वकील क़ानून जानता है, अच्छा वकील जज को जानता है!

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घरों में सुबह-सुबह एक बहुत आम सी चीज़ आपने भी देखी होगी.

महिलाएं सफाई करते-करते फोन पर अपनी बिटिया / बहू से, या माँ / सास से बात कर रही होती हैं.

इस से काम में कोई दिक्कत नहीं आती. कोई चीज़ सफाई में छूटेगी नहीं, कोई बात फोन पर मिस हो जाए ऐसा भी नहीं होगा. दोनों काम एक साथ बिलकुल बराबर होते हैं.

कई बार किचेन में काम करते करते पड़ोसन से खिड़की के रास्ते कोई रेसिपी या कोई गॉसिप भी चल रही होगी, लेकिन उस चर्चा से खाने में नमक डालना भूल जाएँ, या मसाले के चक्कर में बातें ना सुनी जाएँ, वो भी नहीं होता!

ऐसा मगर आप पुरुषों के साथ होता नहीं देखेंगे. नोट गिनते समय जरा सा टोक दीजिये या टीवी का वॉल्यूम बढ़ा दीजिये. पूरा बंडल फिर से गिनना पड़ जायेगा उन्हें.

बदकिस्मती से ये हरकत अगर नयी बीवी ने ना की हो तो जोरदार डांट भी पक्की समझिये.

कभी किसी जगह शादी-वादी में, किसी समारोह में अगर पुरुष कार ड्राइव करते जा रहे हों और सही, छोटा वाला रास्ता चुनने की कोशिश कर रहे हों उस वक्त टोकिये जरा.

उनके पूरे कंसंट्रेशन का सत्यानाश हो जाएगा, पूरा रास्ता उन्हें फिर से याद करना होगा. पुरुष ड्राइव करते वक्त भी कम बात करते हैं.

पुरुषों और महिलाओं में ये जो मल्टी-टास्किंग का फर्क नजर आता है, ये व्यक्तिगत तौर पर ही नहीं सामाजिक तौर पर भी देखा जा सकता है.

जब आप पुरुष प्रधान समाज देखेंगे तो वहां फोर कोर्स मील, सिक्स कोर्स मील जैसी चीज़ होगी. खाना पूरा एक बार में नहीं आएगा.

पहले फर्स्ट कोर्स आएगा, उसमें स्टार्टर और सूप जैसी चीज़ें होंगी. बीच में किसी सेकंड थर्ड कोर्स में चावल, चिकन जैसी भारी चीज़ें और अंतिम कोर्स में डेज़र्ट, यानि मीठा आएगा.

इसके विपरीत जहाँ स्त्रियों को भी अधिकार दिए जाते हों, जैसे पुराने भारतीय समाज में, वहां आपको एक ही बार में सारी चीजें परोसी जाएँगी.

थाली में रोटी भी होगी, चावल भी, सब्जियां भी, मच्छी भी, दही भी, कहीं रायता होगा, कहीं मिठाई भी होगी.

लोग एक साथ सारी चीज़ों पर ध्यान दे सकते हैं, वो सबको साथ देखकर कंफ्यूज नहीं होते.

अगर इसी चीज़ को ताजा दौर में देखना हो तो सर्वोच्च न्यायलय का राष्ट्रगान सम्बन्धी फैसला देखिये.

अब कुछ लोग जो हैं उन्हें अचानक लगने लगा है कि भला मनोरंजन का देशभक्ति से क्या लेना देना है? इसे पुरुषवाद को एक साथ दो काम में होने वाली दिक्कत कह सकते हैं.

हर बार फिल्म शुरू होने पर खड़े होने से अगली पीढ़ी को अपने आप राष्ट्रगान को सम्मान देने की आदत पड़ेगी.

कुछ वैसे ही जैसे झुककर पांव छूने की आदत होती है, या जुम्मे के जुम्मे नहा के मस्जिद जाने की आदत पड़ती है.

मगर अगर इसे सिर्फ मुक़दमे के लिहाज से देखिये तो पी.आई.एल. के शुरुआती दौर में करीब तेरह साल पहले, श्याम नारायण चौकसी ने एक मुकदमा जीता था.

तेरह साल पहले चौकसी साहब ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायलय में ‘कभी ख़ुशी कभी गम’ के निर्माताओं पर पी.आई.एल. दाखिल कर के कहा था कि इस फिल्म में राष्ट्रगान का व्यावसायिक इस्तेमाल हो रहा है.

मध्य प्रदेश उच्च न्यायलय की पीठ ने जस्टिस दीपक मिश्र की अध्यक्षता में फैसला दिया था कि ये गलत है और फिल्म से राष्ट्रगान हटाया जाए.

तेरह साल बाद उच्चतम न्यायलय में मुकदमा करने वाले बिलकुल वही श्याम नारायण चौकसी हैं, और इस बार जिन्होंने फैसला दिया है वो भी बिलकुल वही जस्टिस दीपक मिश्रा हैं.

न्यायलय की कहावत होती है कि वकील वो होता है जो कानून को जानता है, और अच्छा वकील वो होता है जो जज को जानता है.

बाकी राष्ट्रगान के सम्बन्ध में जस्टिस मिश्रा की इस चौकसी के बारे में हम कुछ नहीं कह रहे. हम चुप रहेंगे!

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