ये जुलूस नहीं, काफ़िरों के सीने पर ईमान वालों के धावे हैं

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बात कुछ पुरानी और तब की है जब दिल्ली के बवाना में गांव की पंचायत ने तय किया कि मुहर्रम का जुलूस उनके गांव से नहीं निकलेगा.

गांव वालों के विरोध के कारण थे. उनके अनुसार जुलूस उनके गांव के मुसलमान नहीं निकालते. वो दूसरे गांव से शुरू हो कर उनके गांव के बीच से होता हुआ अगले गांव में जाता है.

मुहर्रम के जुलूस में शामिल लोग गुंडागर्दी करते हैं. स्त्रियों पर छींटाकशी की जाती है, उनका बाहर निकलना असम्भव हो जाता है. जुलूस में शामिल लोग राह चलते दुकानों से सामान उठा लेते हैं. स्थानीय मुसलमान इसे मान गये और बात समाप्त हो गयी

मगर मीडिया इसे इस्लाम की हार और हिंदुत्व की जीत का रंग देने में जुट गया. मीडिया के महारथी जो ऐसी बातों को ये विचित्र रंग देते हैं और इन विषयों को हवा देते हैं, नॉएडा, दिल्ली, मुंबई के पॉश इलाकों में ए.सी. सज्जित, लॉन से घिरी बड़ी-बड़ी कोठियों में रहते हैं.

उन्हें इसका बिलकुल अंदाज़ा नहीं है कि मुहर्रम, चेहल्लुम, ईदुल-मिलादुल नबी के जुलूस क्या चीज़ हैं ? इनके निकलते समय वातावरण कैसा होता है ?

दैवयोग से मैं एक छोटे से शहर में पला-बढ़ा हूँ और मैंने मुहर्रम, चेहल्लुम, ईदुल-मिलादुल नबी के जुलूसों को वर्षों देखा है.

जुलूस के आगे-आगे घोड़े पर अरबी स्वांग रचाये चार-छह तलवारधारी मुल्ला स्वरूपों, हैदराबाद की नृशंस हिन्दू विरोधी ख़ाकसारान बेलचा पार्टी के अवशेष ख़ाकी वर्दीधारी और बेलचा उठाये चल रहे कार्टूनों, जुलूस में लगते नारों, “देखो हमारे अली की शान-बच्चा बच्चा है कुरबान”…. “देखो हमारे नबी की शान-बच्चा बच्चा है क़ुरबान” के तेवरों, उस समय जुलूस में शामिल लोगों की उग्र मन:स्थिति से परिचित हूँ.

फिर भी जिसे अंग्रेजी में डाइरेक्ट फ्रॉम द हॉर्सेज माऊथ कहते हैं यानी आंखन देखी बताने के लिये हम तीन भाई दैवयोग से मुहर्रम वाले दिन बरेली से बीस-बाईस किलोमीटर दूर फ़रीदपुर क़स्बे के सफ़र पर थे.

फ़रीदपुर दिल्ली-लखनऊ के राष्ट्रीय राजमार्ग पर बरेली से सामान्य स्थिति में अधिकतम पच्चीस-तीस मिनिट की दूरी का क़स्बा है.

दैवयोग से बल्कि इस्लामयोग से हमें अपनी कार होते हुए भी पहुंचने में ढाई घंटे से अधिक लगे.

कारण था कि छह लेन के राष्ट्रीय राजमार्ग पर कई हिस्सों में मुहर्रम के जुलूस निकल रहे थे. हर जुलूस में दो-ढाई सौ लोग पुलिस की निगरानी में ताज़िये उठाये जा रहे थे.

इतनी भीड़ के लिए छह में से एक लेन पर्याप्त थी. अधिकतम एक तरफ़ की तीन लेन प्रयोग की जा सकती थीं और दूसरी तरफ से ट्रेफ़िक निकला जा सकता था.

किन्तु मुहर्रम के कारण समय रुक गया था. रोक दिया गया था. जगह-जगह ट्रक रुके खड़े थे. हर जुलूस में दसों लोग लाठियों से लैस थे जो निकलने वालों को रोक रहे थे.

डंडों से कार के बोनट, शीशे खटखटाये जा रहे थे. लग रहा था कि मुग़लिया भेड़िया-धसान और पिण्डारियों का युग वापस लौट आया है.

छोटी कारें बिलकुल दायें किनारे से, मौक़ा पा कर, दामन संभाले, पल्ला बचाये, लगभग सर ढके, सतर चाल में ऐसे निकल रही थीं जैसे घर के बाहरी हिस्से में ख़ानदान के बड़े-बूढ़े बैठे हों और बहुएं दबे पैरों से घूंघट निकाले हुए दबे पांव निकल जाने की विवशता में गुज़र रही हों.

सात-आठ किलोमीटर तक कार धीरे-धीरे पंजों के बल दुबकी हुई चलती रही और हम ये सब, तब तक देखते रहे जब तक फ़रीदपुर छह किलोमीटर नहीं रह गया.

अब अंतिम बम फटा. आगे जाम लगा हुआ था. समाजवादी पार्टी की सरकार की पुलिस ने रास्ता बंद कर दिया गया था. ट्रकों, कारों को साइड लगाने के लिये कहा जा रहा था.

छोटी कार वालों ने स्थानीय निवासियों से पूछ कर बायीं ओर एक कच्चा रास्ता ढूंढ निकाला. जो एक सूखी नहर के किनारे धूल उडाता हुआ जा रहा था.

उसने हमें शेष छह किलोमीटर को चौदह किलोमीटर में बदल कर फ़रीदपुर के बाहरी सिरे पर निकाला.

