा पैसा मेरे विदेशी खाते में जमा करवा दो और बाकी आधा भारत भेज दो. यही खेल भारत में आयात में भी होता है.

अब निर्यात पर आप कमी कर नहीं सकते क्योंकि आपको आयात करने के लिए डॉलर चाहिए जो आप निर्यात से ही कमा सकते हैं. इसी प्रकार आप जब आयात करते हैं तब भी आप misinvoicing करके पैसा अपने बाहर के खाते में जमा कर सकते हैं. इसीलिए आप समझें कि आप चक्रव्यूह में हैं.

एक बात और समझाने के लिए आवश्यक है कि जो धन बाहर जाता है उसे वापिस लाने के लिए स्वयं सरकार ने ही रास्ते सुझाए हैं और कानूनन मंज़ूरी दी गयी है. इसके लिए यह समझना भी आवश्यक है कि तथाकथित अर्थशास्त्रियों का बुद्धि चक्र देश के विकास का जो पैमाना मानता है मात्र SENSEX को जिसमें मात्र देश के 5% से भी कम लोगों का पैसा लगता है.

जब यह SENSEX ऊपर चढ़ता है तो यह माना जाता है कि देश तरक्की कर रहा है. एक और विडम्बना देखिये सन 1991 में 5000 के आसपास SENSEX था और जब आप वैश्वीकरण और भूमंडलीकरण के युग में प्रवेश कर गए तो आज देश का SENSEX 25000 के पार हो गया.

इसका अर्थ 25 वर्षों में 5 गुना. यदि इसी आंकड़ों को प्रतिवर्ष के हिसाब से देखें तो 20% के आसपास की विकास दर गिनती में आती है. वहीं वह देश 8-9 % प्रतिशत विकास दर के लिए संघर्ष कर रहा है. इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि SENSEX का बढ़ना देश की विकास की पहचान नहीं है.

परन्तु भारत के तथाकथित अर्थशास्त्री इस SENSEX को बढ़ाने के लिए कुछ भी करना है. इसीलिए भारत सरकार ने उनके कहने पर FII की शुरुआत की. इसे foreign institutional investor कहते हैं इसमें विदेशी पूँजी को आने के लिए रास्ता खोल दिया.

इस निवेशक को कहाँ से पैसा आया कहाँ निवेश किया इत्यादि के लिए पूछा जाता था. फिर भी कुछ नियमावाली इसके लिए थी. पर इससे जब भारत में काला धन नहीं आ पाया क्योंकि नियम ऐसे थे तो सरकार ने participatory notes का प्रचलन किया.

इसके उपयोग से निवेशक को यह बिलकुल नहीं बताना कि पैसा कहाँ से आया. इससे यहाँ पर काला धन आसानी से आने लगा. अब इसके परिमाण का अंदाजा लगाइए.

पूरे का पूरा सट्टा बाज़ार या share market लगभग 90 लाख करोड़ के आसपास का है. इसमें रोज़ का रोज़ लगभग 23000 करोड़ के आसपास का लेनदेन होता है. और आज इस देश में participatory notes यानी शुद्ध काले पैसे का परिमाण है लगभग 2.4 लाख करोड़.

इन आंकड़ों से आप कल्पना कर सकते हैं कि जिस दिन विदेशी या देशी काला पैसा pnotes के बहाने से इस बाज़ार से निकलेगा को देश के असली निवेशकों का क्या होगा?

इस पूरी व्यवस्था में सबसे पहले यह समझना चाहिए कि SENSEX का बढ़ना तब तक देश की असली तरक्की नहीं होगी जब तक देश का 60% से 70% इसमें न लगे. और ऐसा करने में भी कई परेशानियां हैं. इसलिए हमें देश के विकास को SENSEX से नहीं देखना चाहिए. जिसे असल में काला धन सफ़ेद बनाने के लिए भी उपयोग किया जा रहा है.

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