भारत को सोने की चिड़िया नहीं, खूंखार बब्बर शेर बनाइये

नहीं भाई नहीं, सोने की चिड़िया नहीं, भारत को सोने की चिड़िया तो विदेशी आक्रान्ता कहते थे. क्योंकि उन दिनों के शासक अहिंसा का सही अर्थ ही नहीं समझ पाये.

और सेना को माली, बागवानी, कृषि इत्यादि के कार्य मे लगा दिया, परिणाम स्वरूप मेरा भारत जो महान था, विदेशी संस्कृतियों का गुलाम हो गया.

आज भी यदि आपकी सेना से रक्षा का कार्य न करवाकर अन्य कार्यों पर लगा दिया जावे, तो क्या होगा, आप बुद्धिमान हैं  समझ सकते हैं.

अतः आप भारत महान को सोने की चिड़िया नहीं, खूंखार बब्बर शेर बनाइये, जीता जागता, सोने का नहीं.

हाँ सम्पन्न बनाइये, समृद्ध बनाइये, शक्ति शाली बनाइये, पर सोने की चिड़िया मत बनाइये. हमें मेकाले की शिक्षा मत पढ़ाइए, क्यों शेर को चिड़िया बना रहे हो भाई.

हमें फिर बिल्ली रूपी विदेशी संस्कृति गुलाम बना देगी, अब तो जुल्म मत करो भैया. हमें हमारे वास्तविक स्वरूप में ही जीने दो …….. जीते जागते शेरे बब्बर को शेरे बब्बर ही रहने दो.

– Pandit Rakesh Sharma

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