खालिस्तानी आतंकवाद को सिख आतंकवाद कहने का पाप

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Sikh : Protectors Of Hindu

पंजाब के नाभा जेल से खालिस्तानी आतंकियों के फरार होने की खबर के बाद फिर से देश में खालिस्तान आन्दोलन चर्चा में है. आज एक मित्र ने मुझे इनबॉक्स कर कहा कि आप सिख आतंकवाद को क्या कहतें हैं और उस पर भी कभी कुछ लिखिए.

मुझे लगता है कि यह प्रश्न और भी कई लोगों के मन में होगा इसलिये इसका विस्तृत और सार्वजनिक जवाब देना ज्यादा समयानूकूल है. सिख समाज और पंजाब के ऊपर लिखे लेख मैं बहुत बार ये स्पष्ट कर चुका हूँ कि सारे भारतीयों को क्यों सिख समाज और सिखों का कृतज्ञ होना चाहिये, आज फिर से उन्हीं बातों का बस सार-संक्षेपण करूँगा क्योंकि जो प्रश्न उठाये गयें हैं उसका जवाब और है.

ये बात किसे पता नहीं है भारत पर हुए विदेशी आक्रमणों को सबसे पहले हमारा पंजाब और हमारे सिख भाई झेलते थे और अपना बलिदान देकर उन्होंने हमेशा भारत भूमि की रक्षा की है.

भारत के स्वाधीनता संग्राम में एक से बढ़कर एक बलिदान देने वाले हमारे सिख वीर थे. आबादी में कम होते हुए भी प्रतिशत के हिसाब से आज भी भारत की सेना में सबसे अधिक हमारे सिख भाई हैं और तो और भारत माता के लिये बलिदान होने वाले सिखों की सूची अंतहीन है.

पंजाब के तो कई गाँव ऐसे हैं जहाँ लगभग पूरा गाँव ऐसा है जिसके घर से एक न एक आदमी फौज में हैं. कई सिख परिवारों में तो फौज में जाकर भारत माँ की सेवा करने की परंपरा पुश्तैनी है यानि परदादा, दादा, पिताजी, बेटा, पोता सब के सब फौज में रहे हैं.

ये समाज कभी देश के सामने भिखारी रूप में नहीं आता, चाहे कृषि हो, व्यवसाय हो, सेना हो, खेल, कला-संस्कृति हो या फिर सेवा क्षेत्र इस समाज ने देश की सेवा हर क्षेत्र में की है और सरकार को टैक्स देने वालों में भी ये देश में अव्वल समुदाय हैं.

खैर यह सब गिनाकर मैं निःस्वार्थ भाव से ये सब करने वाले सिख समाज के अहसानों को कम नहीं करना चाहता. यहाँ प्रश्न है कि कुछ चंद लोगों की आतंकी गतिविधियों के लिये क्या पूरे सिख समाज को हम आतंकवादी कह सकतें हैं या खालिस्तानी आतंकवाद को सिख आतंकवाद कह सकतें हैं?

जब मैं खालिस्तानी आतंकवाद को सिख आतंकवाद कहने जाता हूँ तो मेरी आँखों के सामने गुरु अर्जुन देव जी का बलिदान का घुमने लगता है जिनकी अत्यंत बर्बर यातना देकर जहाँगीर ने हत्या करवा दी थी. मैं जब सिख आतंकवाद बोलने की सोचता हूँ तो मेरे कानों में कहीं से ये शब्द गूंजने लगतें हैं कि एहसानफरामोश, तू गुरु तेगबहादुर जी और उनके शिष्यों की निर्मम हत्या भूल गया जो कश्मीरी हिन्दुओं को बचाने के लिये बलिदान हुए थे.

कोई आकर मेरे कानों में मुझे ये भी कहने लगता है कि नालायक, तू गुरु गोविन्द सिंह जी महाराज के दो मासूम पुत्रों को भूल गया जिन्हें दीवार में जिन्दा चुनवा दिया गया था.

खालिस्तानी आतंकवाद को सिख आतंकवाद कहकर मैं केवल सिख समाज को ही नहीं बल्कि पूरे हिन्दू समाज को आतंकवादी कहूँगा क्योंकि ‘रहतनामे’ में कहा गया है,
तीन प्रकार मम सिख है,
सहजी, चरणी, खंड.

यानि, “जो सहजधारी हैं वो भी सिख हैं, जो चरणों की सेवा करतें हैं वो भी सिख हैं और जो खंडा धारण कर समाज की रक्षा करतें हैं वो भी सिख हैं.” यानि सारा हिन्दू समाज सिख है और सारा सिख समाज हिन्दू है.

सन 1715 से 1765 तक जब नादिरशाह दुर्रानी और अहमदशाह अब्दाली के आक्रमणों का सामना करते हुए करीब ढाई लाख केशधारी सिख मारे गये थे तब हर हिन्दू परिवार ने अपने बड़े बेटे को अमृत छखाया था. सिख आतंकवाद कहकर क्या मैं खुद को और सारे हिन्दू समाज को आतंकवादी नहीं कहूँगा?

जिन्होंने मुगलों के अजेय होने के भ्रम को तोड़ा वो वीर सेनापति बंदा सिंह बहादुर थे, सिख आतंकवाद कहकर मैं उनको अपमानित नहीं कर सकता.

सिख आतंकवाद कहकर मैं अफगानिस्तान की सीमा तक भगवा लहराने वाले महाराणा रणजीत सिंह और वीर हरिसिंह नलवा को गाली नहीं दे सकता.

