सामरिक दृष्टि से अंतर्राष्ट्रीय संगठनों की उपयोगिता

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PM Modi with saarc countries heads
file photo : PM Modi with saarc countries heads

गत वर्ष प्रधानमंत्री जी ने आसियान (ASEAN) सम्मेलन में सभी देशों से एकमत हो कर ISIS और आतंकवाद से लड़ने का आह्वान किया था.

ठीक बात. बहुत अच्छे. तो क्या इसका मतलब ये है कि आप कहेंगे और सब मान जायेंगे?

पहली बात तो ये कि आसियान, SAARC जैसे अंतर्राष्ट्रीय संगठन क्या हैं… क्यों हैं?

मैं संक्षेप में बता दूं कि ये दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों के संगठन हैं जिनका मुख्य उद्देश्य एक दूसरे के साथ व्यापार करना है. साथ में इन देशों में आपस में सांस्कृतिक, वैज्ञानिक मेलजोल वगैरह की बात कही जाती है.

नरसिंह राव के जमाने में Look East policy के तहत हमने पूर्वी एशिया के देशों की तरफ ध्यान देना शुरू किया प्रमुख रूप से चीन के बढ़ते प्रभाव को कम करने के लिये.

इनके संगठनों के सचिवालय हैं, गाइडलाइन्स हैं, जब मिलते हैं तब declaration sign होता है, फलाना ढेमका आपको विकिपीडिया पे मिल जायेगा या किसी international relation की किताब में देख लीजिये.

मुद्दे की बात करते हैं. क्या भारत के कहने से दक्षिण-पूर्व एशिया के देश अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद से लड़ने के लिए साथ देंगे?

इस सन्दर्भ में एक ज़मीनी हकीक़त जानना जरुरी है कि भारत सहित इन देशों की आर्थिक प्रगति उल्लेखनीय कही जा सकती है लेकिन आपस में सामरिक सहयोग के परिप्रेक्ष्य में हालत दयनीय है.

अब इसका मतलब ये नहीं कि भारतीय सेना बेकार है या चीन कमजोर है. इसका मतलब ये है कि दक्षिण पूर्व एशिया के देश आपस में एक हो कर किसी बड़े खतरे से लड़ने को तैयार नहीं हैं.

ये चीज़ आपको पश्चिमी देशों में नहीं दिखाई पड़ेगी. छोटे-मोटे मतभेद जरुर हैं लेकिन उदाहरण के लिए NATO दुनिया का सबसे ताक़तवर सामरिक संगठन है जिसमें यूरोपीय देश और अमरीका शामिल है.

हम एशिया में ऐसा नहीं कर पाए. जब युद्ध लड़ा जाता है तो जल, थल, नभ के अलावा कई मोर्चों पर लड़ा जाता है.

बहुत सारे विचारक एक साथ बैठ कर नीतियाँ बनाते हैं. ऐसे संगठन ‘थिंक टैंक’ कहलाते हैं. ये आर्थिक सुरक्षा, सैन्य अभ्यास, सहित कई मुद्दों पर शोध करते हैं और अपनी राय रखते हैं.

हमारे देश में भी हैं लेकिन दूसरे देशों के साथ मिलकर हमने ऐसा कोई थिंक टैंक या सहयोग नहीं किया है.

हालाँकि जब प्रधानमंत्री मई 2015 में चीन गए थे तो उन्होंने एक द्विपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर किये थे जिसमे लिखा है कि भारत-चीन मिल कर एक थिंक टैंक स्थापित करेंगे.

लेकिन पाकिस्तान के साथ चीन ने पहले से ही RANDI नाम का थिंक टैंक बना रखा है तो भारत के प्रति चीनी कितनी मिठास दिखायेंगे ये समझ में आ जाना चाहिये.

आखिर थिंक टैंक की इतनी जरुरत क्या है? क्या सिर्फ सोचने विचारने के लिए 4 कमरे?

गौरतलब है कि दिल्ली में SAARC देशों के सहयोग से एक SAARC University खोली गई है जिसमे अंतर्राष्ट्रीय विषय JNU के अध्यापक पढ़ाते हैं और कंप्यूटर साइंस विभाग में केवल 4-5 प्रोफेसर हैं.

क्या हमें ऐसे बेकार के संस्थान की जरुरत है? जी नहीं. यदि अंतर्राष्ट्रीय सहयोग से आपको प्रबुद्ध रणनीतिज्ञ चाहिये तो ऐसा संगठन बनाइए जिसमें आधुनिक विज्ञान और तकनीक, सामरिक संस्कृति (Strategic Culture), अंतर्राष्ट्रीय विषय जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर शोध हो और साथ में जरुरत पड़ने पर सामरिक सहयोग के तहत सेनाओं को एकमत से तैनात भी किया जा सके.

ये संभव है. मैं आपको एक और उदाहरण देता हूँ. मेरे पास एक किताब है जो कि Einstein के सापेक्षता के सिद्धांत (Relativity) पर एक मोनोग्राफ है. मोनोग्राफ में मौलिक शोध प्रकाशित होते हैं.

ये किताब NATO के Advanced Study Institute द्वारा प्रकाशित है. यानि यूरोप और अमरीका उच्चतम विज्ञान और तकनीकीकरण तथा सामरिक साझेदारी को आधार बना कर अंतर्देशीय गुट बनाते हैं और हम एक दूसरे के देश में रामायण का मंचन कर के और अंगकोरवाट के मंदिर देख कर खुश हो जाते हैं.

जब प्रधानमंत्री 2015 में चीन दौरे से वापस आये थे तब मैंने लिखा था –

Towards a ‘directional’ foreign policy:

Though much has been written criticizing PM Modi’s one year performance as ‘direction less’ the foreign policy initiatives taken by him ‘if’ driven by escalating parameters in the coming 4 years could boast economy, trade and could turn a positive strategic status for India in Asia.

In 2014 prior to Lok Sabha elections Prof Harsh V Pant remarked that India doesn’t really possess a targeted ‘foreign policy’. By that he meant that India never felt a reason to develop relations with nations depending upon their exhaustible dispositions.

When Narendra Modi invited SAARC leaders to his swearing-in ceremony Prof Brahma Chellaney tweeted that Modi is following the trend of foreign relations from ‘bottom to top’ (i.e. to give importance to neighbours first) contrary to previous governments who were obsessed with the objective to lure major powers as their priority.

11 years ago in 2004 Baldev Raj Nayar and TV Paul wrote in a paper that “Strategy and Diplomacy are areas where India’s soft-power potential lies but has not been fully utilized by India’s governing elite. A crucial concept here is that of a grand strategy, which refers to the collection of military, economic and political means and ends with which a state attempts to achieve security.”

This idea of ‘grand strategy’ is derived from Barry R Posen (US foreign policy expert).

If we look back in 2001, the post 9/11 scenario left no serious alignments other than a polarised Asia with biased interests attached to US. That time world saw emergence of a new force that could turn a super power down.

After a decade of paralysis in initiatives if PM Modi justifies his statement which is by far more viable then it is a sign of his mature mindset. As he said in China that this is the right time to enhance our relations worldwide to bear fruits in coming 4 years.

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