ये कैसा इतिहास जो नहीं बताता मणिराम दीवान के बारे में!

29 अगस्त 1857 को असम के जोरहाट पर हमले की योजना बनी. राजा कंदर्पेश्वर सिंघा को असम का राजा घोषित किया जा चुका था और अहोम राज्य की स्थापना की घोषणा की जा चुकी थी. इसके बाद वही हुआ जो भारत के इतिहास का अटूट किस्सा है. किसी गद्दार ने मुखबिरी कर दी और सारी योजना ध्वस्त हो गयी.

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Maniram Dewan, फोटो सौजन्य : डॉ सुनील दीपक http://jonakehsake.blogspot.in/

मणिराम दत्ता बरुआ उर्फ़ मणिराम दीवान असम के थे और उनको चाय तथा चाय बागानों की सम्पूर्ण जानकारी थी.

मणिराम दीवान (17 अप्रेल 1806, चारिन्ग, पिता- श्री राम दत्ता) को उत्तर पूर्व के भारत के स्तंत्रता संग्राम के प्रथम शहीद सैनानी के नाम से जाना जाता है.

जब भारत में अंग्रेजों का राज आया तब वो East India Company में काम करते थे और कंपनी को असम के चाय बागानों के बारे में बताया.

1826 में कंपनी ने असम के चाय बागानों को कब्जे में लेकर अपने तरीके से काम करना चालू किया, 1828 में मणिराम दीवान उनसे जुड़े.

असम के चाय बागों से चाय उपज होने से चीन में उपजने वाली चाय का एकाधिकार ख़त्म हो गया.

मणिराम दीवान कंपनी में काम करते थे लेकिन उनकी वफादारी अहोम राजा पुरंदर सिंघा के पुत्र कमलेश्वर सिंघा और पौत्र कन्दर्पेश्वर सिंघा के साथ थी और वो उनको ही अपना राजा मानते थे.

कंपनी में काम करते हुए मणिराम दीवान ब्रिटिश राज और कंपनी के द्वारा किए जा रहे जुल्मों के खिलाफ हो गए और उन्होंने कंपनी से 1838 में इस्तीफ़ा दे दिया.

उनको पता था कि ब्रिटिश हुकूमत की ताकत ये कंपनी है इसलिए उन्होंने कम्पनी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया.

पहले उन्होंने कंपनी बनाई जो सीधे East India Company के खिलाफ बिज़नस हाउस बन गई.

उन्होंने खुद की चाय, हस्तकरघा उद्योग, नाव बनाने का, ईंट बनाने का, धातु बनाने का, वस्त्र रंगाई, हाथी दांत के सामान, ceramic के सामान, भवन निर्माण, पुल निर्माण, कृषि उद्योग की कई कंपनी खोल डाली.

उन्होंने वो सब काम चालू किया जो East India Company करती थी. उन्होंने कामरूप में गरोहाट, शिवसागर में नागहाट, डिब्रूगढ़ में बोरहाट, धेमाजी में सीस्सीहाट, दरांग में दरंगीया हाट जैसे बाज़ारों की नींव डाल दी.

उनकी कंपनी की सफलता अंग्रेजों को नहीं भाई और उन्होंने उनके हर व्यवसाय को गैर कानूनी घोषित कर दिया.

1850 में उनकी कंपनी को बैन करने का फरमान सुना दिया. 1851 में सारी कम्पनी बंद करा दी गयी जिससे कंपनी के सारे लोग बेरोजगार हो गए.

वो सब मणिराम दीवान के साथ अंग्रेजों से लड़ने को तैयार थे. अंगेरजी हुकूमत की चुनौती लेकर मणिराम दीवान ने मान लिया कि अंग्रेजी हुकूमत को ख़त्म करने के लिए असम में अहोम राज्य की स्थापना जरूरी है.