सिख समाज को आतंकी कहकर मैं करतार सिंह सराभा और भगत सिंह की तस्वीर के सामने कौन सा मुंह लेकर जाऊँगा?

मैं अपने गुरुओं के पंथ को कैसे आतंकवादी कह दूं? हम तो उल्टा सिख समाज के अपराधी हैं, भारत की आजादी के लिये जिन्होंने सबसे अधिक खून बहाया हमने उन्हें उनकी जन्मभूमि से, बाबा गुरु नानक देव जी के जन्म स्थान से अलग कर दिया. सिख समाज को आतंकवादी कहकर हम अपने पापों में और इजाफा नहीं कर सकते.

होंगे कुछ भटके हुए गुमराह लोग उनके अंदर पर सिख पंथ, उस पंथ की शिक्षाएँ आतंकवाद बनना नहीं सिखाती. मैंने गुरु ग्रन्थ साहिब में एक भी ऐसी पंक्ति नहीं देखी जो किसी को मारना तो दूर किसी से घृणा करना भी सिखाती हो.

सिख गुरुओं की शिक्षाओं में से कोई एक शिक्षा भी निकाल कर दिखा दे जो किसी के लिये नफरत सिखाती हो? अरे ये तो वो समाज है जो अपने गुरूद्वारे में आने से किसी को भी नहीं रोकता, हमारे आपके जूते-चप्पलों को वहां हाथ में लेकर चप्पल-स्टैंड में रखता है, लंगर के बाद सबकी जूठी थाली साफ़ करता है. महंगाई चाहे कितनी भी बढ़ जाये किसी गुरूद्वारे का लंगर किसी के लिये कभी बंद नहीं होता. मानव समानता और सेवा भाव की ऐसी मिसाल दुनिया की कौन सी कौम या समाज अपने अंदर दिखा सकता है?

मैं खालिस्तान आन्दोलन को सिख आतंकवाद कैसे कह दूँ जबकि इसे खत्म करने में खुद सिखों ने आगे आकर देश का साथ दिया था? 1984 में सिख समाज के साथ इतनी नृशंसता हुई, क्या कभी ने किसी सिख को बम बनकर फटते हुए देखा है?

कहीं बस, ट्रेन में सिखों ने बम फोड़कर निर्दोषों की जान ली है? ये लोग तो 1984 की ज्यादती का इन्साफ आज भी कानून से मांगते हैं, कभी खुद कानून हाथ में नहीं लिया.

खालिस्तानी आतंकवाद को सिख आतंकवाद कहने का पाप कम से कम मुझसे तो नहीं होगा, एहसानफरामोश लोग चाहें तो कहें.

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  1. ओह चाचा जी वो सब तो ठीक है, ये आये दिन फिर हिन्दू सेना या शिव सेना के लीडरों को उड़ा क्यों दिया जाता है पंजाब में? अभी परसों ही अमित शर्मा जो कि हिन्दू सेना का सदस्य मात्र था, को खालिस्तानियों ने गोली से उड़ा दिया केवल इसलिए क्योंकि वो फेसबुक पर खालिस्तानियों के बढ़ते फुटप्रिंट पर लिखता था|
    1982 में कनिष्क एयरलाइन को बम्ब से उड़ा के 330 निर्दोषों की जान लेने वाले सिख आतंकी ही थे. लुधिआना में 80 निर्दोष तीर्थयात्री हिन्दुओं को भूनने वाले सिख आतंकी ही थे| 1987 में आरएसएस की शाखा में घात लगा कर 33 निहत्ते कार्यकर्ताओं को उड़ाने वाले सिख आतंकी ही थे|

    सिख और सिख आतंकी कहने में बहुत फर्क है|

    किसी कौम के इतिहास से उसका भविष्य नहीं मापा जाता. किसी के नाने-दादे महान रहे होंगे इसका मतलब ये नहीं, कि आने वाली पुश्तें दारुबाज़, ऐय्याश हो जाएँ तो भी उनको महान समझा जाएँ| सिखों को आज अपनी हिन्दू निशानियों से चिढ होने लगती है, उनको ये मानने में कब्ज़ हो जाती है कि कालू मेहता ही गुरु नानक के पिता थे| और चूंकि वो हिन्दू थे, इसलिए ये संभव हुआ कि अलग धर्म की पैरवी करने का अधिकार और आज़ादी मिल गयी बगैर किसी टोका टाकी के| लेकिन आजकल के निक्के निक्के सिख को हिन्दुओं से घृणा करना सिखाया जाता है अमृत शकने की आड़ में| आप सिख स्कूलों में किसी हिन्दू बच्चे को पढ़ा के देखिये और उससे पूछिए सलूख कैसा होता है| सिखों को मंदिर न जाने की हिदायत और फतवा दिया जाता है| खुद को दुनिया का सबसे आज़ाद और ओपन रिलिजन कहने वाले ये पूछने पर, कि क्यों एक हिन्दू पंजाब का सीएम् नहीं बन सकता, बगलें झांकते नजर आते हैं|
    जनाब, सिख महान हैं, उनके बलिदान सदा याद रखेंगे, परन्तु उनकी पुश्तों को भी चाहिए कि उन बलिदानों की आड़ में खामोख्वाह के अशांति फैलाने वाले ड्रामे न किये जाएँ| इस देश में वैसे ही हिन्दुओं से सगे कम बचे हैं…

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