श्री एम : म्हाने चाकर राखो जी….

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Sri M

जिसने संसार का यह व्यर्थ क्षण भंगुर का प्रलोभन देख लिया, वही व्यक्ति परमात्मा की तलाश में निकलता है. जो संसार से जागने लगा, जिसे यह दिखाई पड़ने लगा कि स्वप्नवत है सब यहाँ, वही सत्य की खोज में निकलता है. वही कह सकता है प्रभु से : “म्हाने चाकर राखोजी, म्हाने चाकर राखोजी”…

इस संसार में मालिक होकर भी कोई मालिक नहीं हो पाता. और परमात्मा के चरणों में दास होकर भी मालिक हो जाता है. इस संसार में सिकंदर भी कहाँ मालिक हो पाते हैं. और उस संसार में मीरा भी मालिक हो जाती है. और मीरा मांगती नहीं मालकियत… और मालिक हो जाती है.

मीरा मांगती तो इतना ही है.. “म्हाने चाकर राखोजी…. मुझे नौकरी पर रख लो. मुझे छोटा-मोटा काम दे दो. ऐसे ही बुहारी लगाती रहूँगी या पैर दबा दूंगी…

म्हाने चाकर राखोजी,
चाकर रहसूं बाग़ लगासूं ….
तुम्हारे बगीचे में काम कर दूंगी… तुम्हारे पौधों को पानी सींच दूंगी…
… नित उठ दरसन पासूं….

बस इतना बहुत है. तुम्हारे बगीचे में झाडू-बुहारी देती रहूँगी, सूखे पत्तों को बीनती रहूँगी, तुम्हारे पौधों को पानी देती रहूँगी, तुम्हारे लिए फूल चुनती रहूँगी, तुम्हारे लिए गजरा बनाती रहूँगी…

और मेरे लिए इतना ही सौभाग्य काफी होगा कि नित उठ दरसन पासूं…. बगीचे से तुम्हारी झलक मिलती रहेगी, तुम्हें देखती रहूँगी.

ब्रिन्दाबन की कुञ्ज गलिन में तेरी लीला गासूं.
इतना पर्याप्त है मुझे कि भर आँख तुम्हें देखती रहूँ. बस इतना बहुत है. सब मिल गया.

इससे ज्यादा नहीं चाहिए भक्त को. भक्त की मांग बड़ी छोटी है, लेकिन भक्त विराट को पा लेता है.

समझना इस राज को : जितनी बड़ी मांग, उतनी छोटी उपलब्धि. जितनी छोटी मांग, उतनी बड़ी उपलब्धि. समझना इस राज को… मांग…. कि उपलब्धि नहीं, और मांग बिलकुल न हो तो सब मिल जाता है. परमात्मा उन्हें मिलता है जिनकी कोई मांग नहीं..

अब यह भी कोई मांग है : म्हानें चाकर राखोजी!
मुझे नौकर रख लो. कुछ काम दे देना, चलो बगीचा सही.

“चाकर रहसूं बाग़ लगासूं,  नित उठ दरसन पासूं
ब्रिन्दाबन की कुञ्ज गलिन में, तेरी लीला गासूं”

तुम्हारा दर्शन होता रहेगा, बस काफी है. मेरे गीत जग जाएंगे. तुम्हारा दर्शन होता रहेगा, मेरे पैरों में घूँघर बंध जाएंगे. तुम्हारा दर्शन होता रहेगा, मेरे प्राण रस में डूब जाएंगे. फिर कुछ और करने को नहीं है. गाऊंगी तुम्हारी लीला….. “तेरी लीला गासूं”…

फिर कुछ और बचा नहीं पाने को. फिर आनंदमग्न हो नाचूंगी. जिन्हें तेरी खबर नहीं है, उनको तेरी खबर पहुंचा दूंगी. जो सोये हैं, उन्हें जगा दूंगी. जिनके कान में तेरी भनक भी नहीं पड़ी है, उनके कानों में तेरी भनक पहुंचा दूंगी. बाँटूँगी तुझे.

ख़याल करना : मांगती कुछ भी नहीं है. मांगती इतना ही है कि चाकरी पर रख लो.

