विद्वान वामी : शत्रु सेना में भर्ती हमारे ही बौद्धिक योद्धा

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विद्वान > विपन्न > विवश > बिकाऊ > विस्फोटक
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इस अनुक्रम को देखेंगे तो समझ में आता है कि टॉप के वामी ब्राह्मण क्यूँ होते हैं.
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आइये देखते हैं.

इस अनुक्रम को देखते हैं तो सब से पहले कदम पर विद्वान आता है. हमें यह समझना चाहिए कि विद्वान बनने के लिए मेहनत करनी होती है. आदमी जन्मना बुद्धिमान हो सकता है, बुद्धि सहज हो सकती है, परंतु विद्वत्ता श्रमसाध्य ही है. तो फिर यह समझ लें कि श्रम क्यूँ करता है कोई?

महत्वाकांक्षा इसका सब से प्रथम उत्तर है. ‘नाम ‘ सिर्फ माँ बाप का दिया हुआ नहीं होता, खुद कमाया भी जाता है. बालमन पर यह संस्कार अन्यों को देख कर अनायास ही हो जाता है. किसी को मिलता हुआ आदर, प्रेम या उसके कृपा के लिए लोगों का लालायित रहना आदि उसके समझ में आ ही जाता है और उसका उत्तर भी आसानी से मिल जाता है कि लक्ष्य को सतत केंद्र में रख कर कष्ट करें तो यह साध्य हो सकता है. अब अगर उसकी प्रेरणा इतनी बलवती है कि वो अपयश से हतोत्साह न हो, तो लक्ष्य प्राप्त भी करता है.

बात विद्वता की कर रहे हैं तो अब तक यह स्पष्ट हुआ होगा कि बौद्धिक श्रेष्ठत्व सिद्ध करना जिसका लक्ष्य है वो विद्वान बनने का प्रयास करता है. मेहनत करता है और यशस्वी हो तो अपने रुचि के विषय में विद्वत्ता प्राप्त भी कर लेता है. उस विषय में विद्वान कहलाता है या कम से कम कहलाने का हकदार तो बन जाता है.

अब प्रश्न आ जाता है उसके बाद क्या? गृहस्थी और उसके कर्तव्य भी हैं, उसका क्या करें? विद्या का कोई पारखी कदरदान न मिले तो विफलता के साथ विपन्नता भी मुंह ताकती है. यहाँ वो खुद की जरूरतों के सामने विवश है, बिकाऊ हो जाता है.

हर विषय की समाज को जरूरत तो होती है लेकिन अक्सर यह होता है कि उसके विद्वान को पता नहीं होता कि उसकी कदर कहाँ होगी. यह भी होता है कि जो उसको अपने शहर में ही रहना है जहां सभी वेकंसियाँ पहले ही भर चुकी हैं. फिर जो करना पड़ता है उसे सभ्य भाषा में समझौता कहने का रिवाज है.

एक और बात भी होती है, विद्वान बनने में जो मेहनत की है उसके सामने अपेक्षित सम्मान या धन न पाने से मन में निराशा, हताशा के साथ काफी और नेगेटिव भावनाएँ भर आती हैं. अपनी अवस्था के लिए आदमी, परिवार, समाज, देश आदि को जिम्मेदार ठहराता है. यह सभी कुंठाएँ मन में भर आती हैं. जहां मौका मिले, वो समाज पर ठीकरा भी फोड़ता है.

अब एक बात आप से कहनेवाला हूँ. कभी कभी ऐसे भी होता है कि कोई व्यक्ति अप्रत्याशित तीव्रता से हम से पेश आता है और हम यह सोचते रह जाते हैं कि उसके ऐसे बर्ताव का कारण क्या होगा. बाद में कहीं जा कर राज खुलता है कि कोई बहुत ही छोटी सी बात जिसे आप भूल भी चुके हैं, उसने याद रखी थी और उसका बदला लेने वो तरस रहा था.

यह भी होता है कि अपने परिवार के किसी पूर्वज के कारण हम से ऐसा सलूक किया जा रहा है. हम अक्सर इस बात का सामना व्यक्तिगत जीवन में कई बार करते तो हैं लेकिन शायद यह कभी नहीं सोचते कि ऐसा व्यक्ति पूरे समाज या देश के प्रति भी ऐसी बदले की भावना रखता होगा.

