नहीं चाहिए काले धन की GDP और काले धन का लहंगा

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देहरादून में मेरे एक मित्र रहते हैं. उनका एक छोटा भाई है. उसके जीवन का एक उसूल है.

कोई शर्ट वो एक बार से ज़्यादा नहीं पहनता. और शर्ट भी हमेशा ब्रांडेड. मने Arrow और Van Heusen टाइप…. 2000 रु वाली.

वो दीगर बात है कि हर 6 महीने पे उसको पुलिस खोजती आती है विभिन्न राज्यों और शहरों से. फ्रॉड के cases में.

आजकल की नस्ल बहुत ज़्यादा Brand Conscious हो गयी है. मने अगर कपड़ा, जूता, चश्मा, घड़ी, फोन अर्थात शरीर पे दिखने वाली तमाम चीज़ें ब्रांडेड ही होनी चाहिए वरना इज्ज़त का फालूदा हो जाएगा.

मेरी एक मित्र हैं. विदेश में रहती हैं. मने थी तो देसी मगर अब बिदेसी kennel (कुत्तों का घर) में पल रही हैं.

ज़ाहिर सी बात है कि पट्टा भी उनके गले में बिदेसी और ब्रांडेड ही होता है. देखने-ताकने में बेहद खूबसूरत…. मने ऐसी कि विश्वामित्र का भी ईमान डोल जाए.

तो मैं जब भी उनसे मिलता हूँ तो एक डायलाक जरूर बोलता हूँ…. एकदम फ़िल्मी अंदाज़ में…. मने जैसे राजकुमार ने बोला था पाकीज़ा में…. मीना कुमारी के पैर देख के….

आप बेहद खूबसूरत हैं…. मने आपका चेहरा बड़ा खूबसूरत है…. पर अपना मुह बंद रखा करें…. क्योंकि मुंह खुलते ही पता चल जाता है कि आप एकदम अनपढ़ जाहिल ‘लिख लोढा पढ़ पत्थर’ हैं….

अबे गधे को ब्रांडेड टी शर्ट और जूता पहिरा दोगे तो ऊ का घोड़ा बन जाएगा???

पर बाज़ारवाद के इस दौर में गदहे भी सब branded accessories पहनने पे आमादा हैं. डेढ़ सौ रुपिया की टी शर्ट 1800 रूपए में खरीदते हैं.

खाना भी branded ही खाते हैं. लहंगा भी 18000 का ही पहनते / पहनती हैं…. देह पे कई लाख का टैटू गुदवाते हैं. पइसा न हो जेब में तो कर्जा ले के करवाते हैं.

कुछ लोग इसे पाश्चात्य सभ्यता का असर बताते हैं पर उनको इतिहास बोध नहीं है.

कर्ज़ ले के घी पीने का दर्शन तो हमारे देश की अपनी philosophy थी. ईसा से 600 पहले हुए चार्वाक जिन्होंने इस सिद्धांत का प्रतिपादन किया –

यावज्जीवेत सुखं जीवेद ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत, भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः॥

अर्थ है कि जब तक जियो सुख से जियो, कर्ज़ ले के घी पियो…. अगर अपने पास साधन नही है, तो दूसरे से उधार लेकर मौज करना चाहिये, श्मशान में शरीर के जलने के बाद शरीर को किसने वापस आते देखा है.

इसको अंग्रेजी में कहते हैं Shop till you drop…. मने बाज़ार जाओ और इतनी shopping करो इतनी shopping करो…. मने तब तक shopping करो जब तक बेहोश हो के गिर न जाओ….

पर सतियानास जाए इस कमबखत मारी के…. इस नासपीटे मोदी के…. इस ने नोट बंदी करके बाजार भट्टा बिठा दिया.

भाई लोग दूकान खोल के बैठे हैं. और भाजपाई से सीधे आपिये और कांग्रेसी हुए जाते हैं. कहते हैं बोहनी तक न हो रही, भाजपा में रह के का करेंगे???

बाज़ार में ग्राहक है ही नहीं. पर एक बात तो तय है. ग्राहक बाज़ार में बेशक न हो…. घर पे तो है न?

और यूँ भी नहीं कि घर पे भूखा सोया है…. या फिर नंगा टहल रहा है…. मने ग्राहक बाज़ार में नहीं टहल रहा पर घर पे खा पी के टंच है….

ग्राहक की बीबी 36000 का लहंगा नहीं खरीद रही…. 48000 का जो लहंगा पिछले महीने भतीजी के बियाह में लिए रही उसी से काम चला रही है….

उधर गाहक बड़ा खुस्स्स्स है….. उसका 36000 बच गया…. दाल रोटी खाओ…. प्रभु के गुण गाओ.

बाज़ार में जब तक खुल्ला न आ जाए तब तक GDP स्थगित है. काले धन की GDP और काले धन का लहंगा नहीं चाहिए.

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