“चाकरी में दरसन पाऊँ”- और फिर कहती है, ऐसा भी मत सोचना कि चाकरी में कोई बड़ी बात तुमसे मांगूंगी, कि नौकरी क्या होगी, कितना वेतन मिलेगा.

“चाकरी में दरसन पाऊँ”- वेतन इतना ही बहुत है कि तुम्हारा दर्शन मिलेगा. “सुमिरन पाऊँ खरची”- और इतना खर्च मिल जाए कि तुम्हारी याद बनी रहे. तुम्हारा दर्शन मेरा वेतन हो गया.

तुम्हारी याद बनी रहेगी, तुम बार-बार दिखाई पड़ते रहोगे, तो वह मेरा मन हरामी है, मुझे भटका  न पाएगा. तुम फिर-फिर दिखाई पड़ जाओगे, फिर-फिर तुम्हारी याद सघन हो जाएगी, फिर-फिर तुम मुझे खींच लोगे.

“चाकरी में दरसन पाऊँ सुमिरण पाऊँ खरची”. तुम्हारा स्मरण बना रहा तो और क्या चाहिए खर्च के लिए. इतना बहुत है. इतना जीवन के लिए पर्याप्त है. बस मुझे पास बुला लो. मुझे चाकरी दे दो.

“भाव भागती जागीरी पाऊँ”…. और कोई जागीरी नहीं मांगती हूँ, इतना ही – भक्ति की जागीरी मिल जाए, भाव की जागीरी मिल जाए. मस्तिष्क से तो तुम्हें पुकारती हूँ, ह्रदय से तुम्हें पुकार सकूं.

तुम मेरे भाव में उतर जाओ. तुम मेरी श्वास-श्वास में समा जाओ. तुम्हें भूलूँ ही न. जागूं कि सोऊँ, उठूं कि बैठूं, तुम्हारी याद सतत ही बनी रहे. अक्षुण्ण…. धारा खंडित न हो. अखंड.  

– ओशो (झुक आयी बदरिया सावन की से)

बस यही तो कहना चाह रही थी उस रात जब लगा था मीरा के ह्रदय की पीड़ा मुझमें उतर आई है और जार जार आंसुओं के साथ और कुछ नहीं बस एक ही बात मुंह से निकली थी श्री एम के पैर की सबसे छोटी ऊंगली के नाखून को छूने को मिल जाए बस इतनी पात्रता चाहिए…

पिछले वर्ष नवम्बर में उनके जबलपुर आगमन पर उन्होंने अगले दिन मुझसे मिलने का सौभाग्य नहीं मिल सका था… सिर्फ इसलिए कि मैं एक स्त्री हूँ…

क्या मेरी जगह एक पुरुष शिष्य होता तब भी वो मना कर देते… क्या एक स्त्री की आध्यात्मिक यात्रा पुरुष से अलग होती है… क्योंकि उसका प्रेम, उसका समर्पण उसका भाव पुरुष मन से अलग होता है…..

स्वामी ध्यान विनय ने समझाते हुए कहा था… आपका रोना शुभ है… आपकी ये कसक.. ये प्रेम..  ये तड़प… आपकी कामना शुभ है… हर बात का समय तय है….

उस रात के बाद से कई दिनों तक रह रह कर एक हवा का झोंका आता और साँसों में चमेली की खुशबू घोल जाता… मैं चारों ओर उस खुशबू को फैलाने वाले को खोजती रहती… जानती हूँ ये शुभ संकेत है….. लेकिन मन नहीं मानता… लगता है स्त्री होना मेरी राह की अड़चन है…

किसी जन्म में श्री एम स्वयं भी तो स्त्री रहे हैं… उनकी पुस्तक में उस विज़न का ज़िक्र है जब वृन्दावन का वो दृश्य जीवंत हो जाता है….  जब वो श्रृंगार कर अपना चेहरा दर्पण में निहारते हुए कृष्ण की प्रतीक्षा करते हैं और जैसे ही मुड़कर देखते हैं कृष्ण को सामने पाकर बेहोश हो जाते हैं….

स्त्री की देह में रहे हो तो कृष्ण के लिए तड़प को पहचानते ही होंगे न….
मैं कुछ नहीं मांगती…. म्हाने चाकर राखो जी….

– जीवन

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