कष्टप्रद नहीं, मोदी का बड़ा लोकलुभावन फैसला है नोटबंदी

गरीब आदमी महीने दो महीने में सब कष्ट भूल जाएगा. अपना दुःख भूल जाएगा. 30 दिसम्बर के बाद उसे सिर्फ ये याद रहेगा कि सेठ जी की काली कमाई बर्बाद हो गयी.

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कल रात या यूँ कहें कि सुबह सवा 4 बजे ये ट्रेन अम्बाला से पकड़ी.

वहाँ प्लेटफॉर्म पर रेलवे के 3 वेंडर अपने स्टाल पर बड़ी गंभीर वार्ता कर रहे थे जिसमें मैं चाय पीने के बहाने शामिल हो गया.

मैंने एक आपिये का रूप धारण कर लिया और उन तीन मोदी भक्तों से भिड़ गया – “पब्लिक को भोत दिक्कत हो रई है…. पब्लिक मर रेली है…. हाय मर गए….”

वो तीनों नव मोदीभक्त मुझ पर चढ़ बैठे – “अरे कौन मर गया? कहीं कोई ना मर रिया. कोई दिक्कत न हो रही आम पब्लिक कू….. अरे दिक्कत तो रेल के इन भ्रष्ट अधिकारियों ठेकेदारों को है….”

आश्चर्यजनक रूप से वो तीनों वेंडर नोट बंदी के हर पहलू से वाकिफ थे और गंभीर चर्चा कर रहे थे.

मैंने उनसे पूछा -“अबे चलो छोड़ो…. किसी सेठ के करोड़ों रूपए मिट्टी हो गए…. उस से तुमको क्या मिला?”

उनमें से एक ने बड़ा सही जवाब दिया – “बाऊ जी, लोग अपने दुःख से उतने दुखी नहीं जितने सामने वाले के सुख से दुखी हैं….”

उसने कहा, “साले सेठियों और भ्रष्ट अफसरों के करोड़ों रूपए मोदी ने मिट्टी कर दिए हम तो इसी में खुश हैं. हमको क्या मिलेगा ये तो वक़्त बताएगा, पर इतना तय है कि देश का भला होगा.”

रॉबिन हुड और सुल्ताना डाकू जैसे चरित्र हमेशा समाज में बहुत लोकप्रिय रहे. उनकी लोक गाथा में उनका यही चरित्र उभर के आया कि वो अत्याचारी सामंतों सेठों अमीरों को लूटते और गरीबों की मदद करते थे.

अमीर होना एक taboo, एक वर्जित कार्य हो गया. जो अमीर को लूटे वो गरीबों का मसीहा…. ये सोच रही है लोकमानस की सदियों से…. मोदी जी की नोटबंदी इसी लिये गरीब गुरबा को पसंद आ रही है.

गरीब आदमी की ये खासियत है कि उसकी याददाश्त बड़ी कमज़ोर होती है. महीने दो महीने में सब कष्ट भूल जाएगा. अपना दुःख भूल जाएगा.

30 दिसम्बर के बाद उसे सिर्फ ये याद रहेगा कि सेठ जी की काली कमाई बर्बाद हो गयी.

इसीलिये मैं कहता हूँ कि मोदी जी की ये नोट बंदी लोकलुभावन कदम है…. populist है….

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