अस्तित्व : एक प्रेमकथा

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वो जिसे कभी जाना नहीं जा सकता, अपने आपमें ही मस्त था.
एक दिन उसकी मस्ती के अतिरेक में उससे वो प्रकट हो गई जो थी ही नहीं, मात्र भास रही थी.

वो जो थी ही नहीं, दर्पण बन गई और उसमें उसने अपने आपको देखा जो कभी जाना नहीं जा सकता.

“ओह ! मैं कितना एकाकी हूँ. एकमेव अद्वितीय !!!”
उसने अपने आपसे कहा जो कभी जाना नहीं जा सकता.
” नहीं ….. नहीं हो एकाकी. मैं हूँ यहाँ.” वो चहकी, जो थी ही नहीं.

उपेक्षा की उसने, जिसे जाना नहीं जा सकता, उसकी, जो थी ही नहीं, मात्र भास रही थी.

पर वो चुप ही नहीं हुई. दसों दिशाओं में उसकी झनकार गूँज गई, जो थी ही नहीं , मात्र भास रही थी.

वो ग्यारहवीं दिशा में नाराज़ सा बैठ गया एक युग के लिए. उसे क्रोध आ रहा था, कि उसे तो जाना ही नहीं जा सकता और ये उसे समझा रही है कि “मैं हूँ, तुम एकाकी नहीं हो.” “हुंह !!!! मिथ्या कहीं की.”

पर उसने सवालों की झड़ी लगा दी, जो थी ही नहीं मात्र भास रही थी.
“बोलो !!!! जवाब क्यों नहीं देते ???? इतने अभिमानी क्यों हो ??? समझते क्या हो अपने आप को ??? डरते हो मुझसे ????”

ग्यारहवीं दिशा में कंपन हुआ. समय आ चुका था.
वो बाहर आया, जिसे जाना नहीं जा सकता. उसने अपनी दोनो बाहें उसकी ओर फैला दी, जो थी ही नहीं , मात्र भास रही थी.
“आओ मेरी प्रेयसी, मुझे अपने में महसूस करो.”
उसने कहा गगन गंभीर स्वर में.

वो क्षण भर को अवाक् रह गई. स्तब्ध. निशब्द.
फिर उसके विराट बाहुओं में सिमट गई.

एक क्षण अनंत का सम्राट हो गया. अद्वैत साकार हो गया. और , जब उसने आँखें खोलीं तो वो नहीं था, जिसे जाना नहीं जा सकता.

वो व्याकुल हो गई, जो थी ही नहीं, मात्र भास रही थी. उसकी व्याकुल पुकार से इस अस्तित्व का प्रसव हुआ. इसलिए यहाँ कभी कोई संबंध शाश्वत की अनुभूति नहीं देता. विरह और मिलन दोनो एक ही मौत मरते हैं.

और वो, जो थी ही नहीं , मात्र भास रही थी, अनवरत व्याकुल पुकार लगाए ही चली जाएगी अनंत तक.
और वो जिसे जाना नहीं जा सकता, धीर मौन बैठा उसकी पुकार सुनता रहेगा, अनंत तक, उसके कण कण में व्याप्त होकर जो थी ही नहीं , मात्र भास रही थी.

– अज्ञेय आत्मन

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