नोटबंदी : कैसे काले पर सफ़ेदा पोत कर उसे फिर से काला करा जाए

जनधन खातों में आई इस कई हजार करोड़ रूपये की राशि को पांच साल के फ़िक्स डिपाजिट (एफडी) के रूप में अनिवार्य रूप से जमा कर देना चाहिए. ऐसा करने पर काले धन के माफ़िया की अक़्ल ठिकाने लग जाएगी.

आठ नवम्बर को नोट बंदी के बाद उसी समय मैंने सुझाव दिया था कि हजार और पांच सौ के नोटों को बदलने की जगह पुराने नोटों को सिर्फ़ व्यक्ति के खाते में ही जमा करने का आदेश देना चाहिए.

नक़द अदलाबदली नहीं करना चाहिए. नहीं तो बैंकों के भ्रष्ट कर्मचारी अपना कमीशन / रिश्वत लेकर रामलाल के काले धन के पुराने नोट लेकर नए नोटों में बदलकर दे देंगे. ऐसा करने में बैंक का कर्मचारी श्यामलाल के पैन नम्बर और आई डी का उपयोग करके काग़ज़ी खानापूर्ति कर लेंगे.

चूँकि बैंक के रिकार्ड में सब खाताधारियों के आई डी और पैन कार्ड नम्बर रहते हैं, ग़रीब श्याम लाल को पता भी नहीं चलेगा कि रामलाल ने उसके नाम का उपयोग करके अपने काले धन को सफ़ेद में बदल लिया है.

अगर ऐसी सावधानी बरती गई होती तो बैंकों में लम्बी क़तारें नहीं लगती.

अभी तक जन धन योजना के खातों में कई हजार करोड़ रूपयों से जमा हो गये हैं, जबकि 8 नवम्बर 2016 के पूर्व इनके खातों में कुछ भी नहीं था. इसका मतलब यह है कि ग़रीबों की आड़ में काले धन का माफ़िया अपना काला धन सफ़ेद कर रहा है.

अब मेरा सुझाव है कि सरकार को चाहिए कि इस कई हजार करोड़ रूपये की राशि को पांच साल के फ़िक्स डिपाजिट (एफडी) के रूप में अनिवार्य रूप से जमा कर देना चाहिए. ऐसा करने पर काले धन के माफ़िया की अक़्ल ठिकाने लग जाएगी.

पता नहीं सरकार इस सुझाव पर कार्यवाही करती है या नहीं?

इधर समाचार मिल रहे है कि निजी अस्पतालों के ज़रिए डाक्टर लोग धड़ल्ले से अपना काला धन सफ़ेद कर रहे हैं. मरीज़ों से नए नोटों में पैसे वसूल किए जा रहे हैं और बैंकों में मरीज़ों के नाम पर पुराने नोट (डाक्टरों का काला धन) जमा हो रहा है.

जानकारी मिली है कि लगभग अधिकांश व्यापारिक प्रतिष्ठानों ने अपनी कैश बुक और बही खाता 8 नवम्बर के पहिले की तारीख में अभी भी खोल रखा है.

यह लोग अपने ग्राहकों से पिछली तारीख में लेन देन करके 30 दिसम्बर के पहिले तक अपना पिछली तारीख में अकाऊन्ट का लेन देन जारी रखेंगे.

इस प्रकार पिछली तारीख की एन्ट्री बताकर आराम से बन्द नोटों के काला धन का सफेदीकरण करके अपने रिकार्ड के लेखा जोखा भी कर देंगे.

इस प्रकार अभी वर्चुअल खरीद-फरोख्त का कारोबार भी चोर रास्ते में धड़ल्ले से चल रहा है. उदाहरण के लिए भवन कहीं अस्तित्व में नहीं है पर ईंट, गिट्टी, रेत, सीमेन्ट, सरियों का भुगतान हो रहा है.

निजी फायनेन्स कम्पनियां कागजी फायनेन्स बताकर बोगस भुगतानों के जरिए पुराने काले नोटो के ढेर में सफेदा पोत रही हैं.

सरकार के पास ऐसी कोई युक्ति नहीं है जो इस प्रकार से हो रहे काल्पनिक और फर्जी लेन देन को रोक सके.

कुछ काले धन कुबेरों ने तो और भी नायाब तरीक़ा इजाद कर लिया है. बडी संख्या में यह लोग अपने ट्रेवेल एजेंट के खाते में पिछली तारीख़ में राशि जमा करके विदेश यात्रा पर जा रहे हैं.

ये लोग अपने साथ में निजी बैंकों से प्रति टिकिट दस हजार डालर का ‘डालर कार्ड’ जो पॉच साल तक वैलिड है, आसानी से बनवा रहे हैं.

डालर कार्ड पुराने नोट देकर बनवाया जा रहा है और उसे सरेन्डर करके नए नोटों की गड्डी कुछ महीने बाद भुना ली जावेगी.

इस काम के लिए ज़रूरत होती है सिर्फ़ विदेशी वीज़ा और रिटर्न टिकिट की, जो सरलता से मिल जाता है.

इस तरीक़े से हज़ारों करोड़ रूपया काले का फिर से सफ़ेद होकर भविष्य के गहरे काले में बदला जा रहा है.

इधर प्राइवेट बैंकों के मैनेजर भी कम उस्ताद नहीं हैं, सरकारी नियम क़ायदों में कैसे लूप होल ढूंढ के अपना उल्लू कैसे किया जा सकता है. कोई इनसे सीखे.

एक बैंक का मैनेजर उसके यहाँ इकट्ठा नोट बदली की आईडी सैकड़ों की तादाद में दूसरे निजी बैंक को देकर उसके यहाँ जमा आईडी को अपने यहां आदान प्रदान करके आराम से एक ही आईडी से कई जगह पैसा निकाल सक रहे हैं, और अपना कमीशन काट करके गुपचुप कई लोगों का काला सफ़ेद कर रहे हैं.