वो कलकत्ता गए और उन्होंने निर्वासित अहोम राजा कन्दर्पेश्वर सिंघा से मुलाकात किया और राजा की अगुवाई में अंग्रेजों से लड़ने के लिए मोर्चा खोल दिया.

कलकत्ता में उन्होंने क्रांतिकारी पियोली बरुआ को अहोम राजा का सेनापति घोषित किया.

उन्होंने अंग्रेजों के असम में चल रहे अफीम के खेती को बर्बाद करा दिया. उन्होंने कामाख्या मंदिर में अंग्रजों द्वारा बंद करा दी गई पूजा को शुरू करा दिया.

उधर देश के अन्य हिस्सों में भी अंग्रेजों के खिलाफ आग जोर पकड़ रही थी. अहोम राजा कंदर्पेश्वर सिंघा को बहुत सारे असम के क्रांतिकारियों का समर्थन प्राप्त था.

पियोली बरुआ जैसे तेज़ तर्रार क्रांतिकारी के नेतृत्व में अहोम सेना तैयार हो रही थी. 10 मई 1857 को जब वो क्रान्ति सुलगी तो अहोम राजा कंदर्पेश्वर सिंघा के नेतृत्व और पियोली बरुआ के अगुवाई में असम में भी विद्रोह हो गया.

प्रमुख विद्रोही लड़ाके थे उरबीधार बरुआ, मायाराम बरुआ, चित्रसेन बारबोरा, कमला बरुआ, महीधर सरमा मुख्तयार, लुकी सेचोवा बरुआ, उग्रसेन मरंगीखोवा गोहैन, देवराम ढिंगीया, दुतिराम बरुआ, बहादुर गांवबुरहा, शेख फरमूद अली, मधुराम कोच आदि.

29 अगस्त 1857 को असम के जोरहाट पर हमला करके कब्जे की योजना बनी. राजा कंदर्पेश्वर सिंघा को असम का राजा घोषित किया जा चुका था और अहोम राज्य की स्थापन की घोषणा की जा चुकी थी.

राजा कंदर्पेश्वर सिंघा ने घोषित कर दिया कि हर सैनिक को ब्रिटिश राज से दुगुनी तनख्वाह मिलगी और अंग्रेजों को हराने के बाद अहोम राज में फिर से सबको दुगुनी तनख्वाह दी जाएगी.

इसके बाद वही हुआ जो भारत के इतिहास का अटूट किस्सा है. किसी गद्दार ने मुखबिरी कर दी और सारी योजना ध्वस्त हो गयी.

राजा कंदर्पेश्वर सिंघा, मणिराम दीवान और पियोली बरुआ को अंग्रेजी सेना ने गिरफ्तार कर लिया.

मणिराम दीवान को मुख्य साज़िशकर्ता करार दिया गया, पियोली बरुआ को अंग्रेज़ सेना का हत्यारा और राजा कंदर्पेश्वर सिंघा को अंग्रेजी शासन का विद्रोही घोषित किया गया.

26 फरवरी 1858 को मणिराम दीवान और पियोली बरुआ को जोरहट जेल प्रांगण में जनता के बीच फांसी दी गयी.

राजा कंदर्पेश्वर सिंघा को किसी अज्ञात स्थान पर भेज गया. उनके साथ अंग्रेजों ने क्या किया ये आज भी रहस्य है.

मणिराम दीवान के चाय बागानों को अंग्रेजी हुकूमत ने कब्जे में ले कर नीलाम कर दिया जिसको Goerge Williamson ने खरीदा.

आज़ाद भारत में सिर्फ दो जगह पर मणिराम दीवान की स्मृति जिन्दा है. गौहाटी में स्थित व्यापर मंडल का नाम Maniram Dewan Trade Centre of Guwahati और डिब्रूगढ़ विश्वविद्यालय के बालक छात्रावास का नाम Maniram Dewan Boys Hostel है.

इतिहास ने पन्नों से क्रांतिकारी पियोली बरुआ और राजा कंदर्पेश्वर सिंघा पूरी तरह गायब हैं.

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