लेकिन हाँ, ऐसा बकायदा होता है जहां लोग कोई प्रतिष्ठित मंच का लाभ उठाकर समाज – देश को बदनाम कर देते हैं, जिसके कारण व्यक्तिगत होते हैं. अक्सर यह होता है कि उन्हें जो चाहत थी, मिली नहीं.

यह विध्वंसक विस्फोटकता होती है. कौन से द्रोणाचार्य का कौन राजा द्रुपद होता है यह पता नहीं होता लेकिन कुछ लोग जरूर होते हैं जो ऐसे असंतुष्टों पर नजर रखते हैं, उन्हें पाल रखते हैं. उनके अंदर जो भी नेगेटिव भाव भरे हैं, कुंठा, क्रोध, उस सब को प्रतिशोध में बदल देते हैं. फिल्मी स्टाइल में – बदला, बदला, बदला !

वास्तव में यह हमारी कमी है कि हम इन विद्वानों की असली उपयुक्तता पहचानते नहीं. वे हमारे होते हैं, लेकिन उनकी कदर हम करते नहीं. इनको पालनेवाले लोग उन्हें हमारे ही खर्चे से पालते हैं. जो संस्थाएं इन्हें पालती पोसती हैं वे सभी सरकार के अनुदान से ही चलती हैं, यानि हम करदाताओं के पैसों से ही हमारे शत्रुओं को पोसा जाता है. लेकिन हम इसे समझते ही नहीं. जो अपने बौद्धिक योद्धा हो सकते थे उन्हें शत्रु सेना में हम खुद ही भर्ती कर देते हैं.

यह बात बुद्धिजीवियों पर लागू होती है. इन अवस्थाओं से गुजरा हर बुद्धिजीवी इसका शिकार हो सकता है – जरूरी नहीं है कि होगा ही. विशिष्ट जाति का होना भी जरूरी नहीं है. आज कई हैं जो ब्राह्मण नहीं हैं लेकिन यह बात उनपर फिट बैठती है. फिर भी ब्राह्मण का नाम इसलिए लिया था क्योंकि बहुतांश ब्राह्मण बुद्धिजीवी होते हैं.

और जो कॉर्पोरेट कैरियर नहीं बना पाते लेकिन बुद्धि में कम नहीं (IIT IIM IAS जरूरी नहीं) वे कम्युनिस्ट कैरियर बनाते हैं, इसीलिए शायद टॉप लेवल के वामी ब्राह्मण पाये जाते हैं. लोहा लोहे को काटता है ….. वैसे ब्राह्मणों पर वामी ही होने का कोई आरोप नहीं लगा रहा हूँ.

एक ब्राह्मण थे, विष्णुगुप्त उनका नाम था; आप को पता होगा? वे चाणक्य के नाम से ज्यादा प्रसिद्ध हैं. बाकी जो है सो हइए ही है.

I repeat – यद्यपि मैंने इस पोस्ट में ब्राह्मणों का नाम लिया है, यह विषय ब्राह्मणों तक सीमित नहीं है, सभी हिन्दू बुद्धिजीवियों पर यही बात लागू होती है. हिन्दू ही क्यूँ? क्यूंकि इल्हामी और इसाई अपने बुद्धिजीवियों को अपने साथ संभाल कर रखते हैं, उन्हें आक्रमण तथा बचाव के बौद्धिक योद्धा समझते हैं.

और हिन्दू? हिन्दू तो यह भी समझने को तैयार नहीं कि जिन्हें हम अपने साथ नहीं रखते वे हमारे शत्रुओं को उपलब्ध हैं. Those who you don’t hire to work for you are available to your enemies to work against you.

वे तो यह भी नहीं समझते कि भारत की सेक्युलर सरकार उन्हें बतौर हिन्दू बचाने के लिए प्रतिबद्ध नहीं है. सन 47 से आज तक का इतिहास देखकर आप मुझे गलत ठहरा सकते हैं, ख़ुशी होगी अगर कहीं ऐसा हुआ भी हो.
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