सिनेमा हॉल में ही राष्ट्र गान क्यों?

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जहां भी लोग इकट्ठे हो वहीं करवा दीजिए. आपको आदेश ही तो देना है.. चला दीजिए कि कल से सभी शासकीय संस्थानों में कार्यालयीन दिन की शुरुआत और समापन राष्ट्रगान से होगा.

इसमें जनता का समय नष्ट न हो इसके लिए कर्मचारियों को समय से पूर्व बुलाइए और समय के बाद छोडिए.

चूंकि सिनेमा हॉल में हर शो के पहले राष्ट्रगान होगा तो मान के चलना चाहिए, जिला एवं सत्र न्यायालय से लेकर उच्चतम न्यायालय में हर मामले की हर पेशी से पहले गायन हो ही रहा होगा.

संसद का भी हर दिन राष्ट्रगान से ही शुरू होता होगा. संसद से याद आया कि पता नहीं कोई क़ानून है भी या नहीं, इस सिनेमा हॉल में राष्ट्रगान का?

है तो बढ़िया… इसे बाक़ी जगह भी लागू करवाइए… और अगर ऐसा क़ानून नहीं है तो क्या मान लिया जाए कि क़ानून की सिर्फ समीक्षा का हक रखने वालों को क़ानून बनाने का भी हक मिल गया है.

भारत के प्रधानमंत्री और मुझमें कई समानताओं के अलावा एक ख़ास समानता और है – करोड़ों अन्य देशवासियों की तरह हम दोनों आज़ाद भारत में पैदा हुए.

पर सुना-पढ़ा है कि सिनेमा के शौकीन हमारे गुलाम पूर्वजों को ‘God save the king’ की धुन बजते समय खड़ा होना पड़ता था. पर अब तो हम आज़ाद हैं… हैं न?

ऐसे ही जबरन राष्ट्रगान का सम्मान करवाना हो तो एक काम करिए. गाड़ियां -एक या अधिक- अधिकाँश भारतीयों के पास हैं, बस ये फरमान और जारी कर दीजिए कि पेट्रोल-डीज़ल बाद में मिलेगा पहले ‘जन गण मन’ गाकर सुनाना पड़ेगा.

यकीन मानिए जनाब, ऐसा करके आप कहीं ज़्यादा लोगों से सम्मान करा सकेंगे, क्योंकि मुझ जैसे कई होंगे जो सिनेमा देखते ही नहीं, पर पेट्रोल ज़रूर भरवाते हैं.

हाँ, आप करते हैं सम्मान या आपको राष्ट्रगान आता है या नहीं, ये हम यानी ‘We, The People’ कभी नहीं जान सकेंगे क्योंकि आपकी य्य्य्ये लंबी से सफ़ेद गाड़ी में शासकीय खर्चे वाला पेट्रोल भरवाने आपका ड्राईवर ही जाता है, आप नहीं.

और हाँ, कुछ कर सकने की इच्छा और माद्दा हो तो उच्चारण सुधरवा दीजिए. बड़ा खटकता है जब छोटे बच्चों से लेकर आपकी उम्र तक के लोग गाते हैं – ‘पंजाब सिंध गुजरात मराठा द्राविड़ उत्कल बंगा… विन्ध्य हिमाचल यमुना गंगा उच्छल जलधि तरंगा.’

छोटे बच्चों में मेरे बेटों को और आपकी उम्र तक के लोगों में खुद को न शुमार कर लीजिएगा, मुझे पता है कि आपको पता है कि सही उच्चारण ‘बंग’ और ‘तरंग’ है. गुनगुना कर देख लीजिए, ऐसा कुछ कठिन भी नहीं धुन बरकरार रखते हुए सही उच्चारण.

अंत में भारतीय मतदाता होने के नाते साधिकार एक सलाह देता हूँ, वो आपके बड़े वाले ठाकुर हैं न… वो हमारे परधान के सामने रो-रो के दिखाते हैं कि काम बहुत है और आदमी कम… बहुत नाइंसाफी है… तो निवेदन रूपी सलाह ये कि ऐसे मामलों को छोड़ कुछ काम कर लिया जाए.

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