पूरब के डूबते सूरज को थामने वाली पश्चिम

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इश्क़ दो तरह का होता है… एक तरफा, दो तरफा….

लेकिन कभी कभी ये दोनों तरह के इश्क़ ज़िंदगी के तराज़ू में एक ही तरफ होते हैं, लेकिन दूसरी तरफ वर्जनाओं के बाँट होते हैं, जिसका वज़न फूंक मार कर उड़ा देने जितना कम होता है लेकिन उतनी फूंक मारने के लिए ली जाने वाली वो एक सांस लेना बहुत भारी होता है…. क्योंकि वो साँसे कभी उम्र जितनी लम्बी होती है, कभी मज़हब जितनी गहरी…

पूरब की उम्र की बात की जाए तो उस उम्र में कोई सांस न उम्र जितनी लम्बी लगती है, न मज़हब जितनी भारी…. उसकी तो हर सांस फूलों जैसी हो गई थी … न सिर्फ हल्की बल्कि प्यार के सुगंध से सराबोर….

पूरब के गोरे चेहरे पर रेगिस्तान के रंग की आँखें…. जो देखें उसकी मरीचिका में डूब जाए…. इसलिए रेहाना के डूब जाने पर कोई अचरज नहीं था… अचंभित तो मज़हब की आँखें थी जिसके खौफ को पूरब ने तो अपने आँखों के रेगिस्तान में दफ़न कर दिया था लेकिन शहर के नामचीन परिवार की रेहाना मज़हब की बदसूरत रवायतों के आगे हार गई थी…

बिछड़ते समय रेहाना के हाथों को पूरब ने इतनी ज़ोर से पकड़ रखा था कि उसकी उँगलियों के निशान उसकी कलाइयों पर पड़ गए थे…. वो जानती थी कलाइयों के इन निशानों को ही इश्क की निशानी बनाकर पूरी उम्र गुजारना है, क्योंकि पूरब के नाम की चूड़ियों को सुहाग की निशानी बनाना उसके किस्मत में नहीं है…

वो उसे समझाती रही और वो समझता रहा लेकिन पूरब की आँखें समझने को तैयार नहीं थी … रेगिस्तानी आँखों से आंसुओं की नदी फूट पड़ी थी जिसमें उसकी जवानी के सारे सपने घुल के बह गए थे… दोनों अलग होते समय जानते नहीं थे कि रेगिस्तान से फूटी नदी में घुला सपना नदी किनारे की मिट्टी में आज भी दबा पड़ा है …

ये आज 35 बरस जितना लंबा है जब दोनों के आज में अपना अपना परिवार है…. जीवन साथी है…. बच्चे हैं…. बच्चों के बच्चे हैं… लेकिन सपने का बीज इस आज के अस्तित्व को नकारते हुए इश्क़ के अवशेष की तरह मिट्टी में दबा पड़ा है…. दोनों जानते हैं कि मिट्टी को बस उतनी ही सांस भर फूंकने की देर है जितनी जवानी के दिनों में मज़हब का बाँट हटाने के लिए ज़रूरी थी… लेकिन आज सांस भारी नहीं बंधी हुई है…. जिम्मेदारियों से, सामाजिक बंधनों से, अपनों के प्यार से….

ये आज….. आज भी है, कल भी था और उस दिन भी आज ही था जब पूरब ने रेहाना से आख़िरी बार मिलते हुए कहा था….
– “ज़िंदगी बहुत बड़ी है रेहाना, तुम्हारे बिना इसे काटना सच में काटने जैसा ही होगा… ”
और ये सच भी था पूरब अपनी ज़िंदगी से रोज़ एक दिन अपने हाथों से काट कर अलग कर रहा था…. लेकिन ये कमबख्त ज़िंदगी का सूरज रोज़ पूरब से निकलता और उसमें एक आज और जोड़ देता….

उसी आज से पूरब के विवाह की तारीख भी निकली थी…. और पूरब ने शादी की इमानदारी को बनाए रखने के लिए अपने इश्क के आज को कल में बदल दिया था… पत्नी के सामने अपने कल के इश्क का इज़हार तो कर दिया था लेकिन हिन्दू धर्म में जहां विवाह के बाद पति परमेश्वर हो जाता है वहां पूरब की पत्नी पूरब के पूरे समर्पण के बावजूद उसे आधा परमेश्वर और आधा इंसान मानती रही और पूरब ताउम्र अपनी इन आधी आधी मूरत को जोड़कर उसके सामने एक मुकम्मल सूरत अख्तियार करने की कोशिश करता रहा….

और एक दिन पूरब की उन रेगिस्तानी आँखों की नदी पूरी तरह से सूख गई जब उसे रेहाना की मौत की खबर मिली…. वो आज तक रेगिस्तान की सूखी रेत को उड़ने से रोकते हुए ज़िंदगी गुज़ार रहा था ताकि उस रेगिस्तान के उड़ते गुबार का किसी को पता न चले…. लेकिन किस्म्मत इतनी दरियादिल होती तो बात ही क्या थी… उसे तो पल-पल इंसान की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करना है… तभी तो वो अल्हड़ युवा पूरब आज उम्र की ढलती शाम में भी पूरब ही है…. जहां इश्क का सूरज कभी डूबता नहीं … सदा वहां से उगता ही है…

… और एक दिन यूं ही जीवन की ढलती शाम में फेसबुक से उसे पता चला रेहाना ज़िंदा है, तो पूरब की ज़िंदगी के वो सारे सूरज एक साथ उदय हो गए जो रेहाना की मौत के बाद उसने अपनी रेगिस्तानी आँखों में दफ़न कर दिए थे…..

ये फेसबुक की दुनिया न जाने कितने दिलों को बर्बाद करेंगी और न जाने कितने घरों को आबाद… मैं नहीं जानती…. लेकिन ये ‘जीवन’ शैफाली बस इतना जानती है कि उसका inbox जब जब कन्फेशन बॉक्स बन जाता है, तब तब उसके शब्दों की दुनिया उन बर्बाद दिलों को थाम लेती है….

समाज के नियमों से परे एक दुनिया ऐसी भी है जो मेरे इनबॉक्स से गुज़रती है…  जहां प्रकृति का केवल एक ही नियम लागू होता है कि इश्क के सूरज को कितना ही पकड़कर रखो उसे पूरब से उगने से कोई नहीं रोक सकता…. कोई नहीं….

– पूरब के डूबते सूरज को थामने वाली पश्चिम शैफाली

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