अगर इस समाचार में कुछ दम है तो यह सब भी देश के शत्रु हैं.

अब बैंकों के कर्मचारियों के कार्यकलापों पर शंका व्यक्त की जाने लगी हैं. यह और भी चिन्ता का विषय है.

खातेदार जो हजार पांच सौ के नोट बैंक में वापिस कर रहे हैं, उसकी बैंक कर्मचारी सौ-सौ की गड्डी बनाकर अलग रखते जा रहे हैं.

कायदे से उनको तत्काल ही इन नोटों को कैंसिल की सील लगाकर प्रचलन से अलग कर देना चाहिए.

बैंक में जमा हो रहे प्रचलन से बाहर नोटों की गड्डियों को पैक करने के बाद किसी निजी कम्पनी को सौंपा जाता है.

यह निजी कम्पनी उन्हें कलेक्ट करके रिजर्व बैंक के निर्देशानसार नष्ट करने के गन्तव्य पर पहुंचाती है.

इन नोटों की गड्डियों को गिनकर या उनके नम्बर नोट करके निरस्तीकरण के दौरान कहीं पर भी पुन: चेकिंग की कोई अलग से व्यवस्था नहीं होती है.

कहा तो यह भी जाता है कि इन प्रचलन से बाहर किए गए नोटों को भी नष्ट करने का प्राइवेट पार्टियों को ठेका दिया जाता है.

चूंकि बैंक में आते ही इन नोटों पर कैंसिल की कोई सील या ठप्पा नहीं लगता है इस कारण, सूत्रों का कहना है कि चतुर बैंक कर्मी चुपचाप इन गड्डियों में से कुछ हजार पॉच सौ के नोट बाहर निकाल लेते है.

एक बार जमा किए जा चुके यही नोट फिर से बाहर आकर दुबारा बैंक में जमा कराए जा रहे हैं.

इस खबर पर एक दम यकीन तो नहीं होता, पर जिस तरह से हमारे देश में भ्रष्टाचार समाज की नस नस में घुसा है, उसे देखते हुए ऐसा किया जाना भी संभव नजर आ रहा है.

इस षडयंत्र का अगर पर्दाफाश या जांच करना है तो किसी निष्पक्ष एजेंसी को प्रचलन से बाहर की गई हजार पांच सौ की गड्डियों की फिर से जांच कराना चाहिए. पता चल जाएगा घपला हो रहा है या नहीं?

इन दिनों हवाला कारोबारियों का धन्धा बहुत तेज़ी पर है. सूत्रों की जानकारी अगर सही मानी जाए तो अकेले इन्दौर में लगभग 28 हवाला कारोबारी हैं.

इनमें अधिकांश वह हैं जिनके बड़े बड़े शोरूम इन्दौर में हैं और उनके लड़के बच्चे दुबई में धन्धा करते हैं.

इन लोगों के पास अनापशनाप विदेशी मुद्रा कही जाती है. इनके दुबई स्थित कार्यालयों में सैकड़ों करोड़ हिन्दुस्तानी रूपया है.

अन्तर्राष्ट्रीय बैंकिंग विनिमय के अनुसार 8 नवम्बर की पुरानी करेन्सी की क्लोजिंग रिज़र्व बैंक को 24 घण्टे में अनिवार्य रुप से आ ज़ाना चाहिये थी.

पर आरबीआई के पास ऐसी कोई युक्ति नहीं है कि विदेशी बैंक अगर पुरानी करेन्सी वापिस करें तो उसे बदलकर नहीं दें.

इसके कारण अकेले इन्दौर में बताया जा रहा है कि एक अमेरिकन डालर 105 रूपयों में बिक रहा है. इसी तरह दिल्ली में तो एक डालर 120 रूपये के पुराने नोटों में बिक रहा है.

हवाला कारोबारी 20 परसेन्ट कमीशन काट कर पुराने नोट ले रहे हैं. उनके पास दस रुपये के एक नए नोट के दो टुकड़े होते हैं.

एक लाख की हवाला क़ीमत का दस रूपए के नोट का हिस्सा भारत में काले धन देने पर यहां दिया जाता है, उसका दूसरा आधा हिस्सा दुबई में रहता है.

काले धन को सफ़ेद करने वाला आदमी दुबई में जाकर अपना आधा कटा नोट देता है.

दुबई का हवाला व्यापारी उसके पास मौजूद आधे हिस्से से मिलाकर उसको विदेशी मुद्रा दीनार या डालर में बदल कर दे देता है.

कहा जाता है, भारत से यह भारतीय मुद्रा चोर दरवाज़े से या समुद्री मच्छीमार नौकाओं के द्वारा दुबई चली जाती है.

इस पूरे हवाला प्रसारण में राज नेताओं, आईएएस अफ़सरों, कोस्ट गार्ड और पुलिस की साठ गांठ रहती है, क्योंकि सबसे ज़्यादा काला घन इन लोगों के क़ब्ज़े में रहता है.

मोदी जी ने अचानक उठापटक करके इन सबको हक्का-बक्का कर दिया है. अब यह सभी लोग जोड़तोड़ में लगे हैं तथा काले सफ़ेद के गोरखधन्धे में नए-नए तरीक़े खोज रहे है! कैसे काले पर सफ़ेदा पोत कर उसे फिर से काला करा जाए?

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति मेकिंग इंडिया ऑनलाइन (www.makingindiaonline.in) उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार मेकिंग इंडिया ऑनलाइन के नहीं हैं, तथा मेकिंग इंडिया ऑनलाइन उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.

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