मनुस्मृति : जो पुरुष धर्म का नाश करता है, धर्म कर देता है उसी का नाश

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अशरफ (सैय्यद मीर), अजलफ (शेख, पठान ), अरजाल (जुलाहा , हज्जाम), अजलाम और पसमांदा (भंगी, मेहतर ,चमार) —- मुस्लिम समाज में ये वर्ण बने अपनी पैदाइश, धर्मान्तरण और अपनी दिनचर्या के आधार पर.

अपने हक़ों के लिए पसमांदा, अरजाल अजलाफ और अजलाम सभी लड़ रहे हैं लेकिन अपने धर्म और धर्मशास्त्रों की धज्जियाँ उड़ा कर या उन्हें जला कर नहीं. अपने धर्म और धर्म शास्त्रों का अपमान कैसे करना है, यह कोई सीखे तो उन हिंदुओं से जो विदेशी चंदे पर पल रहे है.

धर्म का अपमान करना एक मानसिकता हो सकती है लेकिन धर्म का अपमान सहने वाले हिंदुओं को क्या कहा जाये जो मूकदर्शक बने हुए हैं. महर्षि मनु ने उनके लिए भी मेरे संज्ञान में दो कथन कहे हैं —–

यत्र धर्मो ह्यधर्मेण सत्यं यत्रानृतेन च ।हन्यते प्रक्षेमानानां हतास्तत्र सभासदः ।। अध्याय 8 श्लोक 14
अर्थात जिस सभा में अधर्म से धर्म, असत्य से सत्य, सब सभासदों के देखते हुए मारा जाता है, उस सभा में सब मृतक के समान हैं.

आज महर्षि मनु और मनुस्मृति पर स्त्रीविरोधी और दलित विरोधी होने का आक्षेप लगाने वालों ने न तो कभी मनुस्मृति पढ़ी और न ही अम्बेडकर को पढ़ा जिन्होंने मनु का घोर विरोध किया था.

गौर करें अम्बेडकर ने भी चतुर्वर्ण के विषय में “Annihilation Of Castes ” — में लिखा है कि chaturvarn is based on worth. और दूसरे उन्होंने भी मनुस्मृति के श्लोकों का अपने हिसाब से व्याख्या जैसे — यह कैसे हो सकता है कि ब्राह्मण ही पढ़ेगा और पढ़ायेगा, क्षत्रिय ही शस्त्र धारण करेगा और वैश्य ही व्यापर करेगा.

यदि उन्होंने इसे मनुस्मृति के अंग्रेज़ी अनुवाद न पढ़ कर संस्कृत के श्लोकों की व्याख्या इस प्रकार की होती कि जो पढ़ेगा और पढ़ायेगा वो ब्राह्मण है, जो शस्त्र धारण करेगा और प्रजा की रक्षा करेगा वो क्षत्रिय है और जो व्यापार करेगा वो वैश्य है तो शायद उन्हें मनु से इतनी नफरत न होती और आज समाज में इतनी वैमनस्यता भी नहीं फैलती.

अम्बेडकर ने प्रक्षेपित श्लोकों का तो संज्ञान लिया कि जो शूद्र वेद पढ़ेगा या सुनेगा उसकी जिह्वा काट दी जाएगी और कान में पिघला हुआ सीसा डाला जायेगा लेकिन उन्होंने एक बार भी मनु द्वारा रचित निम्न श्लोकों का संज्ञा बिलकुल नहीं लिया कि एक ही व्यक्ति दो विरोधाभासी बातें कैसे लिख सकता है ????

अध्याय 4 श्लोक 35 —–कम अंगों वालों या अपंगों, या विद्याविहीन, आयु में बड़े और रूप और धन से रहित और अपने से निम्न वर्ण वर्ण वालों पर कभी आक्षेप /व्यंग्य न करें.

अध्याय 4 श्लोक 51 — पुत्र और शिष्य से भिन्न अन्य किसी व्यक्ति पर दण्ड न उठायें और क्रोधित हो कर भी न मारें, न वध करें. पुत्र और शिष्य को भी केवल शिक्षा देने के लिए ताड़ना करें.

अध्याय 4 श्लोक 24 —-सिखाये हुए सुन्दर लक्षणों से युक्त सुन्दर रंगरूप से शीघ्रगामी पशुओं से चाबुक की मार से बहुत पीड़ा न देता हुआ सवारी करे.
अध्याय 3 श्लोक 44 — चूल्हा चक्की झाड़ू ओखली पानी का घड़ा, गृहस्थों के लिए ये पांच हिंसा के स्थान हैं, इनका प्रयोग करते समय गृहस्थ जाने अनजाने हिंसा जनित पापों में बंध जाता है.

