वो सब बर्दाश्त कर लेगा पर मोदी का बढ़ा हुआ क़द उसे बर्दाश्त नहीं!

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नोट बंदी के बाद माया, ममता, मुलायम, केजरीवाल और बचे-खुचे कांग्रेसी, चोट खाए सांप की माफिक ऐंठ रहे हैं.

उनका दर्द समझ आता है. उनके तो माना कि हज़ारों करोड़ रूपए मिट्टी हो गए. वो ऐंठ रहे हैं, तड़प रहे, बिलबिला रहे हैं…. बात समझ आती है….

आम पब्लिक को इस नोट बंदी से कोई आर्थिक नुकसान नहीं हुआ. बस कुछ दिन की असुविधा भर हुई. इसलिए वो कमोबेश मोदी जी के इस निर्णय से खुश हैं.

दलगत राजनीति और दलगत निष्ठा से ऊपर उठ कर लोग राष्ट्र हित में इस निर्णय के साथ हैं.

पर मोमिन बिलकुल खुश नहीं दीख रहे.

क्यों?

क्या मोमिन नहीं समझते कि काला धन क्या होता है?

क्या मोमिन नहीं जानते कि भ्रष्ट राजनेता, अफसर और व्यापारी के तहखाने में करोड़ों नही बल्कि अरबों रूपये सड़ रहे हैं और अब मिट्टी हो जायेंगे.

क्या मोमिन नहीं जानते कि मोदी ने देश के अन्दर जमा काले धन पर निर्णायक चोट की है. इसके बावजूद मोमिन के मुंह से तारीफ़ के दो बोल नहीं फूटे.

क्यों???

मोमिन मोदी को बढ़ता हुआ नहीं देख सकता. मोमिन के जिनगी का एक्के मकसद है…. मोदी का विनाश….

मोमिन मोदी को तरक्की की सीढ़ी चढ़ते नहीं देख सकता…. और सच ये है कि नोट बंदी से मोदी का क़द बढ़ा है. देश भर में उनकी लोकप्रियता बढ़ी है. उनका वोट बैंक बढ़ा है.

Core vote चुनाव नहीं जिताते. चुनाव जिताता है floating vote…. वो जो वोट से ठीक एक दिन पहले किसे वोट देना है ये निर्णय लेता है.

पिछले दो महीने में मोदी ने floating वोट का बहुत बड़ा हिस्सा अपने साथ ले लिया है. POK में सर्जिकल स्ट्राइक और अब ये नोट बंदी….

इस से मोदी की विश्वसनीयता बढ़ी है…. लोग पार्टी लाइन से ऊपर उठ कर मोदी को पसंद कर रहे हैं.

हिन्दुस्तान की जनता की याददाश्त बहुत कमजोर होती है. आम लोगों को नोट बंदी से जो असुविधा हुई, वो लोग भूल जायेंगे….

30 दिसंबर के बाद सेठियों के रद्दी हुए नोट जब सड़क पर उड़ेंगे तो उस आह्लाद में जनता सब भूल जायेगी….

मोदी की लोकप्रियता 2014 की तुलना में आज कई गुना ज़्यादा है. मोदी का क़द बढ़ा है. मोदी मज़बूत हुए हैं.

मोमिन सब बर्दाश्त कर लेगा पर मोदी का बढ़ा हुआ क़द उसे बर्दाश्त नहीं.

यही समस्या सब विपक्षी दलों की है.

उन पर तो दोहरी मार पड़ी है. सारी जमा पूँजी, सारा पैसा भी गया…. राजनैतिक ज़मीन भी गयी. वोट बैंक भी गया.

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