मैं रास्ते भर और लौटते समय भी इसी सोच में डूबा रहा कि इक्कीसवीं सदी में भारत को किस दिशा में ले जाया जा रहा है? समाज को किस ओर खदेड़ा जा रहा है?

अगर, बल्कि अगर की कोई गुंजाइश नहीं है, ये तथ्य है कि जुलूस में शामिल मुट्ठी भर लोगों ने अखिलेश यादव की सरकार तथा प्रशासन के सक्रिय समर्थन से राष्ट्रीय राजमार्ग को घंटों के लिए बंद कर लिया था, तो जिस समय इस मन:स्थिति के लोगों के हाथ में डंडों की जगह तलवारें, बरछे थे, बादशाह की फ़ौजों का समर्थन था, उस समय हमारे पूर्वज कैसे जिये होंगे?

सम्पूर्ण भारत के प्रत्येक प्रतिष्ठित मंदिर का मुस्लिम इतिहास की पुस्तकों में उल्लेखित ध्वंस, हमारी माताओं-बहनों को ग़ुलाम बना कर मध्य एशिया के बाज़ारों में बेचे जाने के मुस्लिम इतिहासकारों की किताबों में गौरवपूर्ण उल्लेख, देश की लूट के आज भी आश्चर्यचकित कर देने वाले ऐतिहासिक वर्णन, काफ़िरों के सरों के मीनार बनाये जाने के पराक्रम के दावे, हर मुस्लिम शासक का ग़ाज़ी (इस्लाम के लिये काफ़िरों के ख़िलाफ़ लड़ने वाला योद्धा) की उपाधि धारण करना अर्थात सारा मुस्लिम इतिहास हमारे लिये भयानक घृणा से पटा पड़ा है.

अफ़ग़ानिस्तान, जो आज इस्लामी आतंक का एक प्रमुख गढ़ बना हुआ है, चीन के खोजी यात्रियों ने वहां के हिन्दू शाही राज-वंश का गुणगान किया है. वहां भी इस्लाम ने इसी तरह से अपना विस्तार किया था.

ईराक़ के यजदी जो आज भी गरुड़, मयूर की पूजा करते हैं, जिनके मंदिरों में मूर्तियां आज भी होती हैं, इसी तरह आतंक का शिकार बनाये गये थे. सदियों से हमारे इन बिछड़े बंधुओं ने कितनी कठिनाई से छिप-छिपा कर अपनी मूल संस्कृति को बचाये रखा.

ये सार्वजनिक रूप से नमाज़ पढने लगे मगर घरों में पूजाघर बनाते रहे. छिप कर मंदिरों में पूजा करते रहे और अपने पूर्वजों से जुड़े रहे मगर आज इक्कीसवीं सदी में इस्लाम ने पेट्रो डॉलर की ताकत से लैस होकर और अमरीका की सस्ती गैस और सस्ते पैट्रोल की चाह ने हज़ारों साल पुराने इस समाज का भयानक बुरा हाल कर दिया.

यू ट्यूब पर यजीदी पुरुषों के जबरदस्ती ख़तने करने दृश्य उपलब्ध हैं. यजदी लड़कियों के ज़ंजीरों से बांध कर बेचने के लिए ले जाये जाने के वीडियो देखे जा सकते हैं.

उनकी नीलामियां मीडिया को याद नहीं दिला रहीं कि अतीत में भारत में भी ऐसा ही होता रहा है.

भारत पर पहले मुस्लिम आक्रमणकारी मुहमद बिन क़ासिम ने यहाँ से चालीस हज़ार लड़कियां और बच्चे ग़ुलाम बनाये थे. जिनका बीस प्रतिशत हिस्सा ख़लीफ़ा को भेजा गया था और शेष लोगों को अपने हरमों में भरा था या बाज़ारों में बेचा गया था. सम्पूर्ण मुस्लिम काल में भारत ग़ुलामों को पकड़ने का बड़ा केंद्र बना रहा है.

इतिहास अपनी जगह मगर क्या मीडिया को आज भी जगह-जगह स्थापित होते मदरसे नहीं दिखाई देते? क्या इन टी.वी. के महारथियों को मस्जिदों का फैलता हुआ जाल दिखाई नहीं देता? क्या इन लोगों को आसाम, बंगाल, बिहार के सीमांत जिलों का हाल नहीं मालूम?

बधुओं, इन सारे कामों का प्रारम्भ इसी तरह होता है. छोटी-छोटी मांगों से बात शुरू होती है जो बाद में सुरसा के मुंह की तरह फैलती जाती हैं.

इसी सामान्य इस्लामी तकनीक का प्रदर्शन अभी सीमा पर पाकिस्तान ने किया था. ज़ोरदार फ़ायरिंग जो केवल ये जानने के लिये की गयी थी कि मोदी के नेतृत्व में कितना दम है और उसे कितना दबाया जा सकता है?

क्या ये भी मनमोहन जैसा ही तो नहीं? मगर इस बार की धुआंधार जवाबी फ़ायरिंग ने समझा दिया कि दिन बदल गये, हवा बदल गयी. नतीजा इस्लामी तोपें ठंडी पड़ गयीं.

अतः बंधुओं, ये केवल मुहर्रम, चेहल्लुम, ईदुल-मिलादुल नबी के जुलूस नहीं हैं बल्कि काफ़िरों के सीने पर ईमान वालों के धावे हैं और इनसे इसी तरह से नहीं निबटा जाना चाहिए जैसे बवाना वाले निबटे हैं?

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