नोट बंद के खिलाफ कम, भारत बंद के खिलाफ ज्यादा जनाक्रोश दिखा!

0
54
Demo Pic

प्रधानमंत्री मोदी के एक फैसले ने पूरे विपक्ष को लाम बंद कर दिया. विपक्ष की समस्या ये है कि उन्हें किसी भी कीमत पर विरोध करना है. इस समय पर यदि नोट बंदी के खिलाफ खड़े होते हैं तो काले धन और भ्रष्टाचार के साथ खड़े दिखाई देते हैं.

इसी दुविधा से बचने के लिए जनता को होने वाली परेशानियों को ढाल बनाया गया. दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है कि तर्ज पर सारे के सारे एक ही पाले में आकर खड़े भी हो गए लेकिन इससे विपक्ष की दुविधा कम होने के बजाय बढ़ी ही है.

नीतीश कुमार जैसे धुर विरोधी ने पहले ही नोट बंदी का समर्थन कर विपक्ष को कमजोर कर दिया था अब मायावती ने भी भारत बंद से खुद को बाहर रखकर ये साबित कर दिया कि उन्हें विपक्ष के एक जुट होने से ज्यादा अपनी राजनीति बचाने की जरूरत है.

बीएसपी नोट बंदी के तो खिलाफ है लेकिन भारत बंद के साथ नहीं दिखी. इसी तरह विपक्ष के अलग अलग धड़ों ने अपने अपने तरीके से भारत बंद का समर्थन किया लेकिन उसके साथ खुलकर नहीं आए.

यही वजह रही कि भारत बंद कामयाब नहीं हो पाया, बेशक ट्विटर और फेसबुक पर इस बंद पर बनने वाले जोक्स जमकर ट्रैंड करते रहे.

समाजवादी पार्टी ने तो लोगों को कन्फ्यूज करने की हदें पार कर दी. कौन किसके साथ है और किसके खिलाफ है ये जब पार्टी के भीतर ही साफ नहीं है तो सड़क पर क्या खाक साफ होगा.

अमर सिंह ने रामगोपाल की वापसी से नाराज होकर कहा या वो सचमुच मोदी जी के प्रशंसक हैं, कहना मुश्किल है लेकिन जिनके कंधों पर मुलायम सिंह ने अपना राजनैतिक भविष्य रखा है वो खुद भी नोट बंदी की प्रशंसा कर रहे हैं.

नोट बंदी से किसे नुकसान हुआ है और किसे फायदा ये तो अलग आकलन का विषय है लेकिन विपक्ष ने जिस तरीके से इस मुद्दे पर अपना विरोध दिखाया है उसने उसे फायदा पहुंचाने के बजाय नुकसान ही पहुंचाया है.

चुनावी मौसम में विपक्ष को एक मुद्दा चाहिए था लेकिन वो मुद्दा यदि भ्रष्टाचार और कालेधन के खिलाफ उठाए गए किसी कदम को बनाया जाए तो आफत दोहरी होती है.

केजरीवाल की राजनीति ही विरोध की रही सो उन्होंने तो फैसले के बाद से ही गाल बजाने शुरू कर दिए थे लेकिन हमेशा की तरह कांग्रेस एक बार फिर केजरीवाल का पल्लू पकड़े पकड़े पीछे चलने लगी है.

कांग्रेस की ये एक बड़ी कमजोरी बनती जा रही है कि उसे ना चाहते हुए भी केजरीवाल के उठाए मुद्दों के पीछे भागना पड़ता है वो भी उनके बाद.

खैर भारत बंद बुलाया भी गया लेकिन या तो कार्यकर्ताओं की कमी कहिए या फिर विपक्ष का बिखराव कहिए इसका असर देखने को नहीं मिला.

कई लोगों ने तो यहां तक कहा कि पहली बार ऐसा भारत बंद रहा कि भारत को ही पता नहीं चला.

कुछ लोगों ने लिखा कि मैट्रो और बसें आम दिनों के मुकाबले ज्यादा खचाखच भरी दिखाई पड़ रही थी मानों वो लोग जो आम तौर पर ऑफिस न जाते हो वो भी आज जरूर जाना चाह रहे थे.

सचमुच में ये आक्रोश दिवस नोट के खिलाफ कम भारत बंद के खिलाफ ज्यादा दिखाई पड़ता है.

बात ये नहीं कि सभी लोग नोट बंदी के समर्थन में आ गए हैं लेकिन ये जरूर है कि वो समझ गए हैं कि विपक्ष कि मंशा सिर्फ राजनैतिक लाभ लेने की है.

लोग चाहते हैं कि यदि कोई कदम उठाया गया है तो उसे थोड़ा समय दिया जाना चाहिए. बैंक और एटीम के बाहर लगने वाली लाइनों की वजह भी अब किसी से छिपी नहीं है.

जिन लोगों के पास डेबिट कार्ड होता है उन्हें रोज रोज लाइन में लगने की जरूरत नहीं पड़ती लेकिन कई लोग तो लगातार लाइनों में ही लगे रहने के लिए बैंकों और एटीएम के बाहर खड़े रहे.

काले धन वालों ने सफेद करवाने के हथकंडे तो बहुत अपनाए लेकिन विश्वास करिए जितना काला धन पड़ा है वो कभी सफेद नहीं किया जा सकता. जो लोग तिकड़म भी लड़ा रहे हैं वो खुद को बेपर्दा ही कर रहे हैं.

अब बात आती है भ्रष्टाचार रोकने की. इसमें कोई दो राय नहीं कि सिर्फ नोट की शक्ल फितरत को नहीं बदल सकती.

जो 500 और 1000 में रिश्वत लेते हैं वो 2000 में भी लेंगे लेकिन अहम सवाल ये है कि क्या ऐसे लोगों ने अभी तक जो कुछ किया है उस पर भी परदा पड़ा रहने दें?

यही सवाल है जिसका जवाब लोगों को परेशानी के बावजूद मोदी के फैसले के साथ खड़ा दिखाता है. आप लोगों से पूछेंगे तो वो जवाब में अपनी परेशानी तो बताएंगे लेकिन साथ ही ये भी कहेंगे कि उम्मीद है इस पहल से कुछ सकारात्मक बदलाव होंगे.

इतने बड़े कदम को उठाने के बाद दिक्कतें तो आती हैं लेकिन क्या उसके परिणामों के लिए कुछ समय इंतजार करने की जरूरत नहीं है? क्या विपक्ष भारत बंद जैसी तरकीबों से इस सुधार में खुद को बड़ी अड़चन नहीं बता रहा है?

ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा कि इस कदम के क्या परिणाम आते हैं लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि बौखलाया हुआ विपक्ष इसका इंतजार नहीं करना चाहता.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY