सोशल पर वायरल : मैं डूब रहा हूँ, अभी डूबा तो नहीं हूँ

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हमको ग़ज़ल सुनने का शौक कब और कैसे हुआ पता नहीं. शायद बहुत बचपन में माँ से बेगम अख्तर की ग़ज़ले सुनते हुए बड़े हो ही रहे थे कि सातवीं आठवीं में आते आते खुद ही “चुपके-चुपके रात-दिन ” गुनगुनाना शुरू कर दिया.

पर हमेशा ये ख्याल ज़ेहन में रहा कि ग़ज़ल का शौक होना अपने आप में थोड़ी विचित्र बात है. आम तौर पर लोग ये समझते हैं  समझ कुछ नहीं आता होगा शो-ऑफ कर रहा है या तुरंत ये मुग़ालता पाल लेते हैं  इसका तो कहीं दिल टूटा होगा इसीलिए ग़ज़ल का शौक़ीन हो गया है…

शायद इसी वजह से हमेशा अपने फेसबुक वाल पर ग़ज़लें शेयर करने से कतराते रहे हैं. परंतु आज सुबह की बात है ऑफिस जाने के लिए ट्रैन में बैठे तो रोज़ की तरह फेसबुक पर विचरण करने निकल पड़े, उसी में  एक ऐसा वीडियो मिला जिसे देख के भरी ट्रैन में आँख नम हो उठी.

तुरंत  ओरिजिनल की तलाश में यूट्यूब खंगाला, बिना किसी हुज्जत के सज्जाद अली की गाई और आफ़ताब मुज़्तर  की लिखी ये ग़ज़ल मिल भी गयी, पर सच कहें  तो इसके सामने  orchestra के साथ गायी  सज्जाद अली की ओरिजिनल भी फ़ीकी  ही लगी  –

इस वीडियो वाले ये साहब को देख के ये तो साफ़ है कि ये घर-पुताई (पेंटर का थोड़ा गरीब वाला वर्शन) का काम करते हैं. कहाँ के हैं, कौन हैं कुछ पता नहीं.

किसी ने ये भी कमेंट किया कि पाकिस्तानी हैं, हमको फर्क नहीं पड़ता, वैसे भी हमारी निजी राय है कि गायकी और फ़ास्ट बोलिंग में पाकिस्तानी हम भारतीयों से बेहतर हैं. (निजी राय है आप सहमत हो ये ज़रूरी नहीं).

हम  सिर्फ एक ग़ज़ल के शौक़ीन की तरह इस उम्मीद से शेयर कर रहे हैं कि काश CokeStudio – MTV की नज़र पड़े और वो इन्हें ढूंढ पाएं. जिससे इनकी गुमनामी और मुफ़लिसी दूर हो सके – और हम लोगों को इनकी आवाज़ आइंदा भी सुनने को मिले.

– आशीष निगम

ग़ज़ल के बोल

साहिल पे खड़े हो तुम्हें क्या ग़म, चले जाना
मैं डूब रहा हूँ, अभी डूबा तो नहीं हूँ
हर ज़ुल्म तेरा याद है, भुला तो नहीं हूँ
ऐ वादा फ़रामोश, मैं तुझ सा तो नहीं हूँ
चुप-चाप सही, मस्लेहतन, वक़्त  के हाथों
मजबूर सही, वक़्त से हारा तो नहीं हूँ
ए वादा फरामोश, मैं तुझ सा तो नहीं हूँ
‘मुज़्तर’  क्यूँ मुझे, देखता रहता है, ज़माना
दीवाना सही, उनका तमाशा तो नहीं हूँ
ए वादा फरामोश ,मैं तुझ सा तो नहीं हूँ
हर ज़ुल्म तेरा याद है, भुला तो नहीं हूँ
ए वादा फरामोश, मैं तुझ सा तो नहीं हूँ

– आफताब ‘मुज़्तर’

( मस्लेहत- compromise )

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