— और भी बहुत से श्लोक हैं जो किसी भी प्रकार की हिंसा और प्रताड़ना को पाप की श्रेणी में रखते हैं, तो मनुस्मृति का अंध विरोध करने वाले कभी दिमाग लगाकर यह क्यों नहीं सोच पाते कि जो व्यक्ति जानवर को कोड़ा तक मारने को हिंसा की श्रेणी में रखता है वो किसी की जुबान काटने या कान में सीसा डालने जैसी हिंसा की विरोधीभासी बातें कैसे लिख सकता है ????

मनु की वर्णव्यवस्था में ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शुद्र कैसे बनते थे ?????

अध्याय 2 , श्लोक 12 -13 —मनु के अनुसार जो अपने बच्चों को ब्राह्मण बनाना चाहे वो उनका उपनयन पांचवें वर्ष तक क्षत्रिय छठे वर्ष और वैश्य का आठवें वर्ष में करवा दें.

यदि इन वर्षों में उपनयन न करवा पाएं उनमे ब्राह्मणों का उपनयन सोलहवें वर्ष, क्षत्रिय वर्ण के इच्छुक बाईस वर्ष और वैश्य वर्ण के इच्छुक चौबीस वर्ष तक करवा लें. जिनका उपनयन इस आयु सीमा में नहीं हो पाता था वे शूद्रों की श्रेणी में आ जाते थे. यह उपनयन भी बच्चो के aptitude पर निर्भर करता था.

ऐसा भी नहीं था कि यदि कोई एक वर्ण में चला गया तो उसका वही वर्ण रहता था—
अघ्याय 2 श्लोक 62 — जो मनुष्य नित्य प्रातः और सांय सन्ध्योपासना नहीं करता उसको शुद्र के समान समझकर द्विजकुल से से अलग करके शूद्रकुल में रख देना चाहिए.

जो शरीर से बलिष्ठ होता था परन्तु जिसकी पढ़ने लिखने में रूचि नहीं होती थी और जो पढ़ लिख नहीं पाता था वो शुद्र बन कर दूसरों की सेवा करके अपना जीवनयापन करता था.

जब सेवा करता था तो कोई संशय नहीं कि अन्य वरणो के संपर्क में भी आता ही होगा, तो यह कहना अनुचित है कि शूद्रों को अछूत समझ जाता था. शूद्रों को क्या सम्मान दिया जाता था उसके लिए एक दो श्लोक लिख रहा हूँ.

अध्याय 3 श्लोक 80 — विद्वान् अतिथियों द्वारा भोजन कर लेने पर और अपने सेवकों आदि के खा लेने पर शेष बचे हुए भोजन को पति पत्नी खायें.

अध्याय –3 श्लोक, 66 67 एवं 81 — दिव्यगुण सम्पन्न विद्वानों, विद्या के प्रत्यक्षकर्ता ऋषियों को, माता पिता आदि पालक व्यक्तियों को, गृहस्थ द्वारा भरण पोषण की अपेक्षा रखने वाले असहाय, अनाथ कुष्ठ रोगी, सेवक आदि को भोजन दान द्वारा सत्कृत करके उसके बाद इनसे शेष बचे भोजन को खाने वाला हो अर्थात उस शेष भोजन को खाया करे.

बात जहाँ से शुरू हुई थी वहीँ पर ख़त्म करता हूँ, फ़ेसबुकिया कागज़ी शेरों के लिए मनु महाराज ने एक बात और कही थी —-
धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षतिः।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोवधीत। —अध्याय 8 श्लोक 15

भावार्थ —– जो पुरुष धर्म का नाश करता है, उसी का नाश धर्म कर देता है. और जो धर्म की रक्षा करता है उसकी धर्म भी रक्षा करता है. मारा हुआ धर्म हमको कभी न मार डाले, इसलिए धर्म का हनन या त्याग कभी नहीं करना चाहिए.

पूर्वज पढ़े नहीं और खुद कुछ पढ़ना नहीं चाहते और दोष देते हैं #मनु को कि उन्होंने शूद्र बना दिया. जो प्रमाणपत्र लेकर खुद को शूद्र कहते हैं उन्हें सुझाव है कि पढ़ें लिखें अपनी मानसिकता सुधारें और अपना वर्ण बदलें ( जिसकी आज के समय में कोई अहमियत नहीं बची है. )

बाकि मूक दर्शकों से निवेदन है कि यदि ज़मीन पर कुछ नहीं कर सकते तो आभासी दुनिया में ही इस पोस्ट को शेयर करके भ्रांतियों को दूर करें एवं अपने जीवित होने का प्रमाण दें.

जिसके दिल में भी 6 दिसंबर 2016 को जयपुर में मनुस्मृति जलाने के अरमान हैं, वो पूरा दम लगा कर कोशिश कर